भारतकोश
संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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२२८ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

राम ने किसी आने वाले भय की सूचना देने वाले बहुत से अशकुनों को देखा था और उनको देखते हुए उसका हृदय अधिक उद्विग्न हो रहा था । फिर वह अपने आश्रम में पहुँचा था ।१६। उस अपने पुत्र राम को आते हुए देखकर वह रेणुका अत्यन्त आतुर होकर रुदन करने लगी तथा उसका वह शोक नया सा हो गया था और फिर वह दाढ़ मारकर रुदन कर रही थी ।१७। हे राजन् ! अपने पुत्र राम के सामने अपने भर्त्ता के वियोग जन्म दुःख से बहुत ही उत्पीड़ित होकर उसने दोनों करों से अपने वक्ष-स्थल को भली भाँति ताड़ित किया था ।१८। राम ने भी आते हुए मार्ग में ही यह सब वृत्तान्त जान लिया था और जब उसने अपनी जननी को शोक से अधिक आर्त्त होकर कुररी के समान विलाप-कलाप करती हुई देखा था तो उसको बड़ा ही दुःख प्राप्त हुआ था ।१९। राम बहुत ही मेधा सम्पन्न थे उन्होंने धैर्य का सहारा लिया था जो कि उस समय में दुःख और शोक में निमग्न था । उसके दोनों नेत्रों में आँसू भरे हुए थे । वह भूमि पर ही नीचे की ओर मुख करके स्थित हो गया था ।२०। उस समय में अकृत व्रण ने राम को उस प्रकार की अवस्था में अवस्थित देखकर राम से कहा था—हे भृगुकुल में शार्दूल के सदृश पुरुष ! यह क्या हो रहा है ? ऐसा शोक मग्न हो जाना आपके लिए उचित प्रतीत नहीं हो रहा है ।२१।

न त्वादृशा महाभाग भृशं शोचंति कुत्रचित् । धृतिमंतो महांस्तु दुःखं कुर्वंति न व्यये ॥२२

शोकः सर्वेन्द्रियाणां हि परिशोषप्रदायकः । त्यज शोकं महाबाहो न तत्पात्रं भवादृशाः ॥२३

ऐहिकामुष्मिकार्थानां नूनमेकांतरोधकः । शोकस्तस्यावकाशं त्वं कथं हृदि नियच्छसि ॥२४

तत्त्वं धैर्यधनो भूत्वा परिसांत्वय मातरम् । रुदतीं बत वैधव्यशंकापहृतचेतनाम् ॥२५

नैवागमनमस्तीह व्यतिक्रांतस्य वस्तुनः । तस्मादतीतमखिलं त्यक्त्वा कृत्यं विचिंतय ॥२६

इत्येवं सांत्वमानश्च तेन दुःखसमन्वितः । रामः संस्तंभयामास शनैरात्मानमात्मना ॥२७