संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२४२ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
सिद्धैर्देवैश्च मुनीन्द्रैश्च वेष्टितं ध्यानतत्परैः ।
विद्याधरीणां नृत्यं च पश्यंतं सस्मितं मुदा ॥२३
तपसां फलदातारं कर्त्तारं जगतां विभुम् ।
परिपूर्णतमं ब्रह्म ध्यायंतं यतमानसम् ॥२४
गुह्ययोगं प्रवोचंतं भक्तवृंदेषु संततम् ।
दृष्ट्वा तमव्ययं भक्त्या प्रणनाम भृगूद्वहः ॥२५
स दृष्ट्वा विनतं राममाशीर्भिरभिनंद्य च ।
पप्रच्छ कुशलं वत्स कथमागमनं कृथाः ॥२६
संपृष्टो विधिना रामः प्रोवाचाखिलमादितः ।
वृत्तांत कार्त्तवीर्यस्य पितुः स्वस्य महात्मनः ॥२७
तच्छ्रुत्वा सकलं ब्रह्मा विज्ञातार्थोऽपि मानद ।
उवाच रामं धर्मिष्ठ परिणामसुखावहम् ॥२८
वहाँ पर उस लोक में अपरिमित ओज से समन्वित विराजमान ब्रह्माजी का उस राम ने दर्शन किया था। जो परम रम्य रत्नों के सिंहासन पर समासी न थे और रत्नों के ही भूषणों के समलंकृत थे ।२२। उन ब्रह्माजी को चारों ओर से बड़े-बड़े सिद्धों और मुनीन्द्रों के ध्यान में समासक्त होकर घेर रखा था तथा था तथा वहाँ पर उनके सामने विद्याधरियों का नृत्य हो रहा था जिस नृत्यको बड़े ही आनन्द के साथ मुस्कराते हुए ब्रह्माजी देख रहे थे ब्रह्माजी उस समय में तपों के फल को प्रदान करने वाले—जगर्तों की रचना करने वाले—व्यापक और परिपूर्ण तप ब्रह्म का ध्यान कर रहे थे तथा उनने शपने मन को नियमन्त्रित कर रक्खा था ।२४। जो वहाँ पर भक्तों के समुदाय विद्यमान थे उनको निरन्तर परम गोपनीय योग को वे बतला रहे थे । इस रीति से विराजमान अव्यय उन ब्रह्माजी का भक्तिभाव से दर्शन प्राप्त करके उस भृगुकुल में समुत्पन्न राम ने उनके चरणों में प्रणिपात किया था ।२५। उन ब्रह्माजी ने विशेष रूप से नत उस राम को देखकर आशीर्वचनों के द्वारा उसका अभिनन्दन किया था । फिर उस राम से ब्रह्माजी ने उसका कुशल पूछा था इसके अनन्तर ब्रह्माजी ने राम से कहा था—हे वत्स ! तुमने किस प्रयोजन से यहाँ पर मेरे समीप में आगमन किया है ।२६। जब ब्रह्माजी ने इस रीति से राम से पूछा था तो उसने