भारतकोश
संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished893 पृष्ठ

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पृष्ठ 254

२५८ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

पिपासितो महाभाग जलपानसमुत्सुकः । रामस्य पश्यतस्तत्र सरसस्तटमागतः ॥१३ पश्चान्मृगी समायाता भीता सा चकितेक्षणा । उभौ तौ पिवतस्तत्र जलं शंकितमानसौ ॥१४

हे भूप ! अकृतव्रण प्रतिदिन उस भृगुवंशज परशुराम के लिए वन से समिधा पुष्प और कुशा आदि द्रव्यों को लाकर दिया करता था ।८। मति-मानों में परम श्रेष्ठ परशुराम निरन्तर ध्यान में संलग्न होकर समस्त कल्मषों के विनाश करने वाले विभु श्रीकृष्ण की आराधना किया करता था ।९। हे जगतीपते ! इस रीति से यजन करते हुए और वहाँ पर नित्य ही ध्यान में सं सक्त रहने वाले परशुराम को एक सौ वर्ष व्यतीत हो गये थे ।१०। हे महाराज ! एक बार वह महान राम स्नान करने के लिए मध्यम पुष्कर में गया था और वहाँ पर उसने उत्तम आश्चर्य का अवलोकन किया था ।११। एक मृग मृगी के साथ दौड़ा हुआ वहाँ पर आया था जो एक व्याध की मृगया को प्राप्त हो रहा था तथा घाम से सन्तप्त होकर अत्यन्त पीड़ित था ।१२। हे महाभाग ! बहुत ही प्यासा था और जलपान करने के लिए बड़ा ही उत्सुक हो रहा था परशुराम उसको देख रहे थे कि वहाँ पर उस सरोवर के तट पर समागत हो गया था ।१३। इसके पीछे-पीछे मृगी भी वहाँ पर आ गयी थी जो बहुत ही डरी हुई थी और उसके नेत्र चकित हो रहे थे । वे दोनों ही बहुत शङ्कित मन वाले होते हुए वहाँ पर जलपान कर रहे हैं ।१४।

तावत्समागतो व्याधो बाणपाणिर्धनुर्द्धरः । स दृष्ट्वा तत्र संविष्टं रामं भार्गवनन्दनम् ॥१५ अकृतव्रणसंयुक्तं तस्थौ दूरकृतेक्षणः । स चिन्तयामास तदा शंकितो भृगुनन्दनात् ॥१६ अयं रामो महावीरो दुष्टानामंतकारकः । कथमेतस्य हन्म्येतौ पश्यतो मृगयाम्‌मृगौ ॥१७ इति चिन्तासमाविष्टो व्याधो राजन्यसत्तम । तस्थौ तत्रैव रामस्य भयात्संत्रस्तमानसः ॥१८

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