संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
२३८ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
॥ परशुराम का शिवलोक गमन ॥
सगर उवाच- ब्रह्मपुत्र महाभाग वद भार्गवचेष्टितम् । यच्चकार महावीर्य्यो राज्ञः क्रुद्धो हि कर्मणा ॥१
वसिष्ठ उवाच- गते तस्मिन्महाभागे भृगौ पितृपरायणः । रामः प्रोवाच संक्रुद्धो मुञ्चञ्छ्वासान्मुहुर्मुहुः ॥२
परशुराम उवाच- अहो पश्यत मूढत्वं राज्ञो ह्युत्पथगामिनः । कार्त्तवीर्यस्य यो विद्वांश्चक्रे ब्रह्मवधोद्यमम् ॥३ दैवं हि बलवन्मन्ये यत्प्रभावाच्छरीरिणः । शुभं वाप्यशुभं सर्वे प्रकुर्वंति विमोहिताः ॥४ शृण्वंतु ऋषयः सर्वे प्रतिज्ञा क्रियते मया । कार्त्तवीर्यं निहत्याजौ पितुर्वैरं प्रसाधये ॥५ यदि राजा सुरैः सर्वैरिन्द्राद्यैर्दानवैस्तथा । रक्षिष्यते तथाप्येनं संहरिष्यामि नान्यथा ॥६ एवमुक्तं समाकर्ण्य रामेण सुमहात्मना । जमदग्निरुवाचेदं पुत्रं साहसभाषिणम् ॥७
राजा सगर ने कहा—हे महाभाग ! हे ब्रह्मपुत्र ! अब आप कृपा करके भार्गव के चेष्टित का वर्णन कीजिए । महान् वीर्य वाले राम ने राजा के इस कुत्सित कर्म से क्रुद्ध होकर जो भी कुछ किया था ।१। वसिष्ठ जी ने कहा—जब महाभाग भृगुमुनि वहाँ से चले गये थे तो उस समय में पिता के चरणों की सेवा में तत्पर रहने वाले राम ने बारम्बार अत्युष्ण श्वासों का मोचन करते हुए बहुत ही क्रुद्ध होकर कहा था ।२। परशुराम ने कहा—अहो ! उत्पथ के गमन करने वाले राजा की मूढ़ता को देखिए जिस कार्त्त-वीर्य ने परम विद्वान् होते हुए भी एक तपस्वी ब्राह्मण के वध करने का उद्यम किया था ।३। मैं यह बात मानता हूँ कि दैव बड़ा बलवान् होता है
ललिता परमेश्वरी सेना जययात्रा ] [ २३६
ललिता परमेश्वरी सेना जययात्रा
अथ राजनायिका श्रिता ज्वलितांकुशा फणिसमानपाशभृत् । कलनिक्कणद्वलयमैक्षवं धनुर्दधती प्रदीप्तकुसुमेषुपंचका ॥१
उदयत्सहस्रमहसा सहस्रतोऽप्यतिपाटलं निजवपुः प्रभाझरम् किरती दिशासु वदनस्य कांतिभिः सृजतीव चन्द्रमयमभ्रमंडलम् ॥२
दशयोजनायतिपता जगत्त्रयीमभिवृण्वता विशदमौक्तिकात्मना । धवलातपत्रवलयेन भासुरा शशिमंडलस्य सखितामुपेयुषा ॥३
अभिवीजिता च मणिकांतशोभिना विजयादिमुख्यपरिचारिकागणैः । नवचन्द्रिकालहरिकांतिकंदलीचतुरेण चामरचतुष्टयेन च ॥४
शक्त्यर्चकराज्यपदवीमभिसूचयन्ती साम्राज्य- चिह्नशतमंडितसैन्यदेशा । संगीतवाद्यरचनाभिरथामरीणां संस्तूयमानविभवा विशदप्रकाशा ॥५
वाचामगोचरमगोचरमेव बुद्धेरीदृक्तया न कलनीयमनन्यतुल्यम् ॥६
त्रैलोक्यगर्भपरिपूरितशक्तिचक्रसाम्राज्यसं- पदभिमानमभिस्पृशंती । आबद्धभक्तिविपुलांजलिशेखराणामारादहंप्रथमिका कृतसेवनानाम् ॥७
इसके अनन्तर वह राज नायिका वहाँ पर विराजमान थी जिसका अंकुश ज्वलित था और जो सर्प के ही तुल्य पाश को धारण करने वाली थी। मधुर क्वणन करने वाला वलय और इक्षु का धनुष धारण किये हुए थी। उसके बाण पाँच कुसुमों के थे ।१। उदित सूर्य के तेज से भी अत्यधिक
२४० ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
जमदग्नि ने कहा—हे राम ! अब आप मेरी बात सुनिए। मैं सत्पुरुषों के सनातन (सर्वदा से चले आने वाले) धर्म को बतलाऊँगा। जिसकी सुनकर सभी मानव धर्म के करने वाले हो जाया करते हैं ।८। महान भाग्य वाले साधुजन होते हैं और जो इस संसार से निरन्तर जन्म-मरण के महान कष्ट से छुटकारा पाने की आकांक्षा रखने वाले हैं वे कभी भी किसी पर प्रकोप नहीं किया करते हैं चाहे कोई उनको प्रताड़ित अथवा निहत भी क्यों न करे तो भी वे कुपित नहीं हुआ करते हैं ।९। जो महाभाग क्षमा ही को धन मानने वाले हैं तथा परम दमनशील और तपस्वी होते हैं उन साधु कर्म करने वालों के लिए निरन्तर लोक अक्षय होते हैं ।१०। जो महापुरुष हैं वे दुष्टों के द्वारा दण्ड आदि से ताड़ित होते हुए और बुरे वचनों द्वारा निर्भत्सित होते हुए भी कभी मन में क्षोभ नहीं किया करते हैं वे ही पुरुष साधु कहे जाया करते हैं ।११। ताड़न करने वाले को जो ताड़ित किया करता है वह कभी भी साधु नहीं हो सकता है प्रत्युत पाप का भागी ही होता है। हम लोग तो ब्राह्मण और साधु हैं क्षमा रखने के ही द्वारा परम पूज्य पद को प्राप्त हुए हैं ।१२। सामान्यजन के वध से भी अधिक एक राजा के वध करने में महान् पातक होता है क्योंकि राजा में भगवान् का अंश होता है। इसी कारण से मैं अब आपको निवारित करता हूँ और यह उपदेश देता हूँ कि क्षमा को धारण करो तथा तपश्चर्या करो ।१३। वसिष्ठजी ने कहा—नृपनन्दन ! इस रीति से भली भाँति दिये हुए आदेश को समझ कर राम ने परमाधिक क्षमा के स्वभाव वाले और अरियों के दमन करने वाले अपने पिताजी से कहा ।१४।
परशुराम उवाच—
शृणु तात महाप्राज्ञ विज्ञप्ति मम सांप्रतम् ।
भवता शम उद्दिष्टः साधूनां सुमहात्मनाम् ॥१५॥
स शमः साधुदीनेषु गुरुष्वीश्वरभावनः ।
कर्त्तव्यो दुष्टचेष्टेषु न शमः सुखदो भवेत् ॥१६॥
तस्मादस्य वधः कार्यः कार्त्तवीर्यस्य वै मया ।
देह्याज्ञां माननीयाद्य साधये वैरमात्मनः ॥१७॥
जमदग्निरुवाच— शृणु राम महाभाग वचो मम समाहितः ।
परशुराम का शिव लोक गमन ] [ २४१
करिष्यसि यथा भावि नैवान्यथा भवेत् ॥१८ इतो व्रज त्वं ब्रह्माणं पृच्छ तात हिताहितम् । स यद्वदिष्यति विभुस्तत्कर्त्ता नात्र संशयः ॥१९ वसिष्ठ उवाच- एवमुक्तः स पितरं नमस्कृत्य महामतिः । जगाम ब्रह्मणो लोकमगम्यं प्राकृतैर्जनैः ॥२० ददर्श ब्रह्मणो लोकं शातकौम्भवनिर्मितम् । स्वर्णप्राकारसंयुक्तं मणिस्तम्भैर्विभूषितम् ॥२१
परशुराम ने कहा-हे महाप्राज्ञ तात ! अब आप मेरी विज्ञप्ति का श्रवण कीजिए । आपने जो शाम बतलाया है वह महान आत्मा वाले साधु पुरुषों का है । वह शाम साधु पुरुषों के प्रति-दीनजनों पर और ईश्वर की भावना से संयुत गुरुजनों में ही करना चाहिए । जो दुष्टजन हैं उनमें किया हुआ शाम कभी भी सुख देने वाला नहीं हुआ करता है ।१५-१६। इसी कारण से इस दुष्ट कार्त्तवीर्य का वध तो मेरे द्वारा करने के ही योग्य है । हे सम्मान करने के योग्य ! आज तो आप मुझे अपनी आज्ञा प्रदान कर दीजिए कि मैं अपने बैर का बदला ले लूँ ।१७। जमदग्नि मुनि ने कहा—हे महाभाग राम ! अब आप बहुत सावधान होकर मेरे वचन का श्रवण करो । यह मैं जानता हूँ कि जो कुछ होने वाला है उसे ही तुम अवश्य करोगे । इसमें कुछ भी अन्यथा नहीं होगा ।१८। अब आप यहाँ से ब्रह्माजी के समीप में चले जाओ और उनसे हे तात ! अपना हित और अहित पूछिए । वे विभु जो भी कहेंगे उसी को आप करना—फिर इसमें कुछ भी संशय नहीं होगा ।१९। वसिष्ठ जी ने कहा—जब राम के पिता के द्वारा इस प्रकार से राम से कहा गया था तो उस महामति ने अपने पिता के चरणों में प्रणाम किया था और फिर वह ब्रह्माजी के लोक को चला गया था जो लोक सामान्य प्राकृतजनों के द्वारा गमन करने के योग्य नहीं था ।२०। उस परशु-राम ने ब्रह्माजी के उस लोक को देखा था जो लोक सुवर्ण के ही द्वारा बना हुआ था । उस लोक का प्राकार (चहार दीवारी) भी सुवर्ण से संयुत था था और वह लोक मणियों के अनेक स्तम्भों से विभूषित हो रहा था ।२१।
तत्रापश्यत्समासीनं ब्रह्माणममितौजसम् । रत्नसिंहासने रम्ये रत्नभूषणभूषितम् ॥२२
२४२ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
सिद्धैर्देवैश्च मुनीन्द्रैश्च वेष्टितं ध्यानतत्परैः ।
विद्याधरीणां नृत्यं च पश्यंतं सस्मितं मुदा ॥२३
तपसां फलदातारं कर्त्तारं जगतां विभुम् ।
परिपूर्णतमं ब्रह्म ध्यायंतं यतमानसम् ॥२४
गुह्ययोगं प्रवोचंतं भक्तवृंदेषु संततम् ।
दृष्ट्वा तमव्ययं भक्त्या प्रणनाम भृगूद्वहः ॥२५
स दृष्ट्वा विनतं राममाशीर्भिरभिनंद्य च ।
पप्रच्छ कुशलं वत्स कथमागमनं कृथाः ॥२६
संपृष्टो विधिना रामः प्रोवाचाखिलमादितः ।
वृत्तांत कार्त्तवीर्यस्य पितुः स्वस्य महात्मनः ॥२७
तच्छ्रुत्वा सकलं ब्रह्मा विज्ञातार्थोऽपि मानद ।
उवाच रामं धर्मिष्ठ परिणामसुखावहम् ॥२८
वहाँ पर उस लोक में अपरिमित ओज से समन्वित विराजमान ब्रह्माजी का उस राम ने दर्शन किया था। जो परम रम्य रत्नों के सिंहासन पर समासी न थे और रत्नों के ही भूषणों के समलंकृत थे ।२२। उन ब्रह्माजी को चारों ओर से बड़े-बड़े सिद्धों और मुनीन्द्रों के ध्यान में समासक्त होकर घेर रखा था तथा था तथा वहाँ पर उनके सामने विद्याधरियों का नृत्य हो रहा था जिस नृत्यको बड़े ही आनन्द के साथ मुस्कराते हुए ब्रह्माजी देख रहे थे ब्रह्माजी उस समय में तपों के फल को प्रदान करने वाले—जगर्तों की रचना करने वाले—व्यापक और परिपूर्ण तप ब्रह्म का ध्यान कर रहे थे तथा उनने शपने मन को नियमन्त्रित कर रक्खा था ।२४। जो वहाँ पर भक्तों के समुदाय विद्यमान थे उनको निरन्तर परम गोपनीय योग को वे बतला रहे थे । इस रीति से विराजमान अव्यय उन ब्रह्माजी का भक्तिभाव से दर्शन प्राप्त करके उस भृगुकुल में समुत्पन्न राम ने उनके चरणों में प्रणिपात किया था ।२५। उन ब्रह्माजी ने विशेष रूप से नत उस राम को देखकर आशीर्वचनों के द्वारा उसका अभिनन्दन किया था । फिर उस राम से ब्रह्माजी ने उसका कुशल पूछा था इसके अनन्तर ब्रह्माजी ने राम से कहा था—हे वत्स ! तुमने किस प्रयोजन से यहाँ पर मेरे समीप में आगमन किया है ।२६। जब ब्रह्माजी ने इस रीति से राम से पूछा था तो उसने
परशुराम का शिव लोक गमन ] [ २४३
आरम्भ से सम्पूर्ण वृत्तान्त कहकर उनको सुना दिया था जिसमें कार्त्तवीर्य राजा के द्वारा जो कुछ किया गया था और महात्मा अपने पिता जमदग्नि पर जो कुछ दुःख पड़ा था यह सभी हाल था ।२७। इस सम्पूर्ण वृत्तान्त का श्रवण करके हे मानद ! यद्यपि ब्रह्माजी को यह सभी बातें पहिले ही विज्ञात थीं तथापि उन्होंने पूछकर सब कुछ सुना था और परिणाम में सुख आवहन करने वाले धर्मिष्ठ राम से कहा था ।२८।
प्रतिज्ञा दुर्लभा वत्स यां भवान्कृतवान् रुषा ।
सृष्टि रेषा भगवतः संभवेत्कृपया वटो ॥२९
जगत्सृष्टं मया तात संक्लेशेन तदाज्ञया ।
तन्नाशकारिणी चैव प्रतिज्ञा भवता कृता ॥३०
त्रिःसप्तकृत्वो निर्भूपां कर्तुमिच्छसि मेदिनीम् ।
एकस्य राज्ञो दोषेण पितुः परिभवेन च ॥३१
ब्रह्मक्षत्रियविट्शूद्रैः सृष्टिरेषा सनातनी ।
आविर्भूता तिरोभूता हरेरेव पुनः पुनः ॥३२
अव्यर्था त्वत्प्रतिज्ञा तु भवित्री प्राक्तनेन च ।
यद्वायासेन ते कार्यसिद्धिर्भवितुमर्हति ॥३३
शिवलोकं प्रयाहि त्वं शिवस्याज्ञामवाप्नुहि ।
पृथिव्यां बहवो भूपाः संति शंकरकिंकराः ॥३४
विनेवाज्ञां महेशस्य को वा तान्हंतुमीश्वरः ।
विभ्रतः कवचान्यंगे शक्तींश्चापि दुरासदाः ॥३५
हे वत्स ! आपकी यह प्रतिज्ञा बड़ी ही दुर्लभ है जिसको क्रोध के वंशीभूत होकर आपने किया है। हे बटो ! यह सृष्टि तो भगवान् की कृपा से ही होती है ।२९। हे तात ! यह आपको ज्ञात ही है कि उन्हीं परम प्रभु की आज्ञा से बड़े ही क्लेश के द्वारा इस समस्त जगत् का सृजन किया है और आपने इसी सृष्टि के नाश करने वाली प्रतिज्ञा कर डाली हैं ।३०। आप तो केवल एक ही राजा के दोष से तथा अपने पिता के तिरस्कार के होने से इस भूमि को इक्कीस बार भूपों से रहित करना चाहते हैं ।३१। यह सृष्टि तो ब्राह्मण-क्षत्रिय-वैश्य और शूद्र-इन चारों वर्णों से समन्वित सर्वदा से ही
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चली आने वाली है। इसका आविर्भाव और तिरोभाव तो बार-बार भग- वान् हरि से ही हुआ करता है ।३२। आपकी जो प्रतिज्ञा है वह भी अव्यर्थ होने वाली ही है और प्राक्तन अथवा आयास से आपके कार्य की सिद्धि होने के योग्य होती है ।३३। अब मेरा मत यही है कि शिवलोक में गमन कीजिए और अपनी की हुई प्रतिज्ञा के विषय में भगवान् शिव की आज्ञा को प्राप्त कीजिए । कारण यह है कि इस भूमण्डल में बहुत से भूप भगवान् शिव के सेवक हैं ।३४। बिना महेश्वर की आज्ञा प्राप्त किये हुए किसकी सामर्थ्य है कि उन सब भूपों का हनन कर सके । ये सब शिव के भक्त राजा लोग अपने अङ्गों में कवच धारण करने वाले हैं तथा दुरासदद को भी ये सब धारण किया करते हैं ।३५।
उपायं कुरु यत्नेन जयबीजं शुभावहम् । उपाये तु समारब्धे सर्वे सिध्यन्त्युपक्रमाः ॥३६ श्रीकृष्णमंत्रं कवचं गृह्य वत्स गुरोर्हरात् । दुर्लङ्घ्यं वैष्णवं तेजः शिवशक्तिर्विजेष्यति ॥३७ त्रैलोक्यविजयं नाव कवचं परमाद्भुतम् । यथाकथं च विज्ञाप्य शंकरं लभ दुर्लभम् ॥३८ प्रसन्नः स गुणैस्तुभ्यं कृपालुर्दीनवत्सलः । दिव्यपाशुपतं चापि दास्यत्येव न संशयः ॥३९
यत्न के साथ उपाय करिए। जप का बीज शुभ का आवाहन करने वाला है। जब उपाय का आरम्भ कर दिया जाता है तो उसके कर देने पर सभी उपक्रम सिद्ध हो जाया करते हैं ।३६। अपने गुरुदेव हर से हे वत्स ! श्रीकृष्ण का मन्त्र और वज्र का ग्रहण करो । उससे दुर्लङ्घ्य वैष्णव तेज और शिव की शक्ति हो जायगी । जोकि विजय करेगी ।३७। भगवान् शिव के पास एक त्रैलोक्य के विजय करने वाला इसी नाम का परम दुर्लभ कवच विद्यमान है । यह कवच अतीव अद्भुत है । जिस किसी भी प्रकार से भग- वान् शङ्कर को प्रसन्न करके उनसे इसके प्राप्त करने की प्रार्थना करो और इस दुर्लभ वस्तु की प्राप्ति उनसे करो ।३८। आपके गुण गणों से वे भगवान् शिव प्रसन्न हैं और वे बहुत ही दयालु तथा दीनों पर प्यार करने वाले हैं। वे तुमको अपना दिव्य पाशुपत अस्त्र भी अवश्य ही प्रदान कर ही देंगे— इसमें कुछ भी संशय नहीं है ।३९।
परशुराम का शिवाराधन ] [ २४५
परशुराम का शिवाराधन
वसिष्ठ उवाच-
ब्रह्मणो वचनं श्रुत्वा स प्रणम्य जगद्गुरुम् ।
प्रसन्नचेताः सुभृशं शिवलोकं जगाम ह ॥१
लक्षयोजनमूर्द्ध्वं च ब्रह्मलोकाद्विलक्षणम् ।
अथानिर्वचनीयं च योगिगम्यं परात्परम् ॥२
वैकुण्ठो दक्षिणे यस्माद्गौरीवश्च वामतः ।
यदधो ध्रुवलोकश्च सर्वलोकपरस्तु सः ॥३
तपोवीर्यगती रामः शिवलोकं ददर्श च ।
उपमानेन रहितं नानाकौतुकसंयुतम् ॥४
वसंति यत्र योगींद्राः सिद्धाः पाशुपताः शुभाः ।
कोटिकल्पतपः पुण्याः शांता निर्मत्सरा जनाः ॥५
पारिजातमुखैर्वृक्षैः शोभितं कामधेनुभिः ।
योगेन योगिना सृष्टं स्वेच्छया शंकरेण हि ॥६
शिल्पिनां गुरुणा स्वप्ने न दृष्टं विश्वकर्मणा ।
सरोवरशतैर्दिव्यैः पद्मरागविराजितैः ॥७
श्री वसिष्ठ जी ने कहा—वह राम ब्रह्माजी के इस वचन को सुनकर फिर ब्रह्माजी के चरणों में प्रणाम करके अत्यन्त ही प्रसन्न चित्त वाला होता हुआ वहाँ से शिव के लोक को चला ।१। वह शिवका लोक वहाँ से एक लाख योजन ऊपर की ओर था और वह इस ब्रह्माजी के लोक से भी अधिक विलक्षण था । उसका वर्णन वचनों के द्वारा तो हो ही नहीं सकता है । ऐसा ही यह अनिर्वचनीय था और पर से भी पर था तथा योगी जनों के ही द्वारा गमन करने के योग्य था ।२। जिस शिवलोक से वैकुण्ठ तो दक्षिण दिशा में है और गौरी लोक बाँई ओर है तथा जिनके नीचे की ओर ध्रुव लोक है और वह शिवलोक सभी लोकों से पर है ।३। तपश्चर्या और बल-विक्रम के वीर्य की गति वाले उस राम ने उस शिवलोक का दर्शन कर लिया था । वह अनेक प्रकार के कौतुकों से युक्त था तथा उसकी समानता रखने वाला अन्य कोई भी उपमान ही नहीं था ।४। वह ऐसा लोक था जहाँ
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पर केवल महान् योगीन्द्र-सिद्ध और परम शुभ पाशुपत ही निवास किया करते हैं । जो करोड़ों कल्पों तक तपस्या करने के महान् पुनीत पुण्य वाले- परम शान्त शील-स्वभाव वाले और मत्सरता से रहित जन थे वे ही उस लोक के निवास करने वाले थे ।५। वह लोक पारिजात मुख्य वाले वृक्षों से तथा कामधेनुओं से परम सुशोभित था जिन सबका योगिराजाधिराज भग- वान् शङ्कर ने अपने ही योगबल से स्वेच्छा पूर्वक सृजन किया था । समस्त कामनाओं को पूर्ण करने वाली धेनु कामधेनु कही जाती है तथा मनकी इच्छाओं को पूरा करने वाला वृक्ष कल्पवृक्ष होता है उन्हीं का एक भेद परिजात देव वृक्ष है ।६। इस लोक की रचना ऐसी ही परम अद्भुत थी कि विश्व के शिल्पियों के परम गुरु विश्वकर्मा ने कभी स्वप्न में भी नहीं देखी थी फिर उसके भी द्वारा स्वयं ऐसी रचना का करना तो बहुत ही दूर की बात है । उस लोक में परम दिव्य सैकड़ों ही सरोवर थे जिनके घाट और सोढ़ियाँ तथा सम्पूर्ण प्राकार मण्डल पद्मराग नाम वाली मणियों के द्वारा विनिर्मित था । इन सब सरोवरों से वह लोक परमाधिक शोभा से समन्वित था ।७।
शोभितं चातिरम्यं च संयुक्तं मणिवेदिभिः ।
सुवर्णरत्नरचितप्राकारेण समावृतम् ॥८
आयूद्ध र्वमंबरस्पर्शि स्वच्छं क्षीरनिभं परम् ।
चतुर्द्वारसमायुक्तं शोभितं मणिवेदिभिः ॥६
रक्तसोपानयुक्तंश्च रत्नस्तम्भकपाटकैः ।
नानाचित्रविचित्रंश्च शोभितैः सुमनोहरैः ॥१०
तन्मध्ये भवनं रम्यं सिंहद्वारोपशोभितम् ।
ददर्श रामो धर्मात्मा विचित्रमिव संगतः ॥११
तत्र स्थितौ द्वारपालौ ददर्शातिभयंकरौ ।
महाकरालदंतास्यौ विकृतारक्तलोचनौ ॥१२
दग्धशैलप्रतीकाशौ महाबलपराक्रमौ ।
विभूतिभूषितांगौ च व्याघ्रचर्मांवरौ च तौ ॥१३
त्रिशूलपट्टिशधरौ ज्वलंतौ ब्रह्मतेजसा ।
तौ दृष्ट्वा मनसा भीतः किंचिदाह विनीतवत् ॥१४
परशुराम का शिवाराधन ] [ २४७
वह लोक मणियों के द्वारा निर्मित अनेक वेदियों से बहुत ही अधिक सुरम्य एवं शोभित था। इसके चारों ओर सुवर्ण का प्राकार (परकोटा) बना हुआ था ।८। यह लोक बहुत ही ऊँचा था जो कि अन्तरिक्ष का स्पर्श कर रहा था तथा वह इतना अधिक स्वच्छ एवं शुद्ध था कि क्षीर के ही समान दिखाई दे रहा था । इस लोक में चार परम विशाल द्वार बने हुए थे जिनका निर्माण मणियों की वेदियों से किया गया था ।६। इसमें ऊपर चढ़ने के लिए रत्नों के द्वारा विनिर्मित सोपानों की श्रेणियाँ थीं और इसमें जो स्तम्भ तथा कपाट बने हुए थे वे भी सब रत्नों के थे । इसे लोक में जो भी रचना थी वह अनेक प्रकार की चित्रविचित्र थी तथा परम मनोहर थी जिससे यह लोक परम शोभित हो रहा था ।१०। उस लोक के मध्य में सिद्धों के द्वारा उपशोभित एक सुरम्य भवन बना हुआ था । उस धर्मात्मा राम ने वहाँ पर पहुँचकर उसकी एक विचित्र स्थल के ही समान देखा था ।११। वहाँ पर उस रामने देखा था कि अतीव भयङ्कर दो द्वारपाल स्थित थे । जिनके महान् कराल मुख और दाँत थे तथा बहुत ही विकृत लाल नेत्र थे ।१२। वे द्वारपाल ऐसे ही प्रतीत हो रहे थे मानों वे दग्ध पर्वत होवें । वे महान् बल और विक्रम से समन्वित थे । उनके शरीरों में विभूति लगी हुई थी जिससे उनका अङ्ग विभूषित था और वे व्याघ्र के चर्मों के वस्त्र धारण किये हुए थे ।१३। वे दोनों द्वारपाल त्रिशूल और पट्टिश धारण करने वाले थे तथा ब्रह्मतेज से जाज्वल्यमान हो रहे थे । उन को देखकर राम अपने मन में भय से भीत हो गया था बहुत ही विनीत होकर उन से कुछ बोला था ।१४।
नमस्करोमि वामीशौ शंकरं द्रष्टुमागतः ।
ईश्वराज्ञां समादाय मामथाज्ञप्तुमर्हथ ॥१५
तौ तु तद्वचनं श्रुत्वा गृहीत्वाऽज्ञां शिवस्य च ।
प्रवेष्टुमाज्ञां ददतुरीश्वरानुचरौ च तौ ॥१६
स तदाज्ञामनुप्राप्य विवेशान्तः पुरं मुदा ।
तत्रातिरम्यां सिद्धौघैः समाकीर्णां सभां द्विजः ॥१७
दृष्ट्वा विस्मयमापेदे सुगंधबहुलां विभोः ।
तत्रापश्यच्छिवं शांतं त्रिनेत्रं चन्द्रशेखरम् ॥१८
त्रिशूलशोभितकरं व्याघ्रचर्मवरांबरम् ।
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विभूतिभूषितांगे च नागयज्ञोपवीतिनम् ।।१६ आत्मारामं पूर्णकामं कोटिसूर्यसमप्रभम् । पंचाननं दशभुजं भक्तानुग्रहविग्रहम् ।।२० योगज्ञाने प्रब्रुवंतं सिद्धेभ्यस्तर्कमुद्रया । स्तूयमानं च योगींद्रैः प्रथमप्रकरैर्मुदा ।।२१
राम ने कहा-ईश आप दोनों की सेवा में मेरा प्रणाम स्वीकृत होवे। मैं इस समय में भगवान् शङ्कर के दर्शन प्राप्त करने के लिए ही यहाँ पर समागत हुआ हूँ। अब भगवान् ईश्वर की आज्ञा प्राप्त करके मुझे दर्शन करने के लिए आदेश प्रदान करने को आप योग्य होते हैं ।१५। उन ईश्वर के दोनों अनुचरों ने राम के वचनों का श्रवण करके और फिर शिव की आज्ञा को प्राप्त करके राम को अन्दर प्रवेश करने के लिये उन्होंने आज्ञा देदी थी ।१६। उस राम ने भी उनकी आज्ञा प्राप्त करके बड़े ही हर्ष के साथ उस अन्तःपुर में प्रवेश किया था । वहाँ पर उसने एक सभा का स्थल देखा था जो इस द्विज ने सिद्धों के समुदायों से समाकीर्ण देखा था और जिसमें अनेक प्रकार की बड़ी ही सुन्दर सुगन्ध भरी हुई थी तथा वह बहुत ही सुरम्य था । इस सभा-स्थल का अवलोकन करके बड़ा ही विस्मय हो गया था । वहाँ पर फिर उस रामने परम शान्त तीन नेत्र के धारण करने और मस्तक में चन्द्र को धारण किये हुए भगवान् शिव का दर्शन किया था ।१७-१८। भगवान् शंकर के कर में त्रिशूल शोभित हो रहा था और वे व्याघ्र के चर्म को वस्त्र के स्थान में पहिने हुए थे । उनके सम्पूर्ण अङ्गों में श्मशान की भस्म लगी हुई थी और उनका शरीर नागों के यज्ञोपवीत से शोभित था ।१९। प्रभु शंकर अपनी ही आत्मा में रमण करने वाले थे—पूर्ण काम थे और उनकी सभी कामनाएं परिपूर्ण थीं और करोड़ों सूर्यों के समान परमोज्ज्वल प्रभा थी । वे पाँच मुखों वाले—दश भुजाओं से शोभित और अपने भक्तों पर परमाधिक अनुग्रह करने वाले थे ।२०। उस समय में शिव सिद्धों के लिए तर्क की मुद्रा के द्वारा योग और ज्ञान का विषय बतला रहे थे। बड़े-बड़े योगीन्द्र और प्रथमगण बड़े ही आनन्द के साथ उनका स्तवन कर रहे थे ।२१।
भैरवैर्योगिनीभिश्च वृतं रुद्रगणैस्तथा । मूर्ध्ना नमाम तं दृष्ट्वा रामः परगया मुदा ।।२२
परशुराम का शिवाराधन ] [ २४६
वामभागे कार्त्तिकेयं दक्षिणे च गणेश्वरम् । नंदीश्वरं महाकालं वीरभद्रं च तत्पुरः ॥२३ क्रोडे दुर्गां शतभुजां दृष्ट्वा नत्वाथ तामसि । स्तोतुं प्रचक्रमे विद्वान्गिरा गद्गदया विभुम् ॥२४ नमस्ते शिवमेशानं विभुं व्यापकमव्ययम् । भुजंगभूषणं चोग्रं नृकपालस्रगुज्ज्वलम् ॥२५ यो विभुः सर्वलोकानां सृष्टिस्थितिविनाशकृत् । ब्रह्मादिरूपधृग्ज्येष्ठस्तं त्वां वेद कृपार्णवम् ॥२६ वेदा न शक्ता यं स्तोतुमवाङ्मनसगोचरम् । ज्ञानबुद्ध्योरसाध्यं च निराकारं नमाम्यहम् ॥२७ शक्रादयः सुरगणा ऋषयो मनवोऽसुराः । न यं विदुर्यथातत्वं तं नमामि परात्परम् ॥२८
भगवान् शिव को भैरव—योगिनियाँ और रुद्र के गणों ने चारों ओर से घेर रखा था । ऐशी दशा में विराजमान हुए भगवान शिव का दर्शन करके राम ने बड़े ही हर्ष से अपने शिर को उनके चरणों में झुका कर प्रणाम किया था ।२२। उनके वाम भाग में स्वामी कार्त्तिकेय थे और दाहिनी ओर गणनायक गणेश विराजमान थे तथा उनके सामने नन्दीश्वर-महाकाल और वीरभद्र स्थित हो रहे थे ।२३। शिव की गोद में सौ भुजाओं वाली जगज्जननी दुर्गा विद्यमान थी । इनका दर्शन करके राम ने उनको भी प्रणाम किया था । इसके अनन्तर विद्वान् राम ने अपनी गद्गद वाणी से उन विभु की स्तुति करने का उपक्रम किया था ।२४। राम ने कहा था—मैं ईशान-विभु-व्यापक-अव्यय-भुजङ्गों के भूषणों वाले—उग्र और नरों के कपालों की माला के धारण करने से परमोज्ज्वल शिव की सेवा में प्रणाम करता हूँ ।२४-२५। जो विभु समस्त लोकों को सृष्टि स्थिति और विनाश के करने वाले हैं ऐसे ब्रह्मा आदि के स्वरूप को धारण करने वाले—सबसे बड़े उन आप कृपा के सागर को मैं जानता हूँ ।२६। जिन मन और वाणी के आगोचर प्रभु की स्तुति करने में वेद भी समर्थ नहीं हैं उन ज्ञान और बुद्धि के द्वारा साधन के अयोग्य तथा बिना आकार वाले प्रभु शिव के चरणों में मैं नमस्कार करता हूँ ।२७। महेन्द्र आदि देवगण-ऋषिगण-मनु और असुर
२५० ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
ये सब जिनके स्वरूप का यथार्थ रूप से नहीं जाना करते हैं उन पर से भी पर प्रभु शिव के लिए मैं प्रणिपात करता हूँ ॥२८॥
यस्यांशांशेन सृज्यंते लोकाः सर्वे चराचराः ।
लीयंते च पुनर्यस्मिंस्तं नमामि जगन्मयम् ॥२६॥
यस्येषत्कोपसंभूतो हुताशो दहतेऽखिलम् ।
सोर्ध्वंलोकं सपातालं तं नमामि हरं परम् ॥३०॥
पृथ्वीपवन वह्नयम्भोनभोयज्वेंदुभास्कराः ।
मूर्त्तयोऽष्टौ जगत्पूज्यास्तं यज्ञं प्रणमाम्यहम् ॥३१॥
यः कालरूपो जगदादिकर्त्ता पाता पृथग्रूपधरो
जगन्मयः ।
हर्त्ता पुन रुद्रवपुस्तथांते तं कालरूपं शरणं प्रपद्ये ॥३२॥
इत्येवमुक्त्वा स तु भार्गवो मुदा पपात
तस्यांघ्रिसमीप आतुरः ।
उत्थाप्य तं वामकरेण लीलया दधौ तदा मूर्ध्नि
करं कृपार्णवः ॥३३॥
आशीभिरेनं ह्यभिनंद्य सादरं निवेशयामास गणेशपूर्वतः ।
उवाच वामामभिवीक्ष्य चाप्युमां
कृपार्द्रदृष्ट्याऽखिलकामपूरकः ॥३४॥
शिव उवाच--
कस्त्वं वटो कस्य कुले प्रसूतः किं कार्यमुद्दिश्य
भवानिहागतः ।
विनिर्दिशाहं तव भक्तिभावतः प्रीतः प्रदद्यां भवतो
मनोगतम् ॥३५॥
जिन पूज्य देव के अंशों के भी अंशों के द्वारा चर और अचर समस्त लोक सृजित हुआ करते हैं और फिर जिसमें ही ये सब लीन हो जाया करते हैं उन जगन्मय प्रभु को मैं नमस्कार करता हूँ ।२६। जिन प्रभु के बहुत ही अल्प कोप से समुत्पन्न हुआ अग्नि ऊर्ध्वलोक और पाताल के सहित सम्पूर्ण
परशुराम का शिवाराधन ] [ २५१
इस विश्व को दग्ध कर देता है उन हर की सेवा में जो पर हैं मैं प्रणाम हूँ ।३०। जिसकी पृथ्वी-पवन-अग्नि-जल-नभ-यज्वा-चन्द्र और भास्कर में आठ मूर्तियाँ जगत् की पूज्य हैं उन यज्ञ स्वरूप देव को मैं नमस्कार करता हूँ ।३१। जो काल के स्वरूप वाले इस सम्पूर्ण जगत् के आदि करने वाले अर्थात् ब्रह्मा हैं इसका पालन करने वाले हैं और अपना यह जगन्मय रूप धारण किया करते हैं । फिर रुद्र का स्वरूप धारण करके अन्त में इस सबका संहार करने वाले हैं उन काल के रूप वाले भगवान् शंकर की मैं शरणागति में प्राप्त होता हूँ ।३२। वह भार्गव राम इस रीति से इतना ही स्तवन करके बड़े ही आनन्द से उन शिव के चरणों के समीप परमाधिक आतुर होकर गिर पड़ा था । तब कृपा के सागर भगवान् शंकर ने अपने बाँये करकमल से लीला से ही उसको उठाकर उसके मस्तक पर अपनाकर रख दिया था ।३३। अनेक आशीर्वचनों के द्वारा उसका अभिनन्दन करके बड़े ही आदर के साथ अपने प्रिय आत्मज गणेश के आगे उसको बिठा दिया था । फिर अपनी वामा उमा का अभिवीक्षण करके समस्त कामनाओं के पूर्ण करने वाले शिव ने कृपार्द्र दृष्टि से उससे कहा था ।३४। शिव ने कहा—हे वटो ! आप यह बताइए कि आप कौन हैं और किसके वंश में आपने जन्म ग्रहण किया है और आप किस कार्य के कराने का उद्देश्य लेकर यहाँ पर समागत हुए हैं—यह सभी कुछ सूचित कीजिए । मैं आपकी इस प्रकार की भक्ति की भावना से आपके ऊपर परम प्रसन्न हो गया हूँ तथा जो भी कुछ आपके मन का अभीप्सित है उस सबको मैं आपके लिए दे दूँगा ।३५।
इत्येवमुक्तः स भृगुर्महात्मना हरेण विश्वार्त्तिहरेण सादरम् ।
पुनश्च नत्वा विबुधां पतिं गुरुं कृपासमुद्रं समुवाच सत्वरम् ।।३६
परशुराम उवाच ।
भृगोश्चाहं कुले जातो जमदग्निसुतो विभो ।
रामो नाम जगद्वन्द्यं त्वामहं शरणं गतः ।।३७
यत्कार्यार्थमहं नाथ तव सांनिध्यमागतः ।
तं प्रसाधय विश्वेश वांछितं काममेव मे ।।३८
२५२ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
मृगयामागतस्यापि कार्तवीर्यस्य भूपते । आतिथ्यं कृतवान् देव जमदग्निः पिता मम ॥३६ राजा तं स बलाल्लोभात्पातयामास मन्दधीः । सा धेनुस्तं मृतं दृष्ट्वा गवां लोकं जगाम ह ॥४० राजा न शोचन्मरणं पितुर्मम निरागसः । जगाम स्वपुरं पश्चान्माता मे प्रारुदद्भृशम् ॥४१ तज्ज्ञात्वा लोकवृत्तज्ञो भृगुर्नः प्रपितामहः । आजगाम महादेव ह्यहप्यागतो वनात् ॥४२
जब इस रीति से वह भृगुकुलोद्भूत राम सम्पूर्ण विश्व की आर्त्ति के हरण करने वाले महात्मा शम्भु के द्वारा बड़े ही आदर के साथ कहा गया था तब तो उन देवों के स्वामी और कृपा के सागर गुरु की सेवा में उस राम ने फिर एक बार प्रणाम करके बहुत ही शीघ्र निवेदन किया था ।३६। परशुराम ने कहा—हे भगवन् ! मैं भृगु मुनि के कुल में समुत्पन्न हुआ हूँ और हे विभो ! जमदग्नि ऋषि का पुत्र हूँ । मेरा नाम छोटा सा राम—यह है । आप तो समस्त जगत् की वन्दना करने के योग्य हैं। मैं ऐसे समय में आपकी शरणागति में प्रपन्न हुआ हूँ ।३७। हे नाथ ! जिस कार्य के लिए मैं आपकी सन्निधि में समागत हुआ हूँ । हे विश्वेश्वर ! उसको आप कृपा कर प्रसाधित कीजिए और मेरी कामना है कि अब आप मेरा वांछित जो भी है उसे मुझे प्रदान कीजिए ।३८। मेरे पिता जमदग्नि ने हे देव ! मृगया के लिए वन में आये हुए राजा कार्तवीर्य का बहुत अच्छी तरह से आतिथ्य-सत्कार किया था ।३९। उस महानन्द मति वाले राजा ने लोभ के वशीभूत होकर बलपूर्वक मेरे पिता को मार डाला था। जो एक धेनु थी जिसके ग्रहण करने का लालच राजा के मन में हो गया था वह होमधेनु भी मेरे पिता को मरा हुआ देखकर गो-लोक में चली गयी थी ।४०। राजा ने निरपराध मेरे पिता की मृत्यु के विषय में कुछ भी चिन्ता नहीं की थी और फिर वह अपने नगर में चला गया था। इसके पीछे मेरी माता रेणुका अत्यन्त रुदन कर रही थी ।४१। इस घटना का ज्ञान प्राप्त करके लोक के वृत्त के ज्ञाता हमारे पितामह भृगुमुनि हे महादेव ! वहाँ पर आ गये थे । मैं समिधा लेने के लिए उस समय में वन में गया हुआ था सो मैं भी इसी बीच में वहाँ पर समागत हो गया था ।४२।
परशुराम का शिवाराधन ] [ २५३
मया सह सुदुःखार्त्तान्भ्रातॄन्मात्रा सहैव मे । सान्त्वयित्वा स मंत्रज्ञोऽजीवयत्पितरं मम ॥४३ आनामते भृगौ मातुर्दुःखेनाहं प्रकोपितः । प्रतिज्ञां कृतवान्देव सांत्वयन्मातरं स्वकाम् ॥४४ त्रिःसप्तकृत्वो यदुरस्ताडितं मातुरात्मनः । तावत्संख्यमहं पृथ्वीं करिष्ये क्षत्रवर्जिताम् ॥४५ इत्येवं परिपूर्णा मे कर्त्ता देवो जगत्पतिः । महादेवो ह्यतो नाथ त्वत्सकाशमिहागतः ॥४६ वसिष्ठ उवाच-- इत्येवं तद्वचः श्रुत्वा दृष्ट्वा दुर्गामुखं हरः । बभूवानम्रवदनश्चिन्तयानः क्षणं तदा ॥४७ एतस्मिन्नंतरे दुर्गा विस्मिता प्राहसद्भृशम् । उवाच च महाराज भार्गवं वैरसाधकम् ॥४८ तपस्विन्द्विजपुत्र क्षमां निर्मूलां कर्त्तुमिच्छसि । त्रिः सप्तकृत्वः कोपेन साहसस्ते महाम्बटो ॥४९
उस समय में मैं रुदन कर रहा था और अपनी माता के साथ मेरे सब भाई भी क्रन्दन कर रहे थे। उस मन्त्र शास्त्र के ज्ञाता मुनि ने सबको सान्त्वना देकर मेरे मृत पिता जमदग्नि को संजीवनी विद्या से जीवित कर दिया था।४३। जब तक भृगु मुनि वहाँ पर नहीं आये थे उस बीच में मैं माता के वैधव्य के दुःख से बहुत ही कुपित हो गया था। हे देव! मैंने अपनी माता को सान्त्वना देते हुए एक प्रतिज्ञा कर डाली थी।४४। मेरी माता ने करुण क्रन्दन करते हुई ने जो इक्कीस वार अपना उरःस्थल ताड़ित किया था उसी गणना को लेकर ही मैंने यह प्रतिज्ञा की थी कि इक्कीस वार ही मैं इस पृथ्वी को क्षत्रियों से रहित कर दूँगा।४५। यह इस रीति से की हुई मेरी प्रतिज्ञा परिपूर्ण हो जावे--इसके पूर्ण करने वाले जगत् के पति देवेश्वर आप ही हैं। आप तो सब से बड़े देव हैं। हे नाथ! इसीलिए मैं अब आपके चरणों की सन्निधि में यहाँ पर आया हूँ।४६। वसिष्ठजी ने कहा--भगवान् शंकर ने इस प्रकार से उस राम के वचनों का श्रवण करके जगज्जननी दुर्गा के मुख की ओर देखा था और उस समय में एक क्षण के लिए
२५४ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
नीचे को ओर अपना मुख करके चिन्तन करने वाले प्रभु शंकर हो गये थे ।४७। इसी अन्तर में जगदम्बा देवी दुर्गा विस्मित होती हुई अत्यधिक हँस गयी थीं। और हे महाराज ! बैर के साधक उस भार्गव राम से बोली ।४८। जगदम्बा ने कहा था कि हे तपस्विन् ! द्विज के पुत्र ! क्या तुम इस भूमण्डल को भूपों से विहीन करने की इच्छा कर रहे हो ? और वह भी एक-दो बार नहीं प्रत्युत कोप से इक्कीस बार ऐसा करना चाहते हो । हे बटो ! यह तो आपका एक बहुत ही महान साहस है ।४६।
हंतुमिच्छसि निःशस्त्रः सहस्रार्जुनमीश्वरम् । भ्रूभंगलीलया येन रावणोऽपि निराकृतः ॥५० तस्मै प्रदत्तं दत्तेन श्रीहरेः कवचं पुरा । शक्तिरत्यर्थवीर्या च तं कथं हंतुमिच्छसि ॥५१ शंकरः करुणासिद्धः कत्तुं चाप्यन्यथा विभुः । न चान्यः शंकरात्पुत्र सत्कार्यं कत्तुं मीश्वरः ॥५२ अथ देव्या अनुमतिं प्राप्य शंभुद्द यार्णवः । अभ्यधाद्भद्रया वाचा जमदग्निसुतं विभु ॥५३
शिव उवाच- अद्यप्रभृति विप्र त्वं मम स्कन्दसमो भव । दास्यामि मंत्रं दिव्यं ते कवचं च महामते ॥५४ लीलया यत्प्रसादेन कार्त्तवीर्यं हनिष्यसि । त्रिःसप्तकृत्वो निर्भू पां महीं चापि करिष्यसि ॥५५ इत्युक्त वा शंकरस्तस्मै ददौ मंत्रं सुदुर्लभम् । त्रैलोक्यविजयं नाम कवचं परमाद्भुतम् ॥५६
उस राजा सहस्रार्जुन का बिना ही शस्त्रों वाले होते हुए तुम हनन करने की इच्छा कर रहे हो जिसने अपनी भ्रूभङ्ग की लीला से अर्थात् जरा सी भृकुटी तिरछी करके रावण जैसे महापराक्रमी को भी निराहत कर दिया था अर्थात् अपने सामने निराहत करके भगा दिया था ।५०। उस राजा को तो पहिले दत्तात्रेय मुनि ने श्री हरि का कवच प्रदान किया था और अत्यन्त वीर्य से समन्वित एक शक्ति भी उसके लिए दी थी । उसको
परशुराम का शिवाराधन ] [ २५५
तुम किस प्रकार से मार देना चाहते हो ? ।५१। भगवान् शंकर तो करुणा के अथाह सागर हैं और करुणा से ही सिद्ध हो जाते हैं। यह विभु तो परम समर्थ हैं सभी कुछ अन्यथा भी कर सकते हैं। हे पुत्र ! भगवान् शंकर के अतिरिक्त अन्य कोई भी इस कार्य के करने में समर्थ नहीं है ।५२। इसके अनन्तर देवी के इन वचनों से दया के सागर भगवान् शम्भु ने दुर्गा देवी की भी अनुमति प्राप्त कर ली थी और फिर विभु शम्भु ने जमदग्नि के पुत्र से परम भद्र वाणी के द्वारा कहा था ।५३। भगवान शिव ने कहा-हे विप्र ! आज से लेकर तुम मेरे पुत्र कार्तिकेय के समान हो जाओगे। हे महान् मति वाले ! मैं आपको परम दिव्य मन्त्र और कवच दे दूँगा ।५४। योंही बिनाही किसी आयास के लीला ही से जिनके प्रसाद के प्रभाव से आप कार्त्तवीर्य का हनन कर दोगे और जैसी तुम्हारी प्रतिज्ञा है वह भी पूर्ण होगी और इक्कीस बार इस पृथ्वी को भी भूपों से रहित तुम कर दोगे ।५५। इतना यह इस रीति से कहकर भगवान् शम्भु ने उस परशुराम के लिए सुदुर्लभ मन्त्र प्रदान कर दिया था और तीनों लोकों का विजय करने वाला परम अद्भुत कवच भी उसे दे दिया था ।५६।
नागपाशं पाशुपतं ब्रह्मास्त्रं च सुदुर्लभम् ।
नारायणास्त्रमाग्नेयं वायव्यं वारुणं तथा ॥५७
गांधर्वं गारुडं चैव जृंभणास्त्रं महाद्भुतम् ।
गदां शक्तिं च परशुं शूलं दण्डमनुत्तमम् ॥५८
शस्त्रास्त्रग्राममखिलं प्रहृष्टः संबभूव ह ।
नमस्कृत्य शिवं शांतं दुर्गा स्कन्दं गणेश्वरम् ॥५९
परिक्रम्य ययौ रामः पुष्करं तीर्थमुत्तमम् ।
सिद्धं कृत्वा शिवोक्तं तु मन्त्रं कवचमुत्तमम् ॥६०
साधयामास निखिलं स्वकार्यं भृगुनन्दनः ।
निहत्य कार्त्तवीर्यं तं ससैन्यं सकुलं मुदा ।
विनिवृत्तो गृहं प्रागात्पितुः स्वस्य भृगूद्वहः ॥६१
नागपाश—पाशुपत और सुदुर्लभ ब्रह्मास्त्र—नारायणास्त्र—आग्नेय —वायव्य-वारुण अस्त्र भी दिये थे ।५७। गान्धर्व-गारुड़ और परम अद्भुत जृम्भणा भी प्रदत्त कर दिया था। तथा गदा-शक्ति-शूल-उत्तम दण्ड उसको
[ २५६ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
दे दिया था ।५८। इस तरह सम्पूर्ण शस्त्रों और अस्त्रों के समूह को पाकर राम बहुत ही प्रसन्न हुआ था । फिर उस परशुराम ने परम शान्त शिव को—दुर्गा देवी को—स्वामी कार्त्तिकेय को और गणेश्वर की सेवा में प्रणिपात करके तथा इन सबकी परिक्रमा करके फिर वह राम परमोत्तम तीर्थ पुष्कर को वहाँ से चला गया था और वहाँ पर संस्थिति करते हुए भगवान् शिव के द्वारा बताये हुए उत्तम मन्त्र को और कवच को सिद्ध किया था ।५९-६०। फिर भृगु नन्दन ने बड़े ही आनन्द से सम्पूर्ण कुल और सेना के सहित राजा कार्तवीर्य का निहनन करके अपना पूर्ण कार्य साधित किया था । फिर वह राम अपने पिता के घर को विनिवृत्त होकर चला गया था ।६१।
— X —
॥ मृगमृगी कथा ॥
सगर उवाच- ब्रह्मपुत्र महाभाग महान्मेऽनुग्रहः कृतः । यदिदं कवचं मह्यं प्रकाशितमनामयम् ॥१
और्वेणानुगृहीतोऽहं कृतास्त्रो यदनुग्रहात् । भवतस्तु कृपापात्रं जातोऽहमधुना विभो ॥२
रामेण भार्गवेन्द्रेण कार्त्तवीर्यो नृपो गुरो । यथा समापितो वीरस्तन्मे विस्तरतो वद ॥३
कृपापात्रं स दत्तस्य राजा रामः शिवस्य च । उभौ तौ समरे वीरौ जघटाते कथं गुरो ॥४
वसिष्ठ उवाच- शृणु राजन्प्रवक्ष्यामि चरितं पापनाशनम् । कार्त्तवीर्यस्य भूपस्य रामस्य च महात्मनः ॥५
स रामः कवचं लब्ध्वा मंत्रं चैव गुरोर्मुखात् । चकार साधनं तस्य भक्त्या परमया युतः ॥६
भूमिशायी त्रिश्ववणं स्नानसंध्यापरायणः । उवास पुष्करे राम शतवर्षमतंद्रितः ॥७
मृगमृगी कथा ] [ २५७
राजा सगर ने कहा---हे ब्रह्माजी के पुत्र ! आप तो महान् भाग वाले हैं। मेरे ऊपर आपने बड़ा भारी अनुग्रह किया है कि यह कवच जो कि अनामय है, मेरे सामने आपने प्रकाशित कर दिया है ।१। कृतास्त्र में और्व के द्वारा अनुगृहीत हुआ हूँ । हे विभो ! इस समय में तो मैं आपकी कृपा का पात्र बन गया हूँ ।२। हे गुरुदेव ! भार्गवेन्द्र परशुराम ने राजा कार्त्तवीर्य को जो बड़ा ही वीर था जिस प्रकार से समाप्त किया था वह सब विस्तार के साथ मेरे सामने वर्णन करके सुनाइए ।३। वह राजा तो दत्तात्रेय मुनि की कृपा का पात्र था और राम भगवान शिव की अनुकम्पा का भाजन था । हे गुरुवर ! ये दोनों ही महान् वीर थे । समर क्षेत्र में किस प्रकार से इन्होंने युद्ध किया था ।४। वसिष्ठ जी ने कहा---हे राजन् ! अब आप श्रवण कीजिए मैं इस चरित को बतलाऊँगा क्योंकि यह चरित तो पापों का विनाश कर देने वाला है । यह चरित महान् बलशाली राजा कार्त्तवीर्य का तथा महान् आत्मा वाले परशुराम के महायुद्ध का है ।५। उन परशुराम ने गुरुदेव के मुख से इस कवच और मन्त्र की दीक्षा ग्रहण की थी फिर उन परशुराम ने बड़ी भारी भक्ति से युक्त होकर इनको सिद्ध किया था ।६। भूमि पर इन्होंने शयन किया था---तीनों कालों में सन्ध्योपासना की थी और यह स्नान तथा सन्ध्या में परायण हो गये थे । इस प्रकार में यह सब साधना करते हुए राम बहुत ही समाहित होकर एक सौ वर्ष तक पुष्कर में रहे थे अर्थात् पुष्कर क्षेत्र में ही निवास किया था ।७।
समित्पुष्पकुशादीनि द्रव्याण्यहरहर्भृगोः ।
आनीय काननाद्भूप प्रायच्छदकृतव्रणः ॥८
सततं ध्यानसंयुक्तो रामो मतिमतां वरः ।
आराधयामास विभुं कृष्णं कल्मषनाशनम् ॥९
तस्यैवं यजमानस्य रामस्य जगतीपते ।
गतं वर्षशतं तत्र ध्यानयुक्तस्य नित्यदा ॥१०
एकदा तु महाराज रामः स्नातुं गतो महान् ।
मध्यमं पुष्करं तत्र ददर्शाश्चर्यमुत्तमम् ॥११
मृग एकः समायातो मृग्या युक्तः पलायितः ।
व्याधस्य मृगयां प्राप्तो घर्मतप्तोऽतिपीड़ितः ॥१२