भारतकोश
संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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परशुराम परीक्षा ] [ १५३

तपोव्याजेन गहने निर्जने संप्रवर्त्तसे ॥६५॥
गुरुस्त्रीब्रह्महत्योत्थपातकक्षपणाय च ।
तपश्चरसि नानेन तपसा तत्प्रणश्यति ॥६६॥
पातकानां किलान्येषां प्रायश्चित्तानि सन्त्यपि ।
मातृद्रुहामवेहि त्वं न क्वचित्किल निष्कृतिः ॥६७॥
अहिंसालक्षणो धर्मो लोकेषु यदि ते मतः ।
स्वहस्तेन कथं राम मातरं कृत्तवानसि ॥६८॥
कृत्वा मातृवधं घोरं सर्वलोकविगर्हितम् ।
त्वं पुनर्धार्मिको भूत्वा कामतोऽन्यान्र्विनिन्दसि ॥६९॥
पश्यता हसतामोघं आत्मदोषमजानता ।
अपर्याप्तमहं मन्ये परं दोषविमर्शनाम् ॥७०॥

मैं ऐसा मानता हूँ कि अब भगवान् रुद्र के तादाम्य के संयोग से सिद्धि को प्राप्त हो गये हैं। हे मुने ! यह सिद्धि की प्राप्ति बहुत ही थोड़े समय में हो जायगी ।६४। बहुधा आप आज अपनी माता का हनन करके सभी लोगों के द्वारा निरादृत हो गये हैं और तपस्या के करने के बहाने से इस निर्जन वन में सबसे निरादर पाकर प्रवृत्त हो गये हैं ।६५। गुरु-स्त्री और ब्रह्महत्या से समुत्पन्न पातक के दूर करने के लिए ही आप तपश्चर्या का समाचरण कर रहे हैं सो वह पातक इस तप से कभी भी विनष्ट नहीं होता है ।६६। अन्य प्रकार के किये हुए पातकों के निश्चित रूप से प्रायश्चित्त भी हैं। आप यह समझ लेवें कि जो माता से द्रोह करने वाले हैं कहीं भी उनके पातकों का प्रायश्चित्त नहीं है।६६। हे राम ! यदि आपको यह सम्मत है कि अहिंसा के लक्षण वाला धर्म है जो कि सभी लोकों में माना गया है तो फिर आपने ही अपने ही हाथ से अपनी माता को कैसे काट दिया था ? ।६८। समस्त लोकों में परमाधिक निन्दित घोर माता का वध करके फिर बड़े धार्मिक बनकर अपनी इच्छा से अन्य लोगों की विशेष निन्दा कर रहे हैं ।६९। इस अमोघ अपने दोष को देखते हुए भी उसको नहीं जानते हैं और हँस रहे हैं। मैं तो इस दूसरों के दोषों के विर्शना को पर्याप्त नहीं मानता हूँ ।७०।