भारतकोश
संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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१५४ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

स्वधर्मं यद्यहं त्यक्त्वा वर्त्तेयमकुतोभयम् । तर्हि गर्ह्य मां कामं निरूप्य मनसा स्वयम् ॥७१ मातापितृसुतादीनां भरणायैव केवलम् । क्रियते प्राणिहननं निजधर्मतया मया ॥७२ स्वधर्मादामिषेणाहं सकुटुम्बो दिनेदिने । वर्त्तामि साऽपि मे वृत्तिर्विधात्रा विहिता पुरा ॥७३ मांसेन यावता मे स्यान्नित्यं पित्रादि पोषणम् । हनिष्ये चेत्तदधिकं तर्हि युज्येयमेनसा ॥७४ यावत्पोषणघातेन न वयं स्याम निन्दिताः । तदेतत्संप्रधार्य्य त्वं वा मां प्रशंस वा ॥७५ साधु वाऽधु वा कर्म यस्य यद्विहितं पुरा । तदेव तेन कर्त्तव्यमापद्यपि कथंचन ॥७६ निरूपय स्वबुद्ध्या त्वमात्मनो मम चांतरम् । अहं तु सर्वभावेन मित्रादिभरणे रतः ॥७७

यदि मैं अपने धर्म का त्याग कर अकुतोभय अर्थात् निर्भीकता वाला होते हुए बरताव करूँ तो स्वयं मन से निरूपण करके मुझे इच्छा पूर्वक निन्दित कहिए ।७१। मैं तो अपने माता-पिता और पुत्र आदि के भरण-पोषण के ही लिए केवल अपने धर्म के कारण ही प्राणियों का वध किया करता हूँ ।७३। अपने ही धर्म होने से प्रतिदिन अपने कुटुम्ब का भरण मांस से किया करता हूँ और यह भी मेरी वृत्ति पहिले ही विधाता ने बना दी है ।७२। जितने मांस से नित्य ही मेरे माता-पिता और पुत्र आदि का भरण हो जाता है उतने ही प्राणियों का में हनन किया करता हूँ। इससे भी अधिक मैं हनन करूँ तो मैं पाप से युक्त होऊँगा ।७४। जितने मांस से सबका पोषण होते उतने ही प्राणियों के घात करने से हम लोग कभी भी निन्दित नहीं होते हैं। यह सबका विचार करके ही आप मेरी निन्दा करें या प्रशंसा करें ।७५। अच्छा हो या बुरा ही जिसका जो कर्म पहिले ही विधाता ने बना दिया है वही कर्म किसी भी प्रकार से आपत्काल में भी उसे करना चाहिए ।७६। अब आप स्वयं अपनी ही बुद्धि से मेरे कर्म में जो भी अन्तर हो उसका