भारतकोश
संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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परशुराम की प्रतिज्ञा ] [ २३५

उन महामुनि ने आशीर्वादों के द्वारा सबका अभिनन्दन करके उनसे उन्होंने पूछा था कि यह क्या हुआ है । इस पर उन्होंने पूरा वृत्तान्त जो भी वहाँ पर घटनाएँ घटित हुई थीं भृगुमुनि की सेवा में निवेदित कर दी थीं ।५७। यह सारा वृत्तान्त सुनकर मन्त्र शास्त्र के महामनीषी भृगु मुनि ने बहुत ही शीघ्र जल लेकर यह उच्चारण करते हुए संजीवनी विद्या से उस जमदग्नि के देह को अभिषिक्त किया था । यदि मेरे तप का और यज्ञ का वीर्य शुभ है तो उसके प्रभाव से यह जमदग्नि सोकर उठे हुए के ही समान शीघ्र ही जीवित हो जावें ।५८-५६। इस प्रकार से इस परम शुभ वाक्य को साधुकारी भृगु मुनि के द्वारा उच्चारित होने पर शीघ्र ही जमदग्नि साक्षात् दूसरे देवगुरु के ही सदृश समुत्थित हो गया था ।६०। जब उठा तो उसने वहाँ पर संस्थित-वन्दना करने के योग्य अपने पितामह भृगु मुनि का दर्शन किया था । हे नृपते ! उस जमदग्नि ने भक्ति की भावना से प्रणाम करके दोनों हाथों को जोड़कर उनसे कहा था ।६१। जमदग्नि ने कहा—मैं परम धन्य तथा कृतकृत्य हो गया हूँ और मेरा जीवन आज सफल हो गया है ।६२। जो सुरगण और असुरों के द्वारा वन्दित आपके चरण कमल हैं उनका आज मैं अपने नेत्रों से अवलोकन कर रहा हूँ । हे मान के प्रदान करने वाले भगवन् ! मैं आपकी इस समय में क्या शुश्रूषा करूँ ? मुझे आप आज्ञा कीजिए ।६३।

पुनीह्यास्मत्कुलं स्वस्य चरणांबुकणैर्विभो । इत्युक्त्वा सहसाऽऽनीतं रामेणार्घ्यं मुदान्वितः ॥६४ प्रददौ पादयोस्तस्य भक्त्यानमितकंधरः । तज्जलं शिरसाऽधत्त सुकुटुम्बो महामनाः ॥६५ अथ सत्कृत्य स भृगुं प्रपच्छ विनयान्वितः । भगवन् किं कृतं तेन राज्ञा दुष्टेन पातकम् ॥६६ यस्यातिथ्यं हि कृतवानहं सम्यग्विधानतः । साधुबुद्ध्या स दुष्टात्मा किं चकार महामते ॥६७ वसिष्ठ उवाच– एवं स पृष्टो मतिमान्भृगुः सर्वविदीश्वरः । चिरं ध्यात्वा समालोच्य कारणं प्राह भूपते ॥६८