संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपरशुराम का शिव लोक गमन ] [ २४३
आरम्भ से सम्पूर्ण वृत्तान्त कहकर उनको सुना दिया था जिसमें कार्त्तवीर्य राजा के द्वारा जो कुछ किया गया था और महात्मा अपने पिता जमदग्नि पर जो कुछ दुःख पड़ा था यह सभी हाल था ।२७। इस सम्पूर्ण वृत्तान्त का श्रवण करके हे मानद ! यद्यपि ब्रह्माजी को यह सभी बातें पहिले ही विज्ञात थीं तथापि उन्होंने पूछकर सब कुछ सुना था और परिणाम में सुख आवहन करने वाले धर्मिष्ठ राम से कहा था ।२८।
प्रतिज्ञा दुर्लभा वत्स यां भवान्कृतवान् रुषा ।
सृष्टि रेषा भगवतः संभवेत्कृपया वटो ॥२९
जगत्सृष्टं मया तात संक्लेशेन तदाज्ञया ।
तन्नाशकारिणी चैव प्रतिज्ञा भवता कृता ॥३०
त्रिःसप्तकृत्वो निर्भूपां कर्तुमिच्छसि मेदिनीम् ।
एकस्य राज्ञो दोषेण पितुः परिभवेन च ॥३१
ब्रह्मक्षत्रियविट्शूद्रैः सृष्टिरेषा सनातनी ।
आविर्भूता तिरोभूता हरेरेव पुनः पुनः ॥३२
अव्यर्था त्वत्प्रतिज्ञा तु भवित्री प्राक्तनेन च ।
यद्वायासेन ते कार्यसिद्धिर्भवितुमर्हति ॥३३
शिवलोकं प्रयाहि त्वं शिवस्याज्ञामवाप्नुहि ।
पृथिव्यां बहवो भूपाः संति शंकरकिंकराः ॥३४
विनेवाज्ञां महेशस्य को वा तान्हंतुमीश्वरः ।
विभ्रतः कवचान्यंगे शक्तींश्चापि दुरासदाः ॥३५
हे वत्स ! आपकी यह प्रतिज्ञा बड़ी ही दुर्लभ है जिसको क्रोध के वंशीभूत होकर आपने किया है। हे बटो ! यह सृष्टि तो भगवान् की कृपा से ही होती है ।२९। हे तात ! यह आपको ज्ञात ही है कि उन्हीं परम प्रभु की आज्ञा से बड़े ही क्लेश के द्वारा इस समस्त जगत् का सृजन किया है और आपने इसी सृष्टि के नाश करने वाली प्रतिज्ञा कर डाली हैं ।३०। आप तो केवल एक ही राजा के दोष से तथा अपने पिता के तिरस्कार के होने से इस भूमि को इक्कीस बार भूपों से रहित करना चाहते हैं ।३१। यह सृष्टि तो ब्राह्मण-क्षत्रिय-वैश्य और शूद्र-इन चारों वर्णों से समन्वित सर्वदा से ही