संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपरशुराम की प्रतिज्ञा ] [ २३३
का आलम्बन ग्रहण किया था। और उसके जो पुत्र थे उन्होंने भी उसके वचनों के गौरव से परम प्रसन्नता प्राप्त की थी ।४७। इसके पश्चात् उन्होंने उस मुनि अपने पिता के मृत शरीर को आश्रम को भीतर ले जाकर रख दिया था और उसको वहाँ लिटाकर निवात में वे उसके चारों ओर बैठ गये थे ।४८। जिस समय में वे वहाँ पर बहुत ही खिन्न आत्मा और मनों वाले बैठे हुए थे तो उस बेला में उनको बहुत से परम शुभ एवं महान् निमित्त हुए थे। अच्छे शकुन दिखाई दिये थे ।४६।
तेन ते किंचिदाश्वस्तचेतसो मुनिपुंगवाः ।
निषेदुः सहिता मात्रा कांक्षंतो जीवितं पितुः ॥५०
एतस्मिन्नंतरे राजन्भृगुवंशधरो मुनिः ।
विधेर्बलेन मतिमांस्तत्रागच्छद्यदृच्छया ॥५१
अथर्वणां विधिः साक्षाद्वेदवेदांगपारगः ।
सर्वशास्त्रार्थवित्प्राज्ञः सकलासुरवंदितः ॥५२
मृतसंजीवनीं विद्यां यो वेद मुनिदुर्लभाम् ।
यथाहतान्मृतान्देबैरूत्थापयति दानवान् ॥५३
शास्त्रमौशनसं येन राज्ञां राज्यफलप्रदम् ।
प्रणीतमनुजीवंति सर्वेऽद्यापीह पार्थिवाः ॥५४
स तदाश्रममासाद्य प्रविष्टोऽन्तमहामुनिः ।
ददर्श तदवस्थांस्तान्सर्वान्दुःखपरिप्लुतान् ॥५५
अथ ते तु भृगुं दृष्ट्वा वंशस्य पितरं मुदा ।
उत्थायास्मै ददुश्चापि सत्कृत्य परमासनम् ॥५६
इस रीति से जब शुभ शकुन दिखाई दिये तो उनके देखने से वे श्रेष्ठ मुनिगण परम आश्वस्त मन वाले हो गये थे अर्थात् उनको कुछ शुभाशा हुई थी। वे सभी अपने पिता के जीवित की आकाङ्क्षा करते हुए माता के साथ वहाँ पर बैठ गये थे ।५०। हे राजन् ! इसी बीच में भृगु के वंश को धारण करने वाले मतिमान् मुनि विधि के बल से यदृच्छा से ही वहाँ पर समागत हो गये थे ।५१। वे मुनि अथर्व वेद की साक्षात् विधि के स्वरूप वाले थे और अन्य सभी वेदों तथा वेदोंके अङ्ग शास्त्रों के पारगामी मनीषी