संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२२६ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
साथ था, हे राजन् ! रेणुका सहसा अपने आश्रम से निकली थी ।५। इसके पश्चात उस रेणुका ऋषि पत्नी ने सम्पूर्ण अंगों में क्षतों वाले-रुधिर से लथ-पथ-चेष्टा से रहित अर्थात् बेहोश और भूमि पर पड़े हुए अपने पति को देखा था ।६। इसके अनन्तर उस रेणुका अपने भर्त्ता को चेतना से शून्य निहत (मृत) मानकर वज्राघात से चोट खाई हुई के समान मूच्छित होकर भूमि पर गिर गयी ।७।
चिरादिव पुनर्भूमॆरुत्थायातीव दुःखिता ।
पतित्वोत्थाय सा भूयः सुस्वरं प्ररुरोद ह ॥८
विललाप च सात्यर्थं धरणीधूलिधूसरा ।
अश्रुपूर्णमुखी दीना पतिता शोकसागरे ॥९
हा नाथ प्रिय धर्मज्ञ दाक्षिण्यामृतसागर ।
हा धिगत्यंतशांतं त्वं नैव कांश्चेत चेदृशम् ॥१०
आश्रमादभिनिष्क्रांतः सहसा व्यसनार्णवे ।
क्षिप्तवानाथामगाधे मां क्व च यातोऽसि मानद ॥११
सतां साप्तपदे मैत्रे मुषिताऽहं त्वया सह ।
यासि यत्र त्वमेकाकी तत्र मां नेतुमर्हसि ॥१२
दृष्ट्वा त्वामीदृशावस्थमचिराद्धृदयं मम ।
न दीर्यते महाभाग कठिनाः खलु योषितः ॥१३
इत्येवं विलपंती सा रुदती च मुहुर्मुहुः ।
चुक्रोश रामरामेति भृशं दुःखपरिप्लुता ॥१४
बहुत देर में फिर भूमि से उठकर वह अत्यन्त दुःखित हुई थी और बारम्बार भूमि में उठकर और फिर पछाड़ खाकर गिरती हुई ऊँचे स्वर से उसने रुदन किया था ।८। धरणी की धूल से धूसर होती हुई उसने बहुत ही अधिक विलाप किया था । उसका मुख झर-झर गिरते हुए आंसुओं से संयुक्त और परम दीन होकर शोक के महान् सागर में निमग्न हो गयी थी ।९। उसने अपने करुण क्रन्दन में कहा था हा नाथ ! आप तो मेरे परमप्रिय थे और आप धर्म के पूर्ण ज्ञाता थे । हे स्वामिन् ! आप दाक्षिण्य रूपी अमृत के महान् सागर थे । हा ! मुझे धिकार है आप तो अत्यन्त शान्त स्वरूप