संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२३० ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
इत्युक्ता रेणुका तेन भृशं दुःखान्विताऽपि सा । कृच्छ्राद्धैर्यं समालंब्य तथेति प्रत्यभाषत ॥३३ ततो रामो महाबाहुः पितुः सह सहोदरैः । अग्नौ सत्कर्तु मारेभे देहं राजन्यथाविधि ॥३४ भर्तृ शोकपरीतांगी रेणुकापि दृढव्रता । पुत्रान्सर्वान्समाहूय त्विदं वचनमब्रवीत् ॥३५
इसी बीच में राम ने अपनी जननी के समीप में समुपस्थित होकर अपनी आँखों में भरे हुए अश्रुओं से समन्वित होते हुए रुदन करने वाली रेणुका से कहा था कि धीरज धारण करो—इस तरह से अपनी माता को सान्त्वना दी थी ।२६। अपने स्वामी के वियोग जन्य शोक में डूबी हुई उस माता रेणुका के दुःख को दूर करते हुए उस राम ने कहा था कि आपने जो यह इस समय में इक्कीस बार अपने वक्षःस्थल को प्रताड़ित किया है ।३०। उतनी ही बार संख्या में मैं इस कारण से इस भूमण्डल में सर्वत्र क्षत्रिय जाति का पूर्णरूप से हनन करूँगा—यह मैं आपके समक्ष में पूर्णतया सत्य बोल रहा हूँ अर्थात् इस कार्य में लेशमात्र भी त्रुटि नहीं होगी ।३१। इसलिए अब आप इस शोक का परित्याग करके अपने हृदय में धैर्य धारण कीजिए । यह तो निश्चित बात है कि जो वस्तु यहाँ से चली गयी है उसका पुनः यहाँ पर आगमन नहीं होता है अर्थात् मृत प्राणी फिर कितना ही चाहे शोक-दुःख किया जावे वापिस नहीं आया करता है । अतः फिर इतना अधिक शोक करना व्यर्थ ही है ।३२। उस राम के द्वारा इस प्रकार से समझाई हुई रेणुका असह्य दुःख के भार से समन्वित थी तथापि बड़ी कठिनाई से धैर्य धारण किया था और अब विशेष शोक मैं नहीं करूंगी—अपने पुत्र राम को उत्तर दिया था ।३३। हे राजन् ! इसके उपरान्त राम ने अपने सहोदर भाइयों के साथ विधि पूर्वक अपने पिता के देह को अग्नि में दाह करने के कार्य का आरम्भ किया था ।३४। अपने भर्त्ता के वियोग से समुत्पन्न शोक से परीत अङ्गों वाली तथा परम सुदृढ़ पतिव्रत धर्म से युक्त रेणुका ने भी अपने समस्त पुत्रों को बुलाकर उनसे यह वचन कहा था ।३५।
रेणुकोवाच—अहं वः पितरं पुत्राः स्वर्गंतं पुण्यशीलिनम् । अनुगंतुमिहेच्छामि तन्मेऽनुज्ञातुमर्हथ ॥३६