भारतकोश
संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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[ २५६ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

दे दिया था ।५८। इस तरह सम्पूर्ण शस्त्रों और अस्त्रों के समूह को पाकर राम बहुत ही प्रसन्न हुआ था । फिर उस परशुराम ने परम शान्त शिव को—दुर्गा देवी को—स्वामी कार्त्तिकेय को और गणेश्वर की सेवा में प्रणिपात करके तथा इन सबकी परिक्रमा करके फिर वह राम परमोत्तम तीर्थ पुष्कर को वहाँ से चला गया था और वहाँ पर संस्थिति करते हुए भगवान् शिव के द्वारा बताये हुए उत्तम मन्त्र को और कवच को सिद्ध किया था ।५९-६०। फिर भृगु नन्दन ने बड़े ही आनन्द से सम्पूर्ण कुल और सेना के सहित राजा कार्तवीर्य का निहनन करके अपना पूर्ण कार्य साधित किया था । फिर वह राम अपने पिता के घर को विनिवृत्त होकर चला गया था ।६१।

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॥ मृगमृगी कथा ॥

सगर उवाच- ब्रह्मपुत्र महाभाग महान्मेऽनुग्रहः कृतः । यदिदं कवचं मह्यं प्रकाशितमनामयम् ॥१

और्वेणानुगृहीतोऽहं कृतास्त्रो यदनुग्रहात् । भवतस्तु कृपापात्रं जातोऽहमधुना विभो ॥२

रामेण भार्गवेन्द्रेण कार्त्तवीर्यो नृपो गुरो । यथा समापितो वीरस्तन्मे विस्तरतो वद ॥३

कृपापात्रं स दत्तस्य राजा रामः शिवस्य च । उभौ तौ समरे वीरौ जघटाते कथं गुरो ॥४

वसिष्ठ उवाच- शृणु राजन्प्रवक्ष्यामि चरितं पापनाशनम् । कार्त्तवीर्यस्य भूपस्य रामस्य च महात्मनः ॥५

स रामः कवचं लब्ध्वा मंत्रं चैव गुरोर्मुखात् । चकार साधनं तस्य भक्त्या परमया युतः ॥६

भूमिशायी त्रिश्ववणं स्नानसंध्यापरायणः । उवास पुष्करे राम शतवर्षमतंद्रितः ॥७