संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंमृगमृगी कथा ] [ २५७
राजा सगर ने कहा---हे ब्रह्माजी के पुत्र ! आप तो महान् भाग वाले हैं। मेरे ऊपर आपने बड़ा भारी अनुग्रह किया है कि यह कवच जो कि अनामय है, मेरे सामने आपने प्रकाशित कर दिया है ।१। कृतास्त्र में और्व के द्वारा अनुगृहीत हुआ हूँ । हे विभो ! इस समय में तो मैं आपकी कृपा का पात्र बन गया हूँ ।२। हे गुरुदेव ! भार्गवेन्द्र परशुराम ने राजा कार्त्तवीर्य को जो बड़ा ही वीर था जिस प्रकार से समाप्त किया था वह सब विस्तार के साथ मेरे सामने वर्णन करके सुनाइए ।३। वह राजा तो दत्तात्रेय मुनि की कृपा का पात्र था और राम भगवान शिव की अनुकम्पा का भाजन था । हे गुरुवर ! ये दोनों ही महान् वीर थे । समर क्षेत्र में किस प्रकार से इन्होंने युद्ध किया था ।४। वसिष्ठ जी ने कहा---हे राजन् ! अब आप श्रवण कीजिए मैं इस चरित को बतलाऊँगा क्योंकि यह चरित तो पापों का विनाश कर देने वाला है । यह चरित महान् बलशाली राजा कार्त्तवीर्य का तथा महान् आत्मा वाले परशुराम के महायुद्ध का है ।५। उन परशुराम ने गुरुदेव के मुख से इस कवच और मन्त्र की दीक्षा ग्रहण की थी फिर उन परशुराम ने बड़ी भारी भक्ति से युक्त होकर इनको सिद्ध किया था ।६। भूमि पर इन्होंने शयन किया था---तीनों कालों में सन्ध्योपासना की थी और यह स्नान तथा सन्ध्या में परायण हो गये थे । इस प्रकार में यह सब साधना करते हुए राम बहुत ही समाहित होकर एक सौ वर्ष तक पुष्कर में रहे थे अर्थात् पुष्कर क्षेत्र में ही निवास किया था ।७।
समित्पुष्पकुशादीनि द्रव्याण्यहरहर्भृगोः ।
आनीय काननाद्भूप प्रायच्छदकृतव्रणः ॥८
सततं ध्यानसंयुक्तो रामो मतिमतां वरः ।
आराधयामास विभुं कृष्णं कल्मषनाशनम् ॥९
तस्यैवं यजमानस्य रामस्य जगतीपते ।
गतं वर्षशतं तत्र ध्यानयुक्तस्य नित्यदा ॥१०
एकदा तु महाराज रामः स्नातुं गतो महान् ।
मध्यमं पुष्करं तत्र ददर्शाश्चर्यमुत्तमम् ॥११
मृग एकः समायातो मृग्या युक्तः पलायितः ।
व्याधस्य मृगयां प्राप्तो घर्मतप्तोऽतिपीड़ितः ॥१२