भारतकोश
संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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परशुराम की प्रतिज्ञा ] [ २२६

दुःखशोकपरीता हि रेणुका त्वरुदन्मुहुः । त्रिःसप्तकृत्वो हस्ताभ्यामुदरं समताडयत् ॥२८

हे महाभाग ! आपके समान परम धीर और ज्ञान सम्पन्न पुरुष किसी भी दशा में अत्यधिक शोक नहीं किया करते हैं। जो धैर्यशाली महान् पुरुष हुआ करते हैं वे हानि होने पर बहुत दुःख नहीं किया करते हैं।२२। यह शोक बहुत ही बुरा होता है जो कि समस्त इन्द्रियों का परिपोषण करने वाला है। हे महाबाहो ! अब आप इस शोक का परित्याग कर दीजिए। आपके समान पुरुष शोक करने के पात्र नहीं हुआ करते हैं।२३। शोक तो निश्चय ही लौकिक और परमार्थिक प्रयोजनों का एकान्त अवरोधक होता है फिर आप अपने हृदय में ऐसे दुःखद शोक को अवकाश क्यों दे रहे हैं ? ।२४। इस कारण से अब आप धैर्य के धन वाले होकर अर्थात् धीरज धारण करके रुदन करती हुई और विधवा होने की विभीषिका से बुद्धि हीन होकर पड़ी हुई अपनी माता को परि सान्त्वना दीजिए ।२५। इस संसार में जो भी वस्तु अतिक्रान्त हो गई है अर्थात् जो प्राणी देह का त्याग कर चल बसा है उसका फिर यहाँ उसी रूप में आगमन कभी भी नहीं होता है। इस कारण से जो कुछ भी व्यतीत हो गया है उस सबका त्याग करके आगे जो भी करने योग्य कृत्य हैं उनका ही परिचिन्तन आप करिए ।२६। इस रीति से उसके द्वारा सान्त्वना दिये हुए राम ने परम दुःख से समन्वित होते हुए भी धीरे-धीरे अपनी ही आत्मा से अर्थात् अपने ही आत्म ज्ञान से अपने आपको संस्तम्भित दिया था ।२७। रेणुका तो महान् और परम घोर शोक से घिरी हुई होकर बारम्बार रुदन कर रही थी और उसने अपने दोनों करों से इक्कीस बार अपने वक्षःस्थल को प्रताड़ित किया था ।२८।

तावत्तदंतिकं रामः समभ्येत्याश्रुलोचनः । रुदतीमलम्बेति सांत्वयामास मातरम् ॥२६

उवाचापनयन्दुःखाद्भर्तृशोकपरायणाम् । त्रिःसप्तकृत्वो यदिदं त्वया वक्षः समाहतम् ॥३०

तावत्संख्यमहं तस्मात्क्षत्रजातमशेषतः। हनिष्ये भुवि सर्वत्र सत्यमेतद्ब्रवीमि ते ॥३१

तस्मात्त्वं शोकमुत्सृज्य धैर्यमातिष्ठ सांप्रतम् । नास्त्येव नूनमायातमतिक्रांतस्य वस्तुनः ॥३२