संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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ये सब जिनके स्वरूप का यथार्थ रूप से नहीं जाना करते हैं उन पर से भी पर प्रभु शिव के लिए मैं प्रणिपात करता हूँ ॥२८॥
यस्यांशांशेन सृज्यंते लोकाः सर्वे चराचराः ।
लीयंते च पुनर्यस्मिंस्तं नमामि जगन्मयम् ॥२६॥
यस्येषत्कोपसंभूतो हुताशो दहतेऽखिलम् ।
सोर्ध्वंलोकं सपातालं तं नमामि हरं परम् ॥३०॥
पृथ्वीपवन वह्नयम्भोनभोयज्वेंदुभास्कराः ।
मूर्त्तयोऽष्टौ जगत्पूज्यास्तं यज्ञं प्रणमाम्यहम् ॥३१॥
यः कालरूपो जगदादिकर्त्ता पाता पृथग्रूपधरो
जगन्मयः ।
हर्त्ता पुन रुद्रवपुस्तथांते तं कालरूपं शरणं प्रपद्ये ॥३२॥
इत्येवमुक्त्वा स तु भार्गवो मुदा पपात
तस्यांघ्रिसमीप आतुरः ।
उत्थाप्य तं वामकरेण लीलया दधौ तदा मूर्ध्नि
करं कृपार्णवः ॥३३॥
आशीभिरेनं ह्यभिनंद्य सादरं निवेशयामास गणेशपूर्वतः ।
उवाच वामामभिवीक्ष्य चाप्युमां
कृपार्द्रदृष्ट्याऽखिलकामपूरकः ॥३४॥
शिव उवाच--
कस्त्वं वटो कस्य कुले प्रसूतः किं कार्यमुद्दिश्य
भवानिहागतः ।
विनिर्दिशाहं तव भक्तिभावतः प्रीतः प्रदद्यां भवतो
मनोगतम् ॥३५॥
जिन पूज्य देव के अंशों के भी अंशों के द्वारा चर और अचर समस्त लोक सृजित हुआ करते हैं और फिर जिसमें ही ये सब लीन हो जाया करते हैं उन जगन्मय प्रभु को मैं नमस्कार करता हूँ ।२६। जिन प्रभु के बहुत ही अल्प कोप से समुत्पन्न हुआ अग्नि ऊर्ध्वलोक और पाताल के सहित सम्पूर्ण