संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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पर केवल महान् योगीन्द्र-सिद्ध और परम शुभ पाशुपत ही निवास किया करते हैं । जो करोड़ों कल्पों तक तपस्या करने के महान् पुनीत पुण्य वाले- परम शान्त शील-स्वभाव वाले और मत्सरता से रहित जन थे वे ही उस लोक के निवास करने वाले थे ।५। वह लोक पारिजात मुख्य वाले वृक्षों से तथा कामधेनुओं से परम सुशोभित था जिन सबका योगिराजाधिराज भग- वान् शङ्कर ने अपने ही योगबल से स्वेच्छा पूर्वक सृजन किया था । समस्त कामनाओं को पूर्ण करने वाली धेनु कामधेनु कही जाती है तथा मनकी इच्छाओं को पूरा करने वाला वृक्ष कल्पवृक्ष होता है उन्हीं का एक भेद परिजात देव वृक्ष है ।६। इस लोक की रचना ऐसी ही परम अद्भुत थी कि विश्व के शिल्पियों के परम गुरु विश्वकर्मा ने कभी स्वप्न में भी नहीं देखी थी फिर उसके भी द्वारा स्वयं ऐसी रचना का करना तो बहुत ही दूर की बात है । उस लोक में परम दिव्य सैकड़ों ही सरोवर थे जिनके घाट और सोढ़ियाँ तथा सम्पूर्ण प्राकार मण्डल पद्मराग नाम वाली मणियों के द्वारा विनिर्मित था । इन सब सरोवरों से वह लोक परमाधिक शोभा से समन्वित था ।७।
शोभितं चातिरम्यं च संयुक्तं मणिवेदिभिः ।
सुवर्णरत्नरचितप्राकारेण समावृतम् ॥८
आयूद्ध र्वमंबरस्पर्शि स्वच्छं क्षीरनिभं परम् ।
चतुर्द्वारसमायुक्तं शोभितं मणिवेदिभिः ॥६
रक्तसोपानयुक्तंश्च रत्नस्तम्भकपाटकैः ।
नानाचित्रविचित्रंश्च शोभितैः सुमनोहरैः ॥१०
तन्मध्ये भवनं रम्यं सिंहद्वारोपशोभितम् ।
ददर्श रामो धर्मात्मा विचित्रमिव संगतः ॥११
तत्र स्थितौ द्वारपालौ ददर्शातिभयंकरौ ।
महाकरालदंतास्यौ विकृतारक्तलोचनौ ॥१२
दग्धशैलप्रतीकाशौ महाबलपराक्रमौ ।
विभूतिभूषितांगौ च व्याघ्रचर्मांवरौ च तौ ॥१३
त्रिशूलपट्टिशधरौ ज्वलंतौ ब्रह्मतेजसा ।
तौ दृष्ट्वा मनसा भीतः किंचिदाह विनीतवत् ॥१४