संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२४८ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
विभूतिभूषितांगे च नागयज्ञोपवीतिनम् ।।१६ आत्मारामं पूर्णकामं कोटिसूर्यसमप्रभम् । पंचाननं दशभुजं भक्तानुग्रहविग्रहम् ।।२० योगज्ञाने प्रब्रुवंतं सिद्धेभ्यस्तर्कमुद्रया । स्तूयमानं च योगींद्रैः प्रथमप्रकरैर्मुदा ।।२१
राम ने कहा-ईश आप दोनों की सेवा में मेरा प्रणाम स्वीकृत होवे। मैं इस समय में भगवान् शङ्कर के दर्शन प्राप्त करने के लिए ही यहाँ पर समागत हुआ हूँ। अब भगवान् ईश्वर की आज्ञा प्राप्त करके मुझे दर्शन करने के लिए आदेश प्रदान करने को आप योग्य होते हैं ।१५। उन ईश्वर के दोनों अनुचरों ने राम के वचनों का श्रवण करके और फिर शिव की आज्ञा को प्राप्त करके राम को अन्दर प्रवेश करने के लिये उन्होंने आज्ञा देदी थी ।१६। उस राम ने भी उनकी आज्ञा प्राप्त करके बड़े ही हर्ष के साथ उस अन्तःपुर में प्रवेश किया था । वहाँ पर उसने एक सभा का स्थल देखा था जो इस द्विज ने सिद्धों के समुदायों से समाकीर्ण देखा था और जिसमें अनेक प्रकार की बड़ी ही सुन्दर सुगन्ध भरी हुई थी तथा वह बहुत ही सुरम्य था । इस सभा-स्थल का अवलोकन करके बड़ा ही विस्मय हो गया था । वहाँ पर फिर उस रामने परम शान्त तीन नेत्र के धारण करने और मस्तक में चन्द्र को धारण किये हुए भगवान् शिव का दर्शन किया था ।१७-१८। भगवान् शंकर के कर में त्रिशूल शोभित हो रहा था और वे व्याघ्र के चर्म को वस्त्र के स्थान में पहिने हुए थे । उनके सम्पूर्ण अङ्गों में श्मशान की भस्म लगी हुई थी और उनका शरीर नागों के यज्ञोपवीत से शोभित था ।१९। प्रभु शंकर अपनी ही आत्मा में रमण करने वाले थे—पूर्ण काम थे और उनकी सभी कामनाएं परिपूर्ण थीं और करोड़ों सूर्यों के समान परमोज्ज्वल प्रभा थी । वे पाँच मुखों वाले—दश भुजाओं से शोभित और अपने भक्तों पर परमाधिक अनुग्रह करने वाले थे ।२०। उस समय में शिव सिद्धों के लिए तर्क की मुद्रा के द्वारा योग और ज्ञान का विषय बतला रहे थे। बड़े-बड़े योगीन्द्र और प्रथमगण बड़े ही आनन्द के साथ उनका स्तवन कर रहे थे ।२१।
भैरवैर्योगिनीभिश्च वृतं रुद्रगणैस्तथा । मूर्ध्ना नमाम तं दृष्ट्वा रामः परगया मुदा ।।२२