भारतकोश
संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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२३८ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

॥ परशुराम का शिवलोक गमन ॥

सगर उवाच- ब्रह्मपुत्र महाभाग वद भार्गवचेष्टितम् । यच्चकार महावीर्य्यो राज्ञः क्रुद्धो हि कर्मणा ॥१

वसिष्ठ उवाच- गते तस्मिन्महाभागे भृगौ पितृपरायणः । रामः प्रोवाच संक्रुद्धो मुञ्चञ्छ्वासान्मुहुर्मुहुः ॥२

परशुराम उवाच- अहो पश्यत मूढत्वं राज्ञो ह्युत्पथगामिनः । कार्त्तवीर्यस्य यो विद्वांश्चक्रे ब्रह्मवधोद्यमम् ॥३ दैवं हि बलवन्मन्ये यत्प्रभावाच्छरीरिणः । शुभं वाप्यशुभं सर्वे प्रकुर्वंति विमोहिताः ॥४ शृण्वंतु ऋषयः सर्वे प्रतिज्ञा क्रियते मया । कार्त्तवीर्यं निहत्याजौ पितुर्वैरं प्रसाधये ॥५ यदि राजा सुरैः सर्वैरिन्द्राद्यैर्दानवैस्तथा । रक्षिष्यते तथाप्येनं संहरिष्यामि नान्यथा ॥६ एवमुक्तं समाकर्ण्य रामेण सुमहात्मना । जमदग्निरुवाचेदं पुत्रं साहसभाषिणम् ॥७

राजा सगर ने कहा—हे महाभाग ! हे ब्रह्मपुत्र ! अब आप कृपा करके भार्गव के चेष्टित का वर्णन कीजिए । महान् वीर्य वाले राम ने राजा के इस कुत्सित कर्म से क्रुद्ध होकर जो भी कुछ किया था ।१। वसिष्ठ जी ने कहा—जब महाभाग भृगुमुनि वहाँ से चले गये थे तो उस समय में पिता के चरणों की सेवा में तत्पर रहने वाले राम ने बारम्बार अत्युष्ण श्वासों का मोचन करते हुए बहुत ही क्रुद्ध होकर कहा था ।२। परशुराम ने कहा—अहो ! उत्पथ के गमन करने वाले राजा की मूढ़ता को देखिए जिस कार्त्त-वीर्य ने परम विद्वान् होते हुए भी एक तपस्वी ब्राह्मण के वध करने का उद्यम किया था ।३। मैं यह बात मानता हूँ कि दैव बड़ा बलवान् होता है