भारतकोश
संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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२५२ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

मृगयामागतस्यापि कार्तवीर्यस्य भूपते । आतिथ्यं कृतवान् देव जमदग्निः पिता मम ॥३६ राजा तं स बलाल्लोभात्पातयामास मन्दधीः । सा धेनुस्तं मृतं दृष्ट्वा गवां लोकं जगाम ह ॥४० राजा न शोचन्मरणं पितुर्मम निरागसः । जगाम स्वपुरं पश्चान्माता मे प्रारुदद्भृशम् ॥४१ तज्ज्ञात्वा लोकवृत्तज्ञो भृगुर्नः प्रपितामहः । आजगाम महादेव ह्यहप्यागतो वनात् ॥४२

जब इस रीति से वह भृगुकुलोद्भूत राम सम्पूर्ण विश्व की आर्त्ति के हरण करने वाले महात्मा शम्भु के द्वारा बड़े ही आदर के साथ कहा गया था तब तो उन देवों के स्वामी और कृपा के सागर गुरु की सेवा में उस राम ने फिर एक बार प्रणाम करके बहुत ही शीघ्र निवेदन किया था ।३६। परशुराम ने कहा—हे भगवन् ! मैं भृगु मुनि के कुल में समुत्पन्न हुआ हूँ और हे विभो ! जमदग्नि ऋषि का पुत्र हूँ । मेरा नाम छोटा सा राम—यह है । आप तो समस्त जगत् की वन्दना करने के योग्य हैं। मैं ऐसे समय में आपकी शरणागति में प्रपन्न हुआ हूँ ।३७। हे नाथ ! जिस कार्य के लिए मैं आपकी सन्निधि में समागत हुआ हूँ । हे विश्वेश्वर ! उसको आप कृपा कर प्रसाधित कीजिए और मेरी कामना है कि अब आप मेरा वांछित जो भी है उसे मुझे प्रदान कीजिए ।३८। मेरे पिता जमदग्नि ने हे देव ! मृगया के लिए वन में आये हुए राजा कार्तवीर्य का बहुत अच्छी तरह से आतिथ्य-सत्कार किया था ।३९। उस महानन्द मति वाले राजा ने लोभ के वशीभूत होकर बलपूर्वक मेरे पिता को मार डाला था। जो एक धेनु थी जिसके ग्रहण करने का लालच राजा के मन में हो गया था वह होमधेनु भी मेरे पिता को मरा हुआ देखकर गो-लोक में चली गयी थी ।४०। राजा ने निरपराध मेरे पिता की मृत्यु के विषय में कुछ भी चिन्ता नहीं की थी और फिर वह अपने नगर में चला गया था। इसके पीछे मेरी माता रेणुका अत्यन्त रुदन कर रही थी ।४१। इस घटना का ज्ञान प्राप्त करके लोक के वृत्त के ज्ञाता हमारे पितामह भृगुमुनि हे महादेव ! वहाँ पर आ गये थे । मैं समिधा लेने के लिए उस समय में वन में गया हुआ था सो मैं भी इसी बीच में वहाँ पर समागत हो गया था ।४२।