संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२३२ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
हे रेणुके स्वतनयैर्गिरं मेऽवहिता शृणु ।
मा कार्षीः साहसं भद्रे प्रवक्ष्यामि प्रियं तव ॥४३
साहसो नैव कर्त्तव्यः केनाप्यात्महितैषिणा ।
न मर्त्तव्यं त्वया सर्वो जीवन्भद्राणि पश्यति ॥४४
तस्माद्धैर्यधना भूत्वा भव त्वं कालकांक्षिणी ।
निमित्तमन्तरीकृत्य किंचिदेव शुचिस्मिते ॥४५
अचिरेणैव भर्त्ता ते भविष्यति सचेतनः ।
उत्पन्नजीवितेन त्वं कामं प्राप्स्यसि शोभने ।
भवित्री चिररात्राय बहुकल्याणभाजनम् ॥४६
वसिष्ठ उवाच-
इति तद्वचनं श्रुत्वा धृतिमालंब्य रेणुका ।
तद्वाक्यगौरवाद्धर्षमवापुस्तनयाश्च ते ॥४७
ततो नीत्वा पितुर्देहमाश्रमाभ्यंतरं मुनेः ।
शाययित्वा निवाते तु परितः समुपाविशन् ॥४८
तेषां तत्रोपविष्टनामप्रहृष्टात्मचेतसाम् ।
निमित्तानि शुभान्यासन्ननेकानि महांति च ॥४९
हे रेणुके ! परम सावधान होकर अपने पुत्रों के सहित मेरी वाणी का श्रवण करो । हे भद्रे ! तुम साहस मत करो । मैं आपका प्रिय वचन कहूँगा ।४३। अपनी आत्मा के हित की अभिलाषा रखने वाले किसी को भी साहस कभी नहीं करना चाहिए । आपको नहीं मरना चाहिए क्योंकि जो प्राणी जीवित रहता है वह शुभ कर्मों को देखा करता है ।४४। इसलिए आप धैर्य के धन वाली होकर काल की प्रतीक्षा की आकाङ्क्षा वाली होओ । हे शुचि स्मित वाली ! भले ही कुछ ही निमित्त को अन्तरित बनाकर ऐसा करो ।४५। बहुत ही स्वल्प समय में आपके भर्त्ता सचेतन हो जायेंगे अर्थात् जीवित हो जायेंगे । हे शोभने ! जब उनमें जीवन समुत्पन्न हो जायगा तो आपकी कामना पूर्णतया प्राप्त हो जायगी और फिर विशेष अधिक काल पर्यन्त अनेक कल्याणों की भाजन होने वाली होंगी ।४६। वसिष्ठ जी ने कहा- इस प्रकार के उस अन्तरिक्ष वाणी के वचन का श्रवण करके रेणुका ने धैर्य