संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपरशुराम का शिवाराधन ] [ २५१
इस विश्व को दग्ध कर देता है उन हर की सेवा में जो पर हैं मैं प्रणाम हूँ ।३०। जिसकी पृथ्वी-पवन-अग्नि-जल-नभ-यज्वा-चन्द्र और भास्कर में आठ मूर्तियाँ जगत् की पूज्य हैं उन यज्ञ स्वरूप देव को मैं नमस्कार करता हूँ ।३१। जो काल के स्वरूप वाले इस सम्पूर्ण जगत् के आदि करने वाले अर्थात् ब्रह्मा हैं इसका पालन करने वाले हैं और अपना यह जगन्मय रूप धारण किया करते हैं । फिर रुद्र का स्वरूप धारण करके अन्त में इस सबका संहार करने वाले हैं उन काल के रूप वाले भगवान् शंकर की मैं शरणागति में प्राप्त होता हूँ ।३२। वह भार्गव राम इस रीति से इतना ही स्तवन करके बड़े ही आनन्द से उन शिव के चरणों के समीप परमाधिक आतुर होकर गिर पड़ा था । तब कृपा के सागर भगवान् शंकर ने अपने बाँये करकमल से लीला से ही उसको उठाकर उसके मस्तक पर अपनाकर रख दिया था ।३३। अनेक आशीर्वचनों के द्वारा उसका अभिनन्दन करके बड़े ही आदर के साथ अपने प्रिय आत्मज गणेश के आगे उसको बिठा दिया था । फिर अपनी वामा उमा का अभिवीक्षण करके समस्त कामनाओं के पूर्ण करने वाले शिव ने कृपार्द्र दृष्टि से उससे कहा था ।३४। शिव ने कहा—हे वटो ! आप यह बताइए कि आप कौन हैं और किसके वंश में आपने जन्म ग्रहण किया है और आप किस कार्य के कराने का उद्देश्य लेकर यहाँ पर समागत हुए हैं—यह सभी कुछ सूचित कीजिए । मैं आपकी इस प्रकार की भक्ति की भावना से आपके ऊपर परम प्रसन्न हो गया हूँ तथा जो भी कुछ आपके मन का अभीप्सित है उस सबको मैं आपके लिए दे दूँगा ।३५।
इत्येवमुक्तः स भृगुर्महात्मना हरेण विश्वार्त्तिहरेण सादरम् ।
पुनश्च नत्वा विबुधां पतिं गुरुं कृपासमुद्रं समुवाच सत्वरम् ।।३६
परशुराम उवाच ।
भृगोश्चाहं कुले जातो जमदग्निसुतो विभो ।
रामो नाम जगद्वन्द्यं त्वामहं शरणं गतः ।।३७
यत्कार्यार्थमहं नाथ तव सांनिध्यमागतः ।
तं प्रसाधय विश्वेश वांछितं काममेव मे ।।३८