भारतकोश
संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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जमदग्नि-वध ] [ २२३

से बलपूर्वक चारों ओर से उसको घेर लिया था। सैनिकों ने सेतु के समीप से बहुत दूर तक उस ऋषि को हटाते हुए उस पर दण्डों से—कशाओं से—लाठियों से—और घूँसों से पीट रहे थे ॥९-१०॥ वह ऋषि इस तरह से पीटे और मारे जाने पर भी बहुत व्यथित होकर क्रोध से संयुत तो हो गया भी उसने विशेष क्रोध का भाव प्रकट नहीं किया था क्योंकि वे यह भी जानते थे कि क्रोध का न करना सत्पुरुष का परम धन होता है ॥११॥ वह मुनिवर अपने तप के प्रभाव से शत्रु का संहार करने के लिए और अपनी रक्षा करने में भी परम समर्थ थे किन्तु यह सम्पूर्ण जगत् का क्षय है यही विचारते हुए उन्होंने विशेष क्रोध नहीं किया था ॥१२॥ वह पूर्वकाल में अत्यधिक क्रोध करने वाले थे किन्तु राम ने अपनी माता के लिए उनको प्रसादित किया था। तभी से फिर वे महान तपस्वी नित्य राम शान्त हो गये थे ॥१३॥ वे मुनि बहुत ही अधिक मारे पीटे गये थे उस मार के प्रहारों से उनकी मज्जू की अस्थियों के बन्धन सब चूर्णित हो गये थे। और फिर वह महान् तेज वाले मुनि चेतना शून्य होकर भूमि में गिर गये थे ॥१४॥

तस्मिन्मुनौ निपतिते स दुरात्मा विशंकितः ।
किंकरानादिशच्छीघ्रं धेनोरानयने बलात् ॥१५
ततः सवत्सां तां धेनुं बद्ध्वा पाशैर्दृढैर्नृपाः ।
कशाभिरभिहन्यंत चक्रुषुश्च निनीषया ॥१६
आकृष्यमाणा बहुभिः कशाभिर्लगुडैरपि ।
हन्यमाना भृशं तैश्च चुक्रुधे च पयस्विनी ॥१७
व्यथितातिकशापातैः क्रोधेन महतान्विता ।
आकृष्य पाशान् सुदृढान् कृत्वाऽऽत्मानममोचयत् ॥१८
विमुक्तपाशबंधा सा सर्वतोऽभिवृता बलैः ।
हुंकारवं प्रकुर्वाणा सर्वतोऽह्यपतद्रुषा ॥१९
विषाणखुरपुच्छाग्रैरभिहत्य समंततः ।
राजमंत्रिबलं सर्वं व्यद्रावयदमर्षिता ॥२०
विद्राव्य किंकरान्सर्वास्तरसैव पयस्विनी ।
पश्यतां सर्वभूतानां गगनं प्रत्यपद्यत ॥२१