भारतकोश
संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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परशुराम का शिवाराधन ] [ २४७

वह लोक मणियों के द्वारा निर्मित अनेक वेदियों से बहुत ही अधिक सुरम्य एवं शोभित था। इसके चारों ओर सुवर्ण का प्राकार (परकोटा) बना हुआ था ।८। यह लोक बहुत ही ऊँचा था जो कि अन्तरिक्ष का स्पर्श कर रहा था तथा वह इतना अधिक स्वच्छ एवं शुद्ध था कि क्षीर के ही समान दिखाई दे रहा था । इस लोक में चार परम विशाल द्वार बने हुए थे जिनका निर्माण मणियों की वेदियों से किया गया था ।६। इसमें ऊपर चढ़ने के लिए रत्नों के द्वारा विनिर्मित सोपानों की श्रेणियाँ थीं और इसमें जो स्तम्भ तथा कपाट बने हुए थे वे भी सब रत्नों के थे । इसे लोक में जो भी रचना थी वह अनेक प्रकार की चित्रविचित्र थी तथा परम मनोहर थी जिससे यह लोक परम शोभित हो रहा था ।१०। उस लोक के मध्य में सिद्धों के द्वारा उपशोभित एक सुरम्य भवन बना हुआ था । उस धर्मात्मा राम ने वहाँ पर पहुँचकर उसकी एक विचित्र स्थल के ही समान देखा था ।११। वहाँ पर उस रामने देखा था कि अतीव भयङ्कर दो द्वारपाल स्थित थे । जिनके महान् कराल मुख और दाँत थे तथा बहुत ही विकृत लाल नेत्र थे ।१२। वे द्वारपाल ऐसे ही प्रतीत हो रहे थे मानों वे दग्ध पर्वत होवें । वे महान् बल और विक्रम से समन्वित थे । उनके शरीरों में विभूति लगी हुई थी जिससे उनका अङ्ग विभूषित था और वे व्याघ्र के चर्मों के वस्त्र धारण किये हुए थे ।१३। वे दोनों द्वारपाल त्रिशूल और पट्टिश धारण करने वाले थे तथा ब्रह्मतेज से जाज्वल्यमान हो रहे थे । उन को देखकर राम अपने मन में भय से भीत हो गया था बहुत ही विनीत होकर उन से कुछ बोला था ।१४।

नमस्करोमि वामीशौ शंकरं द्रष्टुमागतः ।
ईश्वराज्ञां समादाय मामथाज्ञप्तुमर्हथ ॥१५
तौ तु तद्वचनं श्रुत्वा गृहीत्वाऽज्ञां शिवस्य च ।
प्रवेष्टुमाज्ञां ददतुरीश्वरानुचरौ च तौ ॥१६
स तदाज्ञामनुप्राप्य विवेशान्तः पुरं मुदा ।
तत्रातिरम्यां सिद्धौघैः समाकीर्णां सभां द्विजः ॥१७
दृष्ट्वा विस्मयमापेदे सुगंधबहुलां विभोः ।
तत्रापश्यच्छिवं शांतं त्रिनेत्रं चन्द्रशेखरम् ॥१८
त्रिशूलशोभितकरं व्याघ्रचर्मवरांबरम् ।