संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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परशुराम का शिवाराधन
वसिष्ठ उवाच-
ब्रह्मणो वचनं श्रुत्वा स प्रणम्य जगद्गुरुम् ।
प्रसन्नचेताः सुभृशं शिवलोकं जगाम ह ॥१
लक्षयोजनमूर्द्ध्वं च ब्रह्मलोकाद्विलक्षणम् ।
अथानिर्वचनीयं च योगिगम्यं परात्परम् ॥२
वैकुण्ठो दक्षिणे यस्माद्गौरीवश्च वामतः ।
यदधो ध्रुवलोकश्च सर्वलोकपरस्तु सः ॥३
तपोवीर्यगती रामः शिवलोकं ददर्श च ।
उपमानेन रहितं नानाकौतुकसंयुतम् ॥४
वसंति यत्र योगींद्राः सिद्धाः पाशुपताः शुभाः ।
कोटिकल्पतपः पुण्याः शांता निर्मत्सरा जनाः ॥५
पारिजातमुखैर्वृक्षैः शोभितं कामधेनुभिः ।
योगेन योगिना सृष्टं स्वेच्छया शंकरेण हि ॥६
शिल्पिनां गुरुणा स्वप्ने न दृष्टं विश्वकर्मणा ।
सरोवरशतैर्दिव्यैः पद्मरागविराजितैः ॥७
श्री वसिष्ठ जी ने कहा—वह राम ब्रह्माजी के इस वचन को सुनकर फिर ब्रह्माजी के चरणों में प्रणाम करके अत्यन्त ही प्रसन्न चित्त वाला होता हुआ वहाँ से शिव के लोक को चला ।१। वह शिवका लोक वहाँ से एक लाख योजन ऊपर की ओर था और वह इस ब्रह्माजी के लोक से भी अधिक विलक्षण था । उसका वर्णन वचनों के द्वारा तो हो ही नहीं सकता है । ऐसा ही यह अनिर्वचनीय था और पर से भी पर था तथा योगी जनों के ही द्वारा गमन करने के योग्य था ।२। जिस शिवलोक से वैकुण्ठ तो दक्षिण दिशा में है और गौरी लोक बाँई ओर है तथा जिनके नीचे की ओर ध्रुव लोक है और वह शिवलोक सभी लोकों से पर है ।३। तपश्चर्या और बल-विक्रम के वीर्य की गति वाले उस राम ने उस शिवलोक का दर्शन कर लिया था । वह अनेक प्रकार के कौतुकों से युक्त था तथा उसकी समानता रखने वाला अन्य कोई भी उपमान ही नहीं था ।४। वह ऐसा लोक था जहाँ