भारतकोश
संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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परशुराम की प्रतिज्ञा ] [ २२७

वाले थे किन्तु इस प्रकार से आपने कभी भी काङ्क्षा नहीं की थी। १०। हे मान प्रदान करने वाले ! अभी-अभी तो आप अपने आश्रम से निकले थे। तुरन्त ही अनाथ मुझको दुःखों के महान् घोर सागर में पटककर आप कहाँ पर चले गये हैं। ११। सत्पुरुषों की सप्तपदी की मित्रता में मुझे अपने ग्रहण किया था अब मैं आपसे उस सप्तपदी के विपरीत मुषित हो रही हूँ कि आपका सहवास मेरा छूट रहा है। जहाँ पर भी आप अकेले जा रहे हैं वहीं पर मुझको भी अपने ही साथ में ले जाने के योग्य आप हैं। १२। आपको ऐसी मूच्छित एवं मृत दशा में पतित हुओं को देखकर भी तुरन्त ही मेरा हृदय विदीर्ण नहीं हो रहा है—यह क्या बात है। निश्चय ही स्त्रियों का हृदय बहुत ही निष्ठुर होता है। १३। इस प्रकार से महान् घोर विलाप करती हुई और बार-बार क्रन्दन करती हुई हे राम ! हे राम ! यह कहकर अत्यन्त दुःख में परिप्लुत होकर रुदन कर रही थी। १४।

तावद्रामोऽपि स वनात्समिद्भारसमन्वितः । अकृतव्रणसंयुक्तः स्वाश्रमाय न्यवर्त्तत ॥१५ अपश्यद्भयशंसीनि निमित्तानि बहूनि सः । पश्यन्नुद्विग्नहृदयस्तूर्णं प्रापाश्रमं विभुः ॥१६ तमायांतमभिप्रेक्ष्य रुदती सा भृशातुरा । नवीभूतेव शोकेन प्रारुदद्रेणुका पुनः ॥१७ रामस्य पुरतो राजन्भर्तृव्यसनपीडिता । उभाभ्यामपि हस्ताभ्यामुदरं समताडयत् ॥१८ मार्गे विदितवृत्तांतः सम्यग्रामोऽपि मातरम् । कुररीमिव शोकार्त्तां दृष्ट्वा दुःखमुपेयिवान् ॥१९ धैर्यमारोप्य मेधावी दुःखशोकपरिप्लुतः । नेत्राभ्यामश्रुपूर्णाभ्यां तस्थौ भूमावधोमुखः ॥२० तं तथागतमालोक्य रामं प्राहाकृतव्रणः । किमिदं भृगुशार्दूल नैतत्त्वय्युपपद्यते ॥२१

तब तक वह राम समिधाओं के भार का वहन करते हुए अकृत व्रण के सहित वन से अपने आश्रम के लिए वापिस आया था । १५। मार्ग में उस