भारतकोश
संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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२३४ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

थे । वे समस्त शास्त्रों के पारगामी मनीषी थे । वे समस्त शास्त्रों के तात्त्विक अर्थों के ज्ञाता विद्वान् थे और समस्त असुरों के द्वारा वन्दित थे ।५२। जो मनियों के लिये भी अत्यन्त दुर्लभ होती है ऐसी मृत प्राणियों को भी जीवित कर देने वाली विद्या को जानते थे । जब भी देवों के द्वारा रण में दानव निकृत हो जाया करते हैं तो इसी मृत संजीवनी विद्या से उनको उठा दिया करते हैं अर्थात् जीवित बना देते हैं ।५३। जिस महामुनि ने औशनस शास्त्र को प्रणीत किया था जो राजाओं को राज्य के फल का प्रदान करने वाला है और आज भी यहाँ पर नृपगण अनुजीवित रहते हैं ।५४। वह महामुनि उस आश्रम में पहुँच कर अन्दर प्रविष्ट हुए थे और उन्होंने उस अवस्था में अवस्थित सबको दुःख से परिप्लुत हुए देखा था ।५५। इसके अनन्तर उन सबने वंश के पिता भृगु मुनि का दर्शन प्राप्त करके बड़े ही आनन्द के साथ वे सब खड़े हो गये थे और गोत्रोत्थान देकर सबने उनका बड़ा सत्कार किया था तथा प्रणाम करके भृगु मुनि को आसन समर्पित किया था ।५६।

स चाशीभिस्तु तान्सर्वांनभिनंद्य महामुनिः ।
पप्रच्छ किमिदं वृत्तं तत्सर्वं ते न्यवेदयन् ।।५७
तच्छ्रुत्वा स भृगुः शीघ्रं जलमादाय मंत्रवित् ।
संजीविन्या विद्यया तं सिषेच प्रोच्चरन्निदम् ।।५८
यज्ञस्य तपसो वीर्यं ममापि शुभमस्ति चेत् ।
तेनासौ जीवताञ्छीघ्रं प्रसुप्त इव चोत्थितः ।।५९
एवमुक्ते शुभे वाक्ये भृगुणा साधुकारिणा ।
समुत्तस्थावथार्चीकः साक्षाद्गुरुरिवापरः ।।६०
दृष्ट्वा तत्र स्थितं वंद्यं भृगुं स्वस्य पितामहम् ।
ननाम भक्त्या नृपते कृतांजलिरुवाच ह ।।६१

जमदग्निरुवाच–

धन्योऽयं कृतकृत्योऽहं सफलं जीवितं च मे ।।६२
यत्पश्ये चरणौ तेऽद्य सुरसुरनमस्कृतौ ।
भगवन्किं करोम्यद्य शुश्रूषां तव मानद ।।६३