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संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished893 पृष्ठ

परशुराम की प्रतिज्ञा ] [ २२६

दुःखशोकपरीता हि रेणुका त्वरुदन्मुहुः । त्रिःसप्तकृत्वो हस्ताभ्यामुदरं समताडयत् ॥२८

हे महाभाग ! आपके समान परम धीर और ज्ञान सम्पन्न पुरुष किसी भी दशा में अत्यधिक शोक नहीं किया करते हैं। जो धैर्यशाली महान् पुरुष हुआ करते हैं वे हानि होने पर बहुत दुःख नहीं किया करते हैं।२२। यह शोक बहुत ही बुरा होता है जो कि समस्त इन्द्रियों का परिपोषण करने वाला है। हे महाबाहो ! अब आप इस शोक का परित्याग कर दीजिए। आपके समान पुरुष शोक करने के पात्र नहीं हुआ करते हैं।२३। शोक तो निश्चय ही लौकिक और परमार्थिक प्रयोजनों का एकान्त अवरोधक होता है फिर आप अपने हृदय में ऐसे दुःखद शोक को अवकाश क्यों दे रहे हैं ? ।२४। इस कारण से अब आप धैर्य के धन वाले होकर अर्थात् धीरज धारण करके रुदन करती हुई और विधवा होने की विभीषिका से बुद्धि हीन होकर पड़ी हुई अपनी माता को परि सान्त्वना दीजिए ।२५। इस संसार में जो भी वस्तु अतिक्रान्त हो गई है अर्थात् जो प्राणी देह का त्याग कर चल बसा है उसका फिर यहाँ उसी रूप में आगमन कभी भी नहीं होता है। इस कारण से जो कुछ भी व्यतीत हो गया है उस सबका त्याग करके आगे जो भी करने योग्य कृत्य हैं उनका ही परिचिन्तन आप करिए ।२६। इस रीति से उसके द्वारा सान्त्वना दिये हुए राम ने परम दुःख से समन्वित होते हुए भी धीरे-धीरे अपनी ही आत्मा से अर्थात् अपने ही आत्म ज्ञान से अपने आपको संस्तम्भित दिया था ।२७। रेणुका तो महान् और परम घोर शोक से घिरी हुई होकर बारम्बार रुदन कर रही थी और उसने अपने दोनों करों से इक्कीस बार अपने वक्षःस्थल को प्रताड़ित किया था ।२८।

तावत्तदंतिकं रामः समभ्येत्याश्रुलोचनः । रुदतीमलम्बेति सांत्वयामास मातरम् ॥२६

उवाचापनयन्दुःखाद्भर्तृशोकपरायणाम् । त्रिःसप्तकृत्वो यदिदं त्वया वक्षः समाहतम् ॥३०

तावत्संख्यमहं तस्मात्क्षत्रजातमशेषतः। हनिष्ये भुवि सर्वत्र सत्यमेतद्ब्रवीमि ते ॥३१

तस्मात्त्वं शोकमुत्सृज्य धैर्यमातिष्ठ सांप्रतम् । नास्त्येव नूनमायातमतिक्रांतस्य वस्तुनः ॥३२

२३० ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

इत्युक्ता रेणुका तेन भृशं दुःखान्विताऽपि सा । कृच्छ्राद्धैर्यं समालंब्य तथेति प्रत्यभाषत ॥३३ ततो रामो महाबाहुः पितुः सह सहोदरैः । अग्नौ सत्कर्तु मारेभे देहं राजन्यथाविधि ॥३४ भर्तृ शोकपरीतांगी रेणुकापि दृढव्रता । पुत्रान्सर्वान्समाहूय त्विदं वचनमब्रवीत् ॥३५

इसी बीच में राम ने अपनी जननी के समीप में समुपस्थित होकर अपनी आँखों में भरे हुए अश्रुओं से समन्वित होते हुए रुदन करने वाली रेणुका से कहा था कि धीरज धारण करो—इस तरह से अपनी माता को सान्त्वना दी थी ।२६। अपने स्वामी के वियोग जन्य शोक में डूबी हुई उस माता रेणुका के दुःख को दूर करते हुए उस राम ने कहा था कि आपने जो यह इस समय में इक्कीस बार अपने वक्षःस्थल को प्रताड़ित किया है ।३०। उतनी ही बार संख्या में मैं इस कारण से इस भूमण्डल में सर्वत्र क्षत्रिय जाति का पूर्णरूप से हनन करूँगा—यह मैं आपके समक्ष में पूर्णतया सत्य बोल रहा हूँ अर्थात् इस कार्य में लेशमात्र भी त्रुटि नहीं होगी ।३१। इसलिए अब आप इस शोक का परित्याग करके अपने हृदय में धैर्य धारण कीजिए । यह तो निश्चित बात है कि जो वस्तु यहाँ से चली गयी है उसका पुनः यहाँ पर आगमन नहीं होता है अर्थात् मृत प्राणी फिर कितना ही चाहे शोक-दुःख किया जावे वापिस नहीं आया करता है । अतः फिर इतना अधिक शोक करना व्यर्थ ही है ।३२। उस राम के द्वारा इस प्रकार से समझाई हुई रेणुका असह्य दुःख के भार से समन्वित थी तथापि बड़ी कठिनाई से धैर्य धारण किया था और अब विशेष शोक मैं नहीं करूंगी—अपने पुत्र राम को उत्तर दिया था ।३३। हे राजन् ! इसके उपरान्त राम ने अपने सहोदर भाइयों के साथ विधि पूर्वक अपने पिता के देह को अग्नि में दाह करने के कार्य का आरम्भ किया था ।३४। अपने भर्त्ता के वियोग से समुत्पन्न शोक से परीत अङ्गों वाली तथा परम सुदृढ़ पतिव्रत धर्म से युक्त रेणुका ने भी अपने समस्त पुत्रों को बुलाकर उनसे यह वचन कहा था ।३५।

रेणुकोवाच—अहं वः पितरं पुत्राः स्वर्गंतं पुण्यशीलिनम् । अनुगंतुमिहेच्छामि तन्मेऽनुज्ञातुमर्हथ ॥३६

परशुराम की प्रतिज्ञा ] [ २३१

असह्यदुःखं वैधव्यं सहमाना कथं पुनः । भर्त्रा विरहिता तेन प्रवर्त्तिष्ये विनिन्दिता ॥३७ तस्मादनुगमिष्यामि भर्त्तारं दयितुं मम । यथा तेन प्रवर्त्तिष्ये परत्रापि सहानिशम् ॥३८ ज्वलंतमिममेवाग्निं संप्रविश्य चिरादिव । भर्तुर्मम भविष्यामि पितृलोकप्रियातिथिः ॥३६ अनुवादमृते पुत्रा भवद्भिस्तत्र कर्मणि । प्रतिभूय न वक्तव्यं यदि मत्प्रियमिच्छथ ॥४० इत्येवमुक्त्वा वचनं रेणुका दृढनिश्चया । अग्निं प्रविश्य भर्त्तारमनुगंतुं मनो दधे ॥४१ एतस्मिन्नेव काले तु रेणुकां तनयैः सह । समाभाष्याऽतिगंभीरा वागुवाचाशरीरिणी ॥४२

रेणुका ने कहा—हे पुत्रो ! मैं अब आप लोगों के परमाधिक पुण्य शील स्वर्ग में गये हुए पिता का ही मैं अनुगमन यहाँ करना चाहती हूँ सो आप लोग सब मुझे ऐसा करने की आज्ञा देने के लिए योग्य होते हो ।३६। विधवा हो जाने का दुःख बहुत ही असह्य होता है उसे सहन करती हुई मैं कैसे-कैसे रहूँगी और अपने स्वामी के विरह वाली विशेष रूप से निन्दित होकर इस संसार में अपना जीवन प्रवृत्त करूँगी ।३७। इस कारण से मैं अपने परम प्रिय स्वामी का अनुगमन करूँगी अर्थात् उनके ही देह के साथ सती हो जाऊँगी जिससे परलोक में भी निरन्तर उनके ही साथ रह सकूँगी ।३८। जलती हुई इसी अग्नि में प्रवेश करके कुछ ही समय में मैं अपने स्वामी की पितृलोक में प्रिय अतिथि बन जाऊँगी ।३६। हे पुत्रो ! यदि आप लोग मेरे अभीप्सित चाहते हैं अर्थात् मेरे प्यारे बनना चाहते हैं तो अनुवाद के बिना उस कर्म में आप लोगों को प्रतिकूल होकर कुछ भी नहीं बोलना चाहिए ।४०। इस रीति से इन वचनों को ही कहकर रेणुका सुदृढ़ निश्चय वाली हो गयी थी तथा अग्नि में प्रवेश करके अपने स्वामी का अनुगमन करने के लिये उसने मन में ठान ली थी ।४१। इसी काल में पुत्रों के सहित रेणुका को सम्बोधित करके अत्यन्त गम्भीर बिना शरीर वाणी अर्थात् अन्तरिक्ष में कही हुई वाणी ने कहा था ।४२।

२३२ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

हे रेणुके स्वतनयैर्गिरं मेऽवहिता शृणु ।
मा कार्षीः साहसं भद्रे प्रवक्ष्यामि प्रियं तव ॥४३
साहसो नैव कर्त्तव्यः केनाप्यात्महितैषिणा ।
न मर्त्तव्यं त्वया सर्वो जीवन्भद्राणि पश्यति ॥४४
तस्माद्धैर्यधना भूत्वा भव त्वं कालकांक्षिणी ।
निमित्तमन्तरीकृत्य किंचिदेव शुचिस्मिते ॥४५
अचिरेणैव भर्त्ता ते भविष्यति सचेतनः ।
उत्पन्नजीवितेन त्वं कामं प्राप्स्यसि शोभने ।
भवित्री चिररात्राय बहुकल्याणभाजनम् ॥४६
वसिष्ठ उवाच-
इति तद्वचनं श्रुत्वा धृतिमालंब्य रेणुका ।
तद्वाक्यगौरवाद्धर्षमवापुस्तनयाश्च ते ॥४७
ततो नीत्वा पितुर्देहमाश्रमाभ्यंतरं मुनेः ।
शाययित्वा निवाते तु परितः समुपाविशन् ॥४८
तेषां तत्रोपविष्टनामप्रहृष्टात्मचेतसाम् ।
निमित्तानि शुभान्यासन्ननेकानि महांति च ॥४९

हे रेणुके ! परम सावधान होकर अपने पुत्रों के सहित मेरी वाणी का श्रवण करो । हे भद्रे ! तुम साहस मत करो । मैं आपका प्रिय वचन कहूँगा ।४३। अपनी आत्मा के हित की अभिलाषा रखने वाले किसी को भी साहस कभी नहीं करना चाहिए । आपको नहीं मरना चाहिए क्योंकि जो प्राणी जीवित रहता है वह शुभ कर्मों को देखा करता है ।४४। इसलिए आप धैर्य के धन वाली होकर काल की प्रतीक्षा की आकाङ्क्षा वाली होओ । हे शुचि स्मित वाली ! भले ही कुछ ही निमित्त को अन्तरित बनाकर ऐसा करो ।४५। बहुत ही स्वल्प समय में आपके भर्त्ता सचेतन हो जायेंगे अर्थात् जीवित हो जायेंगे । हे शोभने ! जब उनमें जीवन समुत्पन्न हो जायगा तो आपकी कामना पूर्णतया प्राप्त हो जायगी और फिर विशेष अधिक काल पर्यन्त अनेक कल्याणों की भाजन होने वाली होंगी ।४६। वसिष्ठ जी ने कहा- इस प्रकार के उस अन्तरिक्ष वाणी के वचन का श्रवण करके रेणुका ने धैर्य

परशुराम की प्रतिज्ञा ] [ २३३

का आलम्बन ग्रहण किया था। और उसके जो पुत्र थे उन्होंने भी उसके वचनों के गौरव से परम प्रसन्नता प्राप्त की थी ।४७। इसके पश्चात् उन्होंने उस मुनि अपने पिता के मृत शरीर को आश्रम को भीतर ले जाकर रख दिया था और उसको वहाँ लिटाकर निवात में वे उसके चारों ओर बैठ गये थे ।४८। जिस समय में वे वहाँ पर बहुत ही खिन्न आत्मा और मनों वाले बैठे हुए थे तो उस बेला में उनको बहुत से परम शुभ एवं महान् निमित्त हुए थे। अच्छे शकुन दिखाई दिये थे ।४६।

तेन ते किंचिदाश्वस्तचेतसो मुनिपुंगवाः ।
निषेदुः सहिता मात्रा कांक्षंतो जीवितं पितुः ॥५०
एतस्मिन्नंतरे राजन्भृगुवंशधरो मुनिः ।
विधेर्बलेन मतिमांस्तत्रागच्छद्यदृच्छया ॥५१
अथर्वणां विधिः साक्षाद्वेदवेदांगपारगः ।
सर्वशास्त्रार्थवित्प्राज्ञः सकलासुरवंदितः ॥५२
मृतसंजीवनीं विद्यां यो वेद मुनिदुर्लभाम् ।
यथाहतान्मृतान्देबैरूत्थापयति दानवान् ॥५३
शास्त्रमौशनसं येन राज्ञां राज्यफलप्रदम् ।
प्रणीतमनुजीवंति सर्वेऽद्यापीह पार्थिवाः ॥५४
स तदाश्रममासाद्य प्रविष्टोऽन्तमहामुनिः ।
ददर्श तदवस्थांस्तान्सर्वान्दुःखपरिप्लुतान् ॥५५
अथ ते तु भृगुं दृष्ट्वा वंशस्य पितरं मुदा ।
उत्थायास्मै ददुश्चापि सत्कृत्य परमासनम् ॥५६

इस रीति से जब शुभ शकुन दिखाई दिये तो उनके देखने से वे श्रेष्ठ मुनिगण परम आश्वस्त मन वाले हो गये थे अर्थात् उनको कुछ शुभाशा हुई थी। वे सभी अपने पिता के जीवित की आकाङ्क्षा करते हुए माता के साथ वहाँ पर बैठ गये थे ।५०। हे राजन् ! इसी बीच में भृगु के वंश को धारण करने वाले मतिमान् मुनि विधि के बल से यदृच्छा से ही वहाँ पर समागत हो गये थे ।५१। वे मुनि अथर्व वेद की साक्षात् विधि के स्वरूप वाले थे और अन्य सभी वेदों तथा वेदोंके अङ्ग शास्त्रों के पारगामी मनीषी

२३४ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

थे । वे समस्त शास्त्रों के पारगामी मनीषी थे । वे समस्त शास्त्रों के तात्त्विक अर्थों के ज्ञाता विद्वान् थे और समस्त असुरों के द्वारा वन्दित थे ।५२। जो मनियों के लिये भी अत्यन्त दुर्लभ होती है ऐसी मृत प्राणियों को भी जीवित कर देने वाली विद्या को जानते थे । जब भी देवों के द्वारा रण में दानव निकृत हो जाया करते हैं तो इसी मृत संजीवनी विद्या से उनको उठा दिया करते हैं अर्थात् जीवित बना देते हैं ।५३। जिस महामुनि ने औशनस शास्त्र को प्रणीत किया था जो राजाओं को राज्य के फल का प्रदान करने वाला है और आज भी यहाँ पर नृपगण अनुजीवित रहते हैं ।५४। वह महामुनि उस आश्रम में पहुँच कर अन्दर प्रविष्ट हुए थे और उन्होंने उस अवस्था में अवस्थित सबको दुःख से परिप्लुत हुए देखा था ।५५। इसके अनन्तर उन सबने वंश के पिता भृगु मुनि का दर्शन प्राप्त करके बड़े ही आनन्द के साथ वे सब खड़े हो गये थे और गोत्रोत्थान देकर सबने उनका बड़ा सत्कार किया था तथा प्रणाम करके भृगु मुनि को आसन समर्पित किया था ।५६।

स चाशीभिस्तु तान्सर्वांनभिनंद्य महामुनिः ।
पप्रच्छ किमिदं वृत्तं तत्सर्वं ते न्यवेदयन् ।।५७
तच्छ्रुत्वा स भृगुः शीघ्रं जलमादाय मंत्रवित् ।
संजीविन्या विद्यया तं सिषेच प्रोच्चरन्निदम् ।।५८
यज्ञस्य तपसो वीर्यं ममापि शुभमस्ति चेत् ।
तेनासौ जीवताञ्छीघ्रं प्रसुप्त इव चोत्थितः ।।५९
एवमुक्ते शुभे वाक्ये भृगुणा साधुकारिणा ।
समुत्तस्थावथार्चीकः साक्षाद्गुरुरिवापरः ।।६०
दृष्ट्वा तत्र स्थितं वंद्यं भृगुं स्वस्य पितामहम् ।
ननाम भक्त्या नृपते कृतांजलिरुवाच ह ।।६१

जमदग्निरुवाच–

धन्योऽयं कृतकृत्योऽहं सफलं जीवितं च मे ।।६२
यत्पश्ये चरणौ तेऽद्य सुरसुरनमस्कृतौ ।
भगवन्किं करोम्यद्य शुश्रूषां तव मानद ।।६३

परशुराम की प्रतिज्ञा ] [ २३५

उन महामुनि ने आशीर्वादों के द्वारा सबका अभिनन्दन करके उनसे उन्होंने पूछा था कि यह क्या हुआ है । इस पर उन्होंने पूरा वृत्तान्त जो भी वहाँ पर घटनाएँ घटित हुई थीं भृगुमुनि की सेवा में निवेदित कर दी थीं ।५७। यह सारा वृत्तान्त सुनकर मन्त्र शास्त्र के महामनीषी भृगु मुनि ने बहुत ही शीघ्र जल लेकर यह उच्चारण करते हुए संजीवनी विद्या से उस जमदग्नि के देह को अभिषिक्त किया था । यदि मेरे तप का और यज्ञ का वीर्य शुभ है तो उसके प्रभाव से यह जमदग्नि सोकर उठे हुए के ही समान शीघ्र ही जीवित हो जावें ।५८-५६। इस प्रकार से इस परम शुभ वाक्य को साधुकारी भृगु मुनि के द्वारा उच्चारित होने पर शीघ्र ही जमदग्नि साक्षात् दूसरे देवगुरु के ही सदृश समुत्थित हो गया था ।६०। जब उठा तो उसने वहाँ पर संस्थित-वन्दना करने के योग्य अपने पितामह भृगु मुनि का दर्शन किया था । हे नृपते ! उस जमदग्नि ने भक्ति की भावना से प्रणाम करके दोनों हाथों को जोड़कर उनसे कहा था ।६१। जमदग्नि ने कहा—मैं परम धन्य तथा कृतकृत्य हो गया हूँ और मेरा जीवन आज सफल हो गया है ।६२। जो सुरगण और असुरों के द्वारा वन्दित आपके चरण कमल हैं उनका आज मैं अपने नेत्रों से अवलोकन कर रहा हूँ । हे मान के प्रदान करने वाले भगवन् ! मैं आपकी इस समय में क्या शुश्रूषा करूँ ? मुझे आप आज्ञा कीजिए ।६३।

पुनीह्यास्मत्कुलं स्वस्य चरणांबुकणैर्विभो । इत्युक्त्वा सहसाऽऽनीतं रामेणार्घ्यं मुदान्वितः ॥६४ प्रददौ पादयोस्तस्य भक्त्यानमितकंधरः । तज्जलं शिरसाऽधत्त सुकुटुम्बो महामनाः ॥६५ अथ सत्कृत्य स भृगुं प्रपच्छ विनयान्वितः । भगवन् किं कृतं तेन राज्ञा दुष्टेन पातकम् ॥६६ यस्यातिथ्यं हि कृतवानहं सम्यग्विधानतः । साधुबुद्ध्या स दुष्टात्मा किं चकार महामते ॥६७ वसिष्ठ उवाच– एवं स पृष्टो मतिमान्भृगुः सर्वविदीश्वरः । चिरं ध्यात्वा समालोच्य कारणं प्राह भूपते ॥६८

२३६ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

भृगुरुवाच-शृणु तात महाभाग बीजमस्य हि कर्मणः । यश्च वै कृतवान्पापं सर्वज्ञस्य तवानघ ॥६६ शप्तः पुरा वसिष्ठेन नाशार्थं स महीपतिः । द्विजापराधतो मूढ वीर्यं ते विनशिष्यते ॥७०

हे विभो ! आप अपने चरणों के जल कणों के द्वारा अपने ही इस कुल को पुनीत बनाइए । इतना कहकर आनन्द से समन्वित होते हुए सहसा राम के द्वारा अर्घ्य लाया था ।६४। भक्तिभाव से अपनी गर्दन झुकाने वाले उस जमदग्नि ने उन भृगु मुनि के चरणों के प्रक्षालनार्थ जल समर्पित किया था । महान् यश वाले उसे जमदग्नि ने अपने समस्त कुटुम्ब के सहित उस चरणों के तीर्थ जल को अपने शिर पर धारण किया था ।६५। इसके उपरान्त उनका पूर्ण सत्कार करके परम विनय से समन्वित होते हुए भृगु से पूछा था । हे भगवन् ! आप कृपया बतलाइए कि उस महान् दुष्ट राजा ने यह क्या पातक किया था ? ।६६। जिसका आतिथ्य-सत्कार मैंने बड़े ही विधि-विधान से किया था । हे महामते ! मैंने यह सब बहुत ही अच्छी बुद्धि से किया था और मेरे हृदय में कुछ भी कपट का भाव नहीं था । फिर भी उस आत्मा वाले ने मेरे साथ यह ऐसा क्यों दुर्व्यवहार किया था ।६७। वसिष्ठ जी ने कहा—इस प्रकार से जब जमदग्नि के द्वारा सब कुछ के ज्ञाता ईश्वर और महामतिमान् भृगु से पूछा गया तब हे भूपते ! भृगु मुनि ने बहुत काल पर्यन्त ध्यान करके भली भाँति अवलोकन किया था और फिर इस सब घटना के घटित होने का जो भी कुछ कारण था वह कहा था ।६८। भृगुमुनि ने कहा—हे महान् भाग वाले तात ! इस कुत्सित कर्म का जो भी बीज है उसी को आप सुन लीजिए । हे अनघ ! जिसने हैहय राजा ने सर्वज्ञ आपका निश्चित रूप से पाप किया था ।६९। बहुत प्राचीन समय में वसिष्ठ मुनि ने विनाश होने के लिये उस राजा को शाप दे दिया था । वह शाप वही था कि हे मूढ़ ! द्विज के अपराध करने से तेरा सब वीर्य विक्रम विनाश को प्राप्त हो जायगा ।७०।

तत्कथं वचनं तस्य भविष्यत्यन्यथा मुनेः । अयं रामो महावीर्यं प्रसह्य नृपपुंगवम् ॥७१ हनिष्यति महाबाहो प्रतिज्ञां कृतवान्पुरा । यस्मादुरः प्रतिहतं त्वया मातर्ममाग्रतः ॥७२

परशुराम की प्रतिज्ञा ] [ २३७

एकविंशतिवारं हि भृशं दुःखपरीतया । त्रिःसप्तकृत्वो निःक्षत्रां करिष्ये पृथिवीमिमाम् ॥७३ अतोऽयं वार्यमाणोऽपि त्वया पित्रा निरंतरम् । भाविनोऽर्थस्य च बलात्कारिष्यत्येव मानद ॥७४ स तु राजा महाभागो वृद्धानां पर्युपासिता । दत्तात्रेयाद्धरेरंशाल्लब्धबोधो महामतिः ॥७५ साक्षाद्भक्तो महात्मा च तद्वधे पातकं भवेत् । एवमुक्त्वा महाराज स भृगुर्ब्रह्मणः सुतः । यथागतं ययौ विद्वान्भविष्यत्कालपर्ययात् ॥७६

मुनि तो सर्वदा सत्यवक्ता होते हैं अतः उस महामुनि का वचन किस प्रकार से अन्यथा होगा । यह आपका पुत्र राम महान वीर्य वाले उस श्रेष्ठ नृप को बल पूर्वक मार देगा । हे महाबाहो ! यह पहिले ही ऐसी प्रतिज्ञा कर चुका है । कारण यह है कि वियोग के शोक से संतप्त होकर मेरे ही समक्ष से अपने वक्षःस्थल को प्रताड़ित किया है ।७१-७२। आपने अपने उरःस्थल को बहुत ही दुःख से परीत होकर इक्कीस बार प्रताड़ित किया है सो मैं भी इक्कीस बार ही इस सम्पूर्ण भूमण्डल को क्षत्रियों से रहित करूँगा ।७३। हे मानद ! इसीलिए पिता आपके द्वारा यह निरन्तर रोके जाने पर भी भविष्य में होने वाले अर्थ के बल से ऐसा अवश्य ही करेगा क्योंकि ऐसा ही होनहार है ।७४। यह साक्षात् भक्त और महात्मा है । उसके वध करने में पातक भी होगा । इस रीति से कहकर हे महाराज ! उन ब्रह्माजी के पुत्र भृगुमुनि ने फिर यह भी कहा था कि वह राजा महान भाग वाला है और वृद्धों की उपासना करने वाला है । साक्षात् भगवान् हरि के अंश दत्तात्रेय मुनि से उसने ज्ञान प्राप्त किया है और महती मति से सुसम्पन्न है । ऐसे का वध करना भी महान् पातक है । इतना ही कहकर भविष्य में आने वाले काल के पर्यत से ये विद्वान् भृगु जैसे ही आये थे वैसे ही वहाँ से चले गये ये ।७५-७६।

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२३८ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

॥ परशुराम का शिवलोक गमन ॥

सगर उवाच- ब्रह्मपुत्र महाभाग वद भार्गवचेष्टितम् । यच्चकार महावीर्य्यो राज्ञः क्रुद्धो हि कर्मणा ॥१

वसिष्ठ उवाच- गते तस्मिन्महाभागे भृगौ पितृपरायणः । रामः प्रोवाच संक्रुद्धो मुञ्चञ्छ्वासान्मुहुर्मुहुः ॥२

परशुराम उवाच- अहो पश्यत मूढत्वं राज्ञो ह्युत्पथगामिनः । कार्त्तवीर्यस्य यो विद्वांश्चक्रे ब्रह्मवधोद्यमम् ॥३ दैवं हि बलवन्मन्ये यत्प्रभावाच्छरीरिणः । शुभं वाप्यशुभं सर्वे प्रकुर्वंति विमोहिताः ॥४ शृण्वंतु ऋषयः सर्वे प्रतिज्ञा क्रियते मया । कार्त्तवीर्यं निहत्याजौ पितुर्वैरं प्रसाधये ॥५ यदि राजा सुरैः सर्वैरिन्द्राद्यैर्दानवैस्तथा । रक्षिष्यते तथाप्येनं संहरिष्यामि नान्यथा ॥६ एवमुक्तं समाकर्ण्य रामेण सुमहात्मना । जमदग्निरुवाचेदं पुत्रं साहसभाषिणम् ॥७

राजा सगर ने कहा—हे महाभाग ! हे ब्रह्मपुत्र ! अब आप कृपा करके भार्गव के चेष्टित का वर्णन कीजिए । महान् वीर्य वाले राम ने राजा के इस कुत्सित कर्म से क्रुद्ध होकर जो भी कुछ किया था ।१। वसिष्ठ जी ने कहा—जब महाभाग भृगुमुनि वहाँ से चले गये थे तो उस समय में पिता के चरणों की सेवा में तत्पर रहने वाले राम ने बारम्बार अत्युष्ण श्वासों का मोचन करते हुए बहुत ही क्रुद्ध होकर कहा था ।२। परशुराम ने कहा—अहो ! उत्पथ के गमन करने वाले राजा की मूढ़ता को देखिए जिस कार्त्त-वीर्य ने परम विद्वान् होते हुए भी एक तपस्वी ब्राह्मण के वध करने का उद्यम किया था ।३। मैं यह बात मानता हूँ कि दैव बड़ा बलवान् होता है

ललिता परमेश्वरी सेना जययात्रा ] [ २३६

ललिता परमेश्वरी सेना जययात्रा

अथ राजनायिका श्रिता ज्वलितांकुशा फणिसमानपाशभृत् । कलनिक्कणद्वलयमैक्षवं धनुर्दधती प्रदीप्तकुसुमेषुपंचका ॥१

उदयत्सहस्रमहसा सहस्रतोऽप्यतिपाटलं निजवपुः प्रभाझरम् किरती दिशासु वदनस्य कांतिभिः सृजतीव चन्द्रमयमभ्रमंडलम् ॥२

दशयोजनायतिपता जगत्त्रयीमभिवृण्वता विशदमौक्तिकात्मना । धवलातपत्रवलयेन भासुरा शशिमंडलस्य सखितामुपेयुषा ॥३

अभिवीजिता च मणिकांतशोभिना विजयादिमुख्यपरिचारिकागणैः । नवचन्द्रिकालहरिकांतिकंदलीचतुरेण चामरचतुष्टयेन च ॥४

शक्त्यर्चकराज्यपदवीमभिसूचयन्ती साम्राज्य- चिह्नशतमंडितसैन्यदेशा । संगीतवाद्यरचनाभिरथामरीणां संस्तूयमानविभवा विशदप्रकाशा ॥५

वाचामगोचरमगोचरमेव बुद्धेरीदृक्तया न कलनीयमनन्यतुल्यम् ॥६

त्रैलोक्यगर्भपरिपूरितशक्तिचक्रसाम्राज्यसं- पदभिमानमभिस्पृशंती । आबद्धभक्तिविपुलांजलिशेखराणामारादहंप्रथमिका कृतसेवनानाम् ॥७

इसके अनन्तर वह राज नायिका वहाँ पर विराजमान थी जिसका अंकुश ज्वलित था और जो सर्प के ही तुल्य पाश को धारण करने वाली थी। मधुर क्वणन करने वाला वलय और इक्षु का धनुष धारण किये हुए थी। उसके बाण पाँच कुसुमों के थे ।१। उदित सूर्य के तेज से भी अत्यधिक

२४० ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

जमदग्नि ने कहा—हे राम ! अब आप मेरी बात सुनिए। मैं सत्पुरुषों के सनातन (सर्वदा से चले आने वाले) धर्म को बतलाऊँगा। जिसकी सुनकर सभी मानव धर्म के करने वाले हो जाया करते हैं ।८। महान भाग्य वाले साधुजन होते हैं और जो इस संसार से निरन्तर जन्म-मरण के महान कष्ट से छुटकारा पाने की आकांक्षा रखने वाले हैं वे कभी भी किसी पर प्रकोप नहीं किया करते हैं चाहे कोई उनको प्रताड़ित अथवा निहत भी क्यों न करे तो भी वे कुपित नहीं हुआ करते हैं ।९। जो महाभाग क्षमा ही को धन मानने वाले हैं तथा परम दमनशील और तपस्वी होते हैं उन साधु कर्म करने वालों के लिए निरन्तर लोक अक्षय होते हैं ।१०। जो महापुरुष हैं वे दुष्टों के द्वारा दण्ड आदि से ताड़ित होते हुए और बुरे वचनों द्वारा निर्भत्सित होते हुए भी कभी मन में क्षोभ नहीं किया करते हैं वे ही पुरुष साधु कहे जाया करते हैं ।११। ताड़न करने वाले को जो ताड़ित किया करता है वह कभी भी साधु नहीं हो सकता है प्रत्युत पाप का भागी ही होता है। हम लोग तो ब्राह्मण और साधु हैं क्षमा रखने के ही द्वारा परम पूज्य पद को प्राप्त हुए हैं ।१२। सामान्यजन के वध से भी अधिक एक राजा के वध करने में महान् पातक होता है क्योंकि राजा में भगवान् का अंश होता है। इसी कारण से मैं अब आपको निवारित करता हूँ और यह उपदेश देता हूँ कि क्षमा को धारण करो तथा तपश्चर्या करो ।१३। वसिष्ठजी ने कहा—नृपनन्दन ! इस रीति से भली भाँति दिये हुए आदेश को समझ कर राम ने परमाधिक क्षमा के स्वभाव वाले और अरियों के दमन करने वाले अपने पिताजी से कहा ।१४।

परशुराम उवाच— शृणु तात महाप्राज्ञ विज्ञप्ति मम सांप्रतम् ।
भवता शम उद्दिष्टः साधूनां सुमहात्मनाम् ॥१५॥
स शमः साधुदीनेषु गुरुष्वीश्वरभावनः ।
कर्त्तव्यो दुष्टचेष्टेषु न शमः सुखदो भवेत् ॥१६॥
तस्मादस्य वधः कार्यः कार्त्तवीर्यस्य वै मया ।
देह्याज्ञां माननीयाद्य साधये वैरमात्मनः ॥१७॥

जमदग्निरुवाच— शृणु राम महाभाग वचो मम समाहितः ।

परशुराम का शिव लोक गमन ] [ २४१

करिष्यसि यथा भावि नैवान्यथा भवेत् ॥१८ इतो व्रज त्वं ब्रह्माणं पृच्छ तात हिताहितम् । स यद्वदिष्यति विभुस्तत्कर्त्ता नात्र संशयः ॥१९ वसिष्ठ उवाच- एवमुक्तः स पितरं नमस्कृत्य महामतिः । जगाम ब्रह्मणो लोकमगम्यं प्राकृतैर्जनैः ॥२० ददर्श ब्रह्मणो लोकं शातकौम्भवनिर्मितम् । स्वर्णप्राकारसंयुक्तं मणिस्तम्भैर्विभूषितम् ॥२१

परशुराम ने कहा-हे महाप्राज्ञ तात ! अब आप मेरी विज्ञप्ति का श्रवण कीजिए । आपने जो शाम बतलाया है वह महान आत्मा वाले साधु पुरुषों का है । वह शाम साधु पुरुषों के प्रति-दीनजनों पर और ईश्वर की भावना से संयुत गुरुजनों में ही करना चाहिए । जो दुष्टजन हैं उनमें किया हुआ शाम कभी भी सुख देने वाला नहीं हुआ करता है ।१५-१६। इसी कारण से इस दुष्ट कार्त्तवीर्य का वध तो मेरे द्वारा करने के ही योग्य है । हे सम्मान करने के योग्य ! आज तो आप मुझे अपनी आज्ञा प्रदान कर दीजिए कि मैं अपने बैर का बदला ले लूँ ।१७। जमदग्नि मुनि ने कहा—हे महाभाग राम ! अब आप बहुत सावधान होकर मेरे वचन का श्रवण करो । यह मैं जानता हूँ कि जो कुछ होने वाला है उसे ही तुम अवश्य करोगे । इसमें कुछ भी अन्यथा नहीं होगा ।१८। अब आप यहाँ से ब्रह्माजी के समीप में चले जाओ और उनसे हे तात ! अपना हित और अहित पूछिए । वे विभु जो भी कहेंगे उसी को आप करना—फिर इसमें कुछ भी संशय नहीं होगा ।१९। वसिष्ठ जी ने कहा—जब राम के पिता के द्वारा इस प्रकार से राम से कहा गया था तो उस महामति ने अपने पिता के चरणों में प्रणाम किया था और फिर वह ब्रह्माजी के लोक को चला गया था जो लोक सामान्य प्राकृतजनों के द्वारा गमन करने के योग्य नहीं था ।२०। उस परशु-राम ने ब्रह्माजी के उस लोक को देखा था जो लोक सुवर्ण के ही द्वारा बना हुआ था । उस लोक का प्राकार (चहार दीवारी) भी सुवर्ण से संयुत था था और वह लोक मणियों के अनेक स्तम्भों से विभूषित हो रहा था ।२१।

तत्रापश्यत्समासीनं ब्रह्माणममितौजसम् । रत्नसिंहासने रम्ये रत्नभूषणभूषितम् ॥२२

२४२ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

सिद्धैर्देवैश्च मुनीन्द्रैश्च वेष्टितं ध्यानतत्परैः ।
विद्याधरीणां नृत्यं च पश्यंतं सस्मितं मुदा ॥२३
तपसां फलदातारं कर्त्तारं जगतां विभुम् ।
परिपूर्णतमं ब्रह्म ध्यायंतं यतमानसम् ॥२४
गुह्ययोगं प्रवोचंतं भक्तवृंदेषु संततम् ।
दृष्ट्वा तमव्ययं भक्त्या प्रणनाम भृगूद्वहः ॥२५
स दृष्ट्वा विनतं राममाशीर्भिरभिनंद्य च ।
पप्रच्छ कुशलं वत्स कथमागमनं कृथाः ॥२६
संपृष्टो विधिना रामः प्रोवाचाखिलमादितः ।
वृत्तांत कार्त्तवीर्यस्य पितुः स्वस्य महात्मनः ॥२७
तच्छ्रुत्वा सकलं ब्रह्मा विज्ञातार्थोऽपि मानद ।
उवाच रामं धर्मिष्ठ परिणामसुखावहम् ॥२८

वहाँ पर उस लोक में अपरिमित ओज से समन्वित विराजमान ब्रह्माजी का उस राम ने दर्शन किया था। जो परम रम्य रत्नों के सिंहासन पर समासी न थे और रत्नों के ही भूषणों के समलंकृत थे ।२२। उन ब्रह्माजी को चारों ओर से बड़े-बड़े सिद्धों और मुनीन्द्रों के ध्यान में समासक्त होकर घेर रखा था तथा था तथा वहाँ पर उनके सामने विद्याधरियों का नृत्य हो रहा था जिस नृत्यको बड़े ही आनन्द के साथ मुस्कराते हुए ब्रह्माजी देख रहे थे ब्रह्माजी उस समय में तपों के फल को प्रदान करने वाले—जगर्तों की रचना करने वाले—व्यापक और परिपूर्ण तप ब्रह्म का ध्यान कर रहे थे तथा उनने शपने मन को नियमन्त्रित कर रक्खा था ।२४। जो वहाँ पर भक्तों के समुदाय विद्यमान थे उनको निरन्तर परम गोपनीय योग को वे बतला रहे थे । इस रीति से विराजमान अव्यय उन ब्रह्माजी का भक्तिभाव से दर्शन प्राप्त करके उस भृगुकुल में समुत्पन्न राम ने उनके चरणों में प्रणिपात किया था ।२५। उन ब्रह्माजी ने विशेष रूप से नत उस राम को देखकर आशीर्वचनों के द्वारा उसका अभिनन्दन किया था । फिर उस राम से ब्रह्माजी ने उसका कुशल पूछा था इसके अनन्तर ब्रह्माजी ने राम से कहा था—हे वत्स ! तुमने किस प्रयोजन से यहाँ पर मेरे समीप में आगमन किया है ।२६। जब ब्रह्माजी ने इस रीति से राम से पूछा था तो उसने

परशुराम का शिव लोक गमन ] [ २४३

आरम्भ से सम्पूर्ण वृत्तान्त कहकर उनको सुना दिया था जिसमें कार्त्तवीर्य राजा के द्वारा जो कुछ किया गया था और महात्मा अपने पिता जमदग्नि पर जो कुछ दुःख पड़ा था यह सभी हाल था ।२७। इस सम्पूर्ण वृत्तान्त का श्रवण करके हे मानद ! यद्यपि ब्रह्माजी को यह सभी बातें पहिले ही विज्ञात थीं तथापि उन्होंने पूछकर सब कुछ सुना था और परिणाम में सुख आवहन करने वाले धर्मिष्ठ राम से कहा था ।२८।

प्रतिज्ञा दुर्लभा वत्स यां भवान्कृतवान् रुषा ।
सृष्टि रेषा भगवतः संभवेत्कृपया वटो ॥२९
जगत्सृष्टं मया तात संक्लेशेन तदाज्ञया ।
तन्नाशकारिणी चैव प्रतिज्ञा भवता कृता ॥३०
त्रिःसप्तकृत्वो निर्भूपां कर्तुमिच्छसि मेदिनीम् ।
एकस्य राज्ञो दोषेण पितुः परिभवेन च ॥३१
ब्रह्मक्षत्रियविट्शूद्रैः सृष्टिरेषा सनातनी ।
आविर्भूता तिरोभूता हरेरेव पुनः पुनः ॥३२
अव्यर्था त्वत्प्रतिज्ञा तु भवित्री प्राक्तनेन च ।
यद्वायासेन ते कार्यसिद्धिर्भवितुमर्हति ॥३३
शिवलोकं प्रयाहि त्वं शिवस्याज्ञामवाप्नुहि ।
पृथिव्यां बहवो भूपाः संति शंकरकिंकराः ॥३४
विनेवाज्ञां महेशस्य को वा तान्हंतुमीश्वरः ।
विभ्रतः कवचान्यंगे शक्तींश्चापि दुरासदाः ॥३५

हे वत्स ! आपकी यह प्रतिज्ञा बड़ी ही दुर्लभ है जिसको क्रोध के वंशीभूत होकर आपने किया है। हे बटो ! यह सृष्टि तो भगवान् की कृपा से ही होती है ।२९। हे तात ! यह आपको ज्ञात ही है कि उन्हीं परम प्रभु की आज्ञा से बड़े ही क्लेश के द्वारा इस समस्त जगत् का सृजन किया है और आपने इसी सृष्टि के नाश करने वाली प्रतिज्ञा कर डाली हैं ।३०। आप तो केवल एक ही राजा के दोष से तथा अपने पिता के तिरस्कार के होने से इस भूमि को इक्कीस बार भूपों से रहित करना चाहते हैं ।३१। यह सृष्टि तो ब्राह्मण-क्षत्रिय-वैश्य और शूद्र-इन चारों वर्णों से समन्वित सर्वदा से ही

२४४ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

चली आने वाली है। इसका आविर्भाव और तिरोभाव तो बार-बार भग- वान् हरि से ही हुआ करता है ।३२। आपकी जो प्रतिज्ञा है वह भी अव्यर्थ होने वाली ही है और प्राक्तन अथवा आयास से आपके कार्य की सिद्धि होने के योग्य होती है ।३३। अब मेरा मत यही है कि शिवलोक में गमन कीजिए और अपनी की हुई प्रतिज्ञा के विषय में भगवान् शिव की आज्ञा को प्राप्त कीजिए । कारण यह है कि इस भूमण्डल में बहुत से भूप भगवान् शिव के सेवक हैं ।३४। बिना महेश्वर की आज्ञा प्राप्त किये हुए किसकी सामर्थ्य है कि उन सब भूपों का हनन कर सके । ये सब शिव के भक्त राजा लोग अपने अङ्गों में कवच धारण करने वाले हैं तथा दुरासदद को भी ये सब धारण किया करते हैं ।३५।

उपायं कुरु यत्नेन जयबीजं शुभावहम् । उपाये तु समारब्धे सर्वे सिध्यन्त्युपक्रमाः ॥३६ श्रीकृष्णमंत्रं कवचं गृह्य वत्स गुरोर्हरात् । दुर्लङ्घ्यं वैष्णवं तेजः शिवशक्तिर्विजेष्यति ॥३७ त्रैलोक्यविजयं नाव कवचं परमाद्भुतम् । यथाकथं च विज्ञाप्य शंकरं लभ दुर्लभम् ॥३८ प्रसन्नः स गुणैस्तुभ्यं कृपालुर्दीनवत्सलः । दिव्यपाशुपतं चापि दास्यत्येव न संशयः ॥३९

यत्न के साथ उपाय करिए। जप का बीज शुभ का आवाहन करने वाला है। जब उपाय का आरम्भ कर दिया जाता है तो उसके कर देने पर सभी उपक्रम सिद्ध हो जाया करते हैं ।३६। अपने गुरुदेव हर से हे वत्स ! श्रीकृष्ण का मन्त्र और वज्र का ग्रहण करो । उससे दुर्लङ्घ्य वैष्णव तेज और शिव की शक्ति हो जायगी । जोकि विजय करेगी ।३७। भगवान् शिव के पास एक त्रैलोक्य के विजय करने वाला इसी नाम का परम दुर्लभ कवच विद्यमान है । यह कवच अतीव अद्भुत है । जिस किसी भी प्रकार से भग- वान् शङ्कर को प्रसन्न करके उनसे इसके प्राप्त करने की प्रार्थना करो और इस दुर्लभ वस्तु की प्राप्ति उनसे करो ।३८। आपके गुण गणों से वे भगवान् शिव प्रसन्न हैं और वे बहुत ही दयालु तथा दीनों पर प्यार करने वाले हैं। वे तुमको अपना दिव्य पाशुपत अस्त्र भी अवश्य ही प्रदान कर ही देंगे— इसमें कुछ भी संशय नहीं है ।३९।

परशुराम का शिवाराधन ] [ २४५

परशुराम का शिवाराधन

वसिष्ठ उवाच-
ब्रह्मणो वचनं श्रुत्वा स प्रणम्य जगद्गुरुम् ।
प्रसन्नचेताः सुभृशं शिवलोकं जगाम ह ॥१
लक्षयोजनमूर्द्ध्वं च ब्रह्मलोकाद्विलक्षणम् ।
अथानिर्वचनीयं च योगिगम्यं परात्परम् ॥२
वैकुण्ठो दक्षिणे यस्माद्गौरीवश्च वामतः ।
यदधो ध्रुवलोकश्च सर्वलोकपरस्तु सः ॥३
तपोवीर्यगती रामः शिवलोकं ददर्श च ।
उपमानेन रहितं नानाकौतुकसंयुतम् ॥४
वसंति यत्र योगींद्राः सिद्धाः पाशुपताः शुभाः ।
कोटिकल्पतपः पुण्याः शांता निर्मत्सरा जनाः ॥५
पारिजातमुखैर्वृक्षैः शोभितं कामधेनुभिः ।
योगेन योगिना सृष्टं स्वेच्छया शंकरेण हि ॥६
शिल्पिनां गुरुणा स्वप्ने न दृष्टं विश्वकर्मणा ।
सरोवरशतैर्दिव्यैः पद्मरागविराजितैः ॥७

श्री वसिष्ठ जी ने कहा—वह राम ब्रह्माजी के इस वचन को सुनकर फिर ब्रह्माजी के चरणों में प्रणाम करके अत्यन्त ही प्रसन्न चित्त वाला होता हुआ वहाँ से शिव के लोक को चला ।१। वह शिवका लोक वहाँ से एक लाख योजन ऊपर की ओर था और वह इस ब्रह्माजी के लोक से भी अधिक विलक्षण था । उसका वर्णन वचनों के द्वारा तो हो ही नहीं सकता है । ऐसा ही यह अनिर्वचनीय था और पर से भी पर था तथा योगी जनों के ही द्वारा गमन करने के योग्य था ।२। जिस शिवलोक से वैकुण्ठ तो दक्षिण दिशा में है और गौरी लोक बाँई ओर है तथा जिनके नीचे की ओर ध्रुव लोक है और वह शिवलोक सभी लोकों से पर है ।३। तपश्चर्या और बल-विक्रम के वीर्य की गति वाले उस राम ने उस शिवलोक का दर्शन कर लिया था । वह अनेक प्रकार के कौतुकों से युक्त था तथा उसकी समानता रखने वाला अन्य कोई भी उपमान ही नहीं था ।४। वह ऐसा लोक था जहाँ

२४६ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

पर केवल महान् योगीन्द्र-सिद्ध और परम शुभ पाशुपत ही निवास किया करते हैं । जो करोड़ों कल्पों तक तपस्या करने के महान् पुनीत पुण्य वाले- परम शान्त शील-स्वभाव वाले और मत्सरता से रहित जन थे वे ही उस लोक के निवास करने वाले थे ।५। वह लोक पारिजात मुख्य वाले वृक्षों से तथा कामधेनुओं से परम सुशोभित था जिन सबका योगिराजाधिराज भग- वान् शङ्कर ने अपने ही योगबल से स्वेच्छा पूर्वक सृजन किया था । समस्त कामनाओं को पूर्ण करने वाली धेनु कामधेनु कही जाती है तथा मनकी इच्छाओं को पूरा करने वाला वृक्ष कल्पवृक्ष होता है उन्हीं का एक भेद परिजात देव वृक्ष है ।६। इस लोक की रचना ऐसी ही परम अद्भुत थी कि विश्व के शिल्पियों के परम गुरु विश्वकर्मा ने कभी स्वप्न में भी नहीं देखी थी फिर उसके भी द्वारा स्वयं ऐसी रचना का करना तो बहुत ही दूर की बात है । उस लोक में परम दिव्य सैकड़ों ही सरोवर थे जिनके घाट और सोढ़ियाँ तथा सम्पूर्ण प्राकार मण्डल पद्मराग नाम वाली मणियों के द्वारा विनिर्मित था । इन सब सरोवरों से वह लोक परमाधिक शोभा से समन्वित था ।७।

शोभितं चातिरम्यं च संयुक्तं मणिवेदिभिः ।
सुवर्णरत्नरचितप्राकारेण समावृतम् ॥८
आयूद्ध र्वमंबरस्पर्शि स्वच्छं क्षीरनिभं परम् ।
चतुर्द्वारसमायुक्तं शोभितं मणिवेदिभिः ॥६
रक्तसोपानयुक्तंश्च रत्नस्तम्भकपाटकैः ।
नानाचित्रविचित्रंश्च शोभितैः सुमनोहरैः ॥१०
तन्मध्ये भवनं रम्यं सिंहद्वारोपशोभितम् ।
ददर्श रामो धर्मात्मा विचित्रमिव संगतः ॥११
तत्र स्थितौ द्वारपालौ ददर्शातिभयंकरौ ।
महाकरालदंतास्यौ विकृतारक्तलोचनौ ॥१२
दग्धशैलप्रतीकाशौ महाबलपराक्रमौ ।
विभूतिभूषितांगौ च व्याघ्रचर्मांवरौ च तौ ॥१३
त्रिशूलपट्टिशधरौ ज्वलंतौ ब्रह्मतेजसा ।
तौ दृष्ट्वा मनसा भीतः किंचिदाह विनीतवत् ॥१४

परशुराम का शिवाराधन ] [ २४७

वह लोक मणियों के द्वारा निर्मित अनेक वेदियों से बहुत ही अधिक सुरम्य एवं शोभित था। इसके चारों ओर सुवर्ण का प्राकार (परकोटा) बना हुआ था ।८। यह लोक बहुत ही ऊँचा था जो कि अन्तरिक्ष का स्पर्श कर रहा था तथा वह इतना अधिक स्वच्छ एवं शुद्ध था कि क्षीर के ही समान दिखाई दे रहा था । इस लोक में चार परम विशाल द्वार बने हुए थे जिनका निर्माण मणियों की वेदियों से किया गया था ।६। इसमें ऊपर चढ़ने के लिए रत्नों के द्वारा विनिर्मित सोपानों की श्रेणियाँ थीं और इसमें जो स्तम्भ तथा कपाट बने हुए थे वे भी सब रत्नों के थे । इसे लोक में जो भी रचना थी वह अनेक प्रकार की चित्रविचित्र थी तथा परम मनोहर थी जिससे यह लोक परम शोभित हो रहा था ।१०। उस लोक के मध्य में सिद्धों के द्वारा उपशोभित एक सुरम्य भवन बना हुआ था । उस धर्मात्मा राम ने वहाँ पर पहुँचकर उसकी एक विचित्र स्थल के ही समान देखा था ।११। वहाँ पर उस रामने देखा था कि अतीव भयङ्कर दो द्वारपाल स्थित थे । जिनके महान् कराल मुख और दाँत थे तथा बहुत ही विकृत लाल नेत्र थे ।१२। वे द्वारपाल ऐसे ही प्रतीत हो रहे थे मानों वे दग्ध पर्वत होवें । वे महान् बल और विक्रम से समन्वित थे । उनके शरीरों में विभूति लगी हुई थी जिससे उनका अङ्ग विभूषित था और वे व्याघ्र के चर्मों के वस्त्र धारण किये हुए थे ।१३। वे दोनों द्वारपाल त्रिशूल और पट्टिश धारण करने वाले थे तथा ब्रह्मतेज से जाज्वल्यमान हो रहे थे । उन को देखकर राम अपने मन में भय से भीत हो गया था बहुत ही विनीत होकर उन से कुछ बोला था ।१४।

नमस्करोमि वामीशौ शंकरं द्रष्टुमागतः ।
ईश्वराज्ञां समादाय मामथाज्ञप्तुमर्हथ ॥१५
तौ तु तद्वचनं श्रुत्वा गृहीत्वाऽज्ञां शिवस्य च ।
प्रवेष्टुमाज्ञां ददतुरीश्वरानुचरौ च तौ ॥१६
स तदाज्ञामनुप्राप्य विवेशान्तः पुरं मुदा ।
तत्रातिरम्यां सिद्धौघैः समाकीर्णां सभां द्विजः ॥१७
दृष्ट्वा विस्मयमापेदे सुगंधबहुलां विभोः ।
तत्रापश्यच्छिवं शांतं त्रिनेत्रं चन्द्रशेखरम् ॥१८
त्रिशूलशोभितकरं व्याघ्रचर्मवरांबरम् ।

२४८ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

विभूतिभूषितांगे च नागयज्ञोपवीतिनम् ।।१६ आत्मारामं पूर्णकामं कोटिसूर्यसमप्रभम् । पंचाननं दशभुजं भक्तानुग्रहविग्रहम् ।।२० योगज्ञाने प्रब्रुवंतं सिद्धेभ्यस्तर्कमुद्रया । स्तूयमानं च योगींद्रैः प्रथमप्रकरैर्मुदा ।।२१

राम ने कहा-ईश आप दोनों की सेवा में मेरा प्रणाम स्वीकृत होवे। मैं इस समय में भगवान् शङ्कर के दर्शन प्राप्त करने के लिए ही यहाँ पर समागत हुआ हूँ। अब भगवान् ईश्वर की आज्ञा प्राप्त करके मुझे दर्शन करने के लिए आदेश प्रदान करने को आप योग्य होते हैं ।१५। उन ईश्वर के दोनों अनुचरों ने राम के वचनों का श्रवण करके और फिर शिव की आज्ञा को प्राप्त करके राम को अन्दर प्रवेश करने के लिये उन्होंने आज्ञा देदी थी ।१६। उस राम ने भी उनकी आज्ञा प्राप्त करके बड़े ही हर्ष के साथ उस अन्तःपुर में प्रवेश किया था । वहाँ पर उसने एक सभा का स्थल देखा था जो इस द्विज ने सिद्धों के समुदायों से समाकीर्ण देखा था और जिसमें अनेक प्रकार की बड़ी ही सुन्दर सुगन्ध भरी हुई थी तथा वह बहुत ही सुरम्य था । इस सभा-स्थल का अवलोकन करके बड़ा ही विस्मय हो गया था । वहाँ पर फिर उस रामने परम शान्त तीन नेत्र के धारण करने और मस्तक में चन्द्र को धारण किये हुए भगवान् शिव का दर्शन किया था ।१७-१८। भगवान् शंकर के कर में त्रिशूल शोभित हो रहा था और वे व्याघ्र के चर्म को वस्त्र के स्थान में पहिने हुए थे । उनके सम्पूर्ण अङ्गों में श्मशान की भस्म लगी हुई थी और उनका शरीर नागों के यज्ञोपवीत से शोभित था ।१९। प्रभु शंकर अपनी ही आत्मा में रमण करने वाले थे—पूर्ण काम थे और उनकी सभी कामनाएं परिपूर्ण थीं और करोड़ों सूर्यों के समान परमोज्ज्वल प्रभा थी । वे पाँच मुखों वाले—दश भुजाओं से शोभित और अपने भक्तों पर परमाधिक अनुग्रह करने वाले थे ।२०। उस समय में शिव सिद्धों के लिए तर्क की मुद्रा के द्वारा योग और ज्ञान का विषय बतला रहे थे। बड़े-बड़े योगीन्द्र और प्रथमगण बड़े ही आनन्द के साथ उनका स्तवन कर रहे थे ।२१।

भैरवैर्योगिनीभिश्च वृतं रुद्रगणैस्तथा । मूर्ध्ना नमाम तं दृष्ट्वा रामः परगया मुदा ।।२२