भारतकोश
संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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मृगमृगी कथा ] [ २५६

रामस्तु तौ मृगौ दृष्ट्वा पिबंतौ सभयं जलम् ।
तर्कयामास मेधावी किमत्र भयकारणम् ॥१९॥
नैवात्र व्याघ्रसंनादो न च व्याधो हि दृश्यते ।
केनैतो कारणेनाहो शंकितौ चकितेक्षणौ ॥२०॥
अथ वा मृगजातिर्हि निसर्गाच्चकितेक्षणा ।
येनैतौ जलपानेऽपि पश्यतश्चकितेक्षणौ ॥२१॥

उसी समय में धनुष धारण किये हुए हाथ में बाण ग्रहण कर वहाँ पर व्याध भी आ गया था । उस व्याध ने वहाँ पर विराजमान परशुराम को देखा था ।१५। उस राम ही समीप में अकृत व्रण भी बैठा हुआ था । वह व्याध दूर तक अपनी दृष्टि डाले हुए वहीं पर ठहर गया था और उस व्याध का मन भृगुनन्दन राम से उस समय में शंकित हो गया था और विचार किया था ।१६। यह परशुराम तो महान वीर हैं और दुष्टों का विनाश कर देने वाला है । अब मैं इसके देखते हुए इन दोनों शिकार वाले मृगी और मृग का हनन करूं ।१७। हे राजन्यों मैं परम श्रेष्ठ ! वह व्याध इस प्रकार से चिन्ता में डूबा हुआ परशुराम के भय से संत्रस्त मन वाला होकर वहीं पर स्थित हो गया था ।१८। परशुराम ने उन दोनों मृगों को देखा था कि बड़े ही भय के साथ वहाँ पर जल पी रहे थे । उस मेधावी राम ने मन में विचार किया था कि यहाँ पर इनके लिए भय होने का क्या कारण है ।१९। यहाँ पर किसी व्याघ्र की गर्जना की ध्वनि भी नहीं है और न यहाँ पर कोई व्याध ही दिखाई दे रहा है फिर किस कारण से ये दोनों मृग शंकित नेत्रों वाले तथा चकित दृष्टि से युक्त हो रहे हैं—यह बड़े आश्चर्य की बात है ।२०। अथवा यही कारण हो सकता है कि इन मृगों की जाति ही स्वाभाविक रूप से चकित नेत्रों वाली हुआ करती है । इस कारण से ही ये दोनों जलपान करने में भी चकित नेत्रों वाले होते हुए देख रहे हैं ।२१।

नैतावत्कारणं चात्र किं तु खेद्भयातुरी ।
लक्ष्येते खिन्नसर्वांगौ कम्पयुक्तौ यतस्त्विमौ ॥२२
एवं संचित्य मतिमांस्तस्थौ मध्यपुष्करे ।
शिष्येण संयुतो रामो यावत्तौ चापि संस्थितौ ॥२३