संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपरशुराम की प्रतिज्ञा ] [ २३१
असह्यदुःखं वैधव्यं सहमाना कथं पुनः । भर्त्रा विरहिता तेन प्रवर्त्तिष्ये विनिन्दिता ॥३७ तस्मादनुगमिष्यामि भर्त्तारं दयितुं मम । यथा तेन प्रवर्त्तिष्ये परत्रापि सहानिशम् ॥३८ ज्वलंतमिममेवाग्निं संप्रविश्य चिरादिव । भर्तुर्मम भविष्यामि पितृलोकप्रियातिथिः ॥३६ अनुवादमृते पुत्रा भवद्भिस्तत्र कर्मणि । प्रतिभूय न वक्तव्यं यदि मत्प्रियमिच्छथ ॥४० इत्येवमुक्त्वा वचनं रेणुका दृढनिश्चया । अग्निं प्रविश्य भर्त्तारमनुगंतुं मनो दधे ॥४१ एतस्मिन्नेव काले तु रेणुकां तनयैः सह । समाभाष्याऽतिगंभीरा वागुवाचाशरीरिणी ॥४२
रेणुका ने कहा—हे पुत्रो ! मैं अब आप लोगों के परमाधिक पुण्य शील स्वर्ग में गये हुए पिता का ही मैं अनुगमन यहाँ करना चाहती हूँ सो आप लोग सब मुझे ऐसा करने की आज्ञा देने के लिए योग्य होते हो ।३६। विधवा हो जाने का दुःख बहुत ही असह्य होता है उसे सहन करती हुई मैं कैसे-कैसे रहूँगी और अपने स्वामी के विरह वाली विशेष रूप से निन्दित होकर इस संसार में अपना जीवन प्रवृत्त करूँगी ।३७। इस कारण से मैं अपने परम प्रिय स्वामी का अनुगमन करूँगी अर्थात् उनके ही देह के साथ सती हो जाऊँगी जिससे परलोक में भी निरन्तर उनके ही साथ रह सकूँगी ।३८। जलती हुई इसी अग्नि में प्रवेश करके कुछ ही समय में मैं अपने स्वामी की पितृलोक में प्रिय अतिथि बन जाऊँगी ।३६। हे पुत्रो ! यदि आप लोग मेरे अभीप्सित चाहते हैं अर्थात् मेरे प्यारे बनना चाहते हैं तो अनुवाद के बिना उस कर्म में आप लोगों को प्रतिकूल होकर कुछ भी नहीं बोलना चाहिए ।४०। इस रीति से इन वचनों को ही कहकर रेणुका सुदृढ़ निश्चय वाली हो गयी थी तथा अग्नि में प्रवेश करके अपने स्वामी का अनुगमन करने के लिये उसने मन में ठान ली थी ।४१। इसी काल में पुत्रों के सहित रेणुका को सम्बोधित करके अत्यन्त गम्भीर बिना शरीर वाणी अर्थात् अन्तरिक्ष में कही हुई वाणी ने कहा था ।४२।