भारतकोश
संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 220

२२४ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

विशेष शंका से युक्त उस दुष्ट आत्मा वाले ने उस महामुनि के धरणी पर गिर जाने पर अपने किंकरों को आदेश दिया था कि बल पूर्वक बहुत ही शीघ्र उस धेनु का आनयन करें अर्थात् उसको ले जावें ।१५। इसके पश्चात् हे नृप ! वत्स के सहित उस धेनु को परम सुदृढ़ पाशों से बाँधकर चाबुकों के प्रहारों से उसको पीटते हुए ले जाने की इच्छा से वे किंकर उसे खींच रहे थे ।१६। जब बहुत से किंकरगणों के द्वारा वह खींची जा रही थी तथा चाबुकों से और लाठियों से मारी-पीटी जा रही थी तो वह तपस्विनी उनसे बहुत ही क्रोध में भर गयी थी ।१७। अत्यधिक चाबुकों के प्रहार उस पर हुए थे तो वह धेनु बहुत व्यथित हो गयी थी और महान क्रोध से भी समन्वित हो गयी थी फिर उस धेनु ने उस सुदृढ़ पाशों को खींचकर अपने आपको उन से छुड़वा लिया था ।१८। जब पाशों के बन्धन से वह विमुक्त हो गयी थी तो सैनिकों ने सब ओर से घेर लिया था। उस समय में क्रोध से हुंहा की ध्वनि करते हुई वह सभी ओर आक्रमण करने वाली हो गयी थी ।१६। फिर अत्यन्त अमर्षित होकर उसने अपने सभी ओर में विषाण-खुर और पूँछ के अग्रभाग से सम्पूर्ण राजा के मन्त्री की सेना को वहाँ से दूर खदेड़ दिया था ।२०। वह पयस्विनी समस्त किंकरों को वहाँ से दूर भगा कर सबके देखते हुए बड़े ही वेग से अन्तरिक्ष में चली गयी थी ।२१।

ततस्ते भग्नसंकल्पाः संभग्नक्षतविग्रहाः । प्रसह्य बद्ध्वा तद्वत्सं जग्मुरेवातिनिर्घृणाः ।।२२।। पयस्विनीं विना वत्सं गृहीत्वा किंकरैः सह । स पापस्तरसा राज्ञः सन्निधिं समुपागमत् ।।२३।। गत्वा समीपं नृपतेः प्रणम्यास्मै प्रशंसकृत् । तद्वृत्तांतमशेषेण व्याचचक्षे ससाध्वसः ।।२४।।

इसके अनन्तर वे सब अपने संकल्पों के भग्न हो जाने वाले हो गये थे और उनके सबके शरीर क्षतों से प्रभग्न हो गये थे। वे अत्यन्त जघन्य बलपूर्वक उस धेनु के वत्स को ही बाँधकर वहाँ से चले गये थे ।२२। फिर वह पापात्मा बिना पयस्विनी के उसके वत्स का ग्रहण करके अपने सेवकों के साथ राजा के समीप में समागत हो गया था ।२३। राजा के समीप में गमन करके प्रशंसा करने वाले उसने राजा को प्रणाम किया था और भय से भीत उसने वहाँ का सम्पूर्ण वृत्तान्त राजा के समक्ष में वर्णित किया था ।२४।

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