संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२२२ । [ ब्रह्माण्ड पुराण
मुनि के द्वारा उस मन्त्री से कहा गया था तो वह मन्त्री काल से प्रेरित होकर उस दुष्कर्म में प्रवृत्त हो गया था और बल (सेना) से समन्वित उस मन्त्री ने परम सुदृढ़ पाशों से उस होम धेनु को बाँध करके अपने साथ ले जाने के लिये खींचा था ।५। इसके अनन्तर क्रोध से भविष्य में होने वाले कर्म से प्रेरित होते हुए जमदग्नि ने गौ के खींचते हुए उस मन्त्री को अपनी शक्ति को भरपूर लगाकर जैसी शक्ति उनमें थी उसी के अनुसार रोका था ।६। उन्होंने कहा था कि मैं अपने जीते जी इस धेनु को नहीं छोड़ूँगा। यह कहते हुए उनको बड़ा क्रोध उत्पन्न हो गया और उस महामुनि ने बड़ी दृढ़ता के साथ अपनी दोनों बाहुओं को उस धेनु क कण्ठ में डालकर उसको बलपूर्वक पकड़ लिया था ।७।
ततः क्रोधपरीतात्मा चन्द्रगुप्तोऽतिनिर्घृणः ।
उत्सारयध्वमित्येनमादिदेश स्वसैनिकान् ॥८
अप्रधृष्यतमं लोके तमृषिं राजकिंकराः ।
भर्त्राज्ञया प्रहृत्यैनं परिवव्रुः समंततः ॥६
दंडै कशाभिर्लगुडैर्वनिघ्नंतश्च मुष्टिभिः ।
ते समुत्सारयन् धेनोः सुदूरतरमंतिकात् ॥१०
स तथा हन्यमानोऽपि व्यथितः क्षमयान्वितः ।
न चुक्रोधाक्रोधनत्वं सतो हि परमं धनम् ॥११
स च शक्तः स्वतपसा संहर्तुमपि रक्षितुम् ।
जगत्सर्वं क्षयं तस्य चिन्तयन्न प्रचुक्रुधे ॥१२
स पूर्वं क्रोधनोऽत्यर्थं मातुरर्थे प्रसादितः ।
रामेणाभूत्ततो नित्यं शांत एव महातपाः ॥१३
स हन्यमानः सुभृशं चूर्णितांगास्थिबंधनः ।
निपपात महातेजा धरण्यां गतचेतनः ॥१४
इसके अनन्तर क्रोध से परीत आत्मा वाले उस अत्यन्त नीच चन्द्रगुप्त ने अपने सैनिकों को आज्ञा दे दी थी कि इस मुनि को बल पूर्वक हटा दो ।८। वह मुनि इस लोक में ऐसे थे कि कोई भी उनको प्रधर्षित नहीं कर सकता था तथापि राजा के किंकरों ने उस ऋषि को अपने स्वामी की आज्ञा