भारतकोश
संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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परशुराम की प्रतिज्ञा ] [ २३७

एकविंशतिवारं हि भृशं दुःखपरीतया । त्रिःसप्तकृत्वो निःक्षत्रां करिष्ये पृथिवीमिमाम् ॥७३ अतोऽयं वार्यमाणोऽपि त्वया पित्रा निरंतरम् । भाविनोऽर्थस्य च बलात्कारिष्यत्येव मानद ॥७४ स तु राजा महाभागो वृद्धानां पर्युपासिता । दत्तात्रेयाद्धरेरंशाल्लब्धबोधो महामतिः ॥७५ साक्षाद्भक्तो महात्मा च तद्वधे पातकं भवेत् । एवमुक्त्वा महाराज स भृगुर्ब्रह्मणः सुतः । यथागतं ययौ विद्वान्भविष्यत्कालपर्ययात् ॥७६

मुनि तो सर्वदा सत्यवक्ता होते हैं अतः उस महामुनि का वचन किस प्रकार से अन्यथा होगा । यह आपका पुत्र राम महान वीर्य वाले उस श्रेष्ठ नृप को बल पूर्वक मार देगा । हे महाबाहो ! यह पहिले ही ऐसी प्रतिज्ञा कर चुका है । कारण यह है कि वियोग के शोक से संतप्त होकर मेरे ही समक्ष से अपने वक्षःस्थल को प्रताड़ित किया है ।७१-७२। आपने अपने उरःस्थल को बहुत ही दुःख से परीत होकर इक्कीस बार प्रताड़ित किया है सो मैं भी इक्कीस बार ही इस सम्पूर्ण भूमण्डल को क्षत्रियों से रहित करूँगा ।७३। हे मानद ! इसीलिए पिता आपके द्वारा यह निरन्तर रोके जाने पर भी भविष्य में होने वाले अर्थ के बल से ऐसा अवश्य ही करेगा क्योंकि ऐसा ही होनहार है ।७४। यह साक्षात् भक्त और महात्मा है । उसके वध करने में पातक भी होगा । इस रीति से कहकर हे महाराज ! उन ब्रह्माजी के पुत्र भृगुमुनि ने फिर यह भी कहा था कि वह राजा महान भाग वाला है और वृद्धों की उपासना करने वाला है । साक्षात् भगवान् हरि के अंश दत्तात्रेय मुनि से उसने ज्ञान प्राप्त किया है और महती मति से सुसम्पन्न है । ऐसे का वध करना भी महान् पातक है । इतना ही कहकर भविष्य में आने वाले काल के पर्यत से ये विद्वान् भृगु जैसे ही आये थे वैसे ही वहाँ से चले गये ये ।७५-७६।

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