संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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चली आने वाली है। इसका आविर्भाव और तिरोभाव तो बार-बार भग- वान् हरि से ही हुआ करता है ।३२। आपकी जो प्रतिज्ञा है वह भी अव्यर्थ होने वाली ही है और प्राक्तन अथवा आयास से आपके कार्य की सिद्धि होने के योग्य होती है ।३३। अब मेरा मत यही है कि शिवलोक में गमन कीजिए और अपनी की हुई प्रतिज्ञा के विषय में भगवान् शिव की आज्ञा को प्राप्त कीजिए । कारण यह है कि इस भूमण्डल में बहुत से भूप भगवान् शिव के सेवक हैं ।३४। बिना महेश्वर की आज्ञा प्राप्त किये हुए किसकी सामर्थ्य है कि उन सब भूपों का हनन कर सके । ये सब शिव के भक्त राजा लोग अपने अङ्गों में कवच धारण करने वाले हैं तथा दुरासदद को भी ये सब धारण किया करते हैं ।३५।
उपायं कुरु यत्नेन जयबीजं शुभावहम् । उपाये तु समारब्धे सर्वे सिध्यन्त्युपक्रमाः ॥३६ श्रीकृष्णमंत्रं कवचं गृह्य वत्स गुरोर्हरात् । दुर्लङ्घ्यं वैष्णवं तेजः शिवशक्तिर्विजेष्यति ॥३७ त्रैलोक्यविजयं नाव कवचं परमाद्भुतम् । यथाकथं च विज्ञाप्य शंकरं लभ दुर्लभम् ॥३८ प्रसन्नः स गुणैस्तुभ्यं कृपालुर्दीनवत्सलः । दिव्यपाशुपतं चापि दास्यत्येव न संशयः ॥३९
यत्न के साथ उपाय करिए। जप का बीज शुभ का आवाहन करने वाला है। जब उपाय का आरम्भ कर दिया जाता है तो उसके कर देने पर सभी उपक्रम सिद्ध हो जाया करते हैं ।३६। अपने गुरुदेव हर से हे वत्स ! श्रीकृष्ण का मन्त्र और वज्र का ग्रहण करो । उससे दुर्लङ्घ्य वैष्णव तेज और शिव की शक्ति हो जायगी । जोकि विजय करेगी ।३७। भगवान् शिव के पास एक त्रैलोक्य के विजय करने वाला इसी नाम का परम दुर्लभ कवच विद्यमान है । यह कवच अतीव अद्भुत है । जिस किसी भी प्रकार से भग- वान् शङ्कर को प्रसन्न करके उनसे इसके प्राप्त करने की प्रार्थना करो और इस दुर्लभ वस्तु की प्राप्ति उनसे करो ।३८। आपके गुण गणों से वे भगवान् शिव प्रसन्न हैं और वे बहुत ही दयालु तथा दीनों पर प्यार करने वाले हैं। वे तुमको अपना दिव्य पाशुपत अस्त्र भी अवश्य ही प्रदान कर ही देंगे— इसमें कुछ भी संशय नहीं है ।३९।