भारतकोश
संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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परशुराम का शिवाराधन ] [ २४६

वामभागे कार्त्तिकेयं दक्षिणे च गणेश्वरम् । नंदीश्वरं महाकालं वीरभद्रं च तत्पुरः ॥२३ क्रोडे दुर्गां शतभुजां दृष्ट्वा नत्वाथ तामसि । स्तोतुं प्रचक्रमे विद्वान्गिरा गद्गदया विभुम् ॥२४ नमस्ते शिवमेशानं विभुं व्यापकमव्ययम् । भुजंगभूषणं चोग्रं नृकपालस्रगुज्ज्वलम् ॥२५ यो विभुः सर्वलोकानां सृष्टिस्थितिविनाशकृत् । ब्रह्मादिरूपधृग्ज्येष्ठस्तं त्वां वेद कृपार्णवम् ॥२६ वेदा न शक्ता यं स्तोतुमवाङ्मनसगोचरम् । ज्ञानबुद्ध्योरसाध्यं च निराकारं नमाम्यहम् ॥२७ शक्रादयः सुरगणा ऋषयो मनवोऽसुराः । न यं विदुर्यथातत्वं तं नमामि परात्परम् ॥२८

भगवान् शिव को भैरव—योगिनियाँ और रुद्र के गणों ने चारों ओर से घेर रखा था । ऐशी दशा में विराजमान हुए भगवान शिव का दर्शन करके राम ने बड़े ही हर्ष से अपने शिर को उनके चरणों में झुका कर प्रणाम किया था ।२२। उनके वाम भाग में स्वामी कार्त्तिकेय थे और दाहिनी ओर गणनायक गणेश विराजमान थे तथा उनके सामने नन्दीश्वर-महाकाल और वीरभद्र स्थित हो रहे थे ।२३। शिव की गोद में सौ भुजाओं वाली जगज्जननी दुर्गा विद्यमान थी । इनका दर्शन करके राम ने उनको भी प्रणाम किया था । इसके अनन्तर विद्वान् राम ने अपनी गद्गद वाणी से उन विभु की स्तुति करने का उपक्रम किया था ।२४। राम ने कहा था—मैं ईशान-विभु-व्यापक-अव्यय-भुजङ्गों के भूषणों वाले—उग्र और नरों के कपालों की माला के धारण करने से परमोज्ज्वल शिव की सेवा में प्रणाम करता हूँ ।२४-२५। जो विभु समस्त लोकों को सृष्टि स्थिति और विनाश के करने वाले हैं ऐसे ब्रह्मा आदि के स्वरूप को धारण करने वाले—सबसे बड़े उन आप कृपा के सागर को मैं जानता हूँ ।२६। जिन मन और वाणी के आगोचर प्रभु की स्तुति करने में वेद भी समर्थ नहीं हैं उन ज्ञान और बुद्धि के द्वारा साधन के अयोग्य तथा बिना आकार वाले प्रभु शिव के चरणों में मैं नमस्कार करता हूँ ।२७। महेन्द्र आदि देवगण-ऋषिगण-मनु और असुर