संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२६० ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
पीत्वा जलं ततस्तौ तु वृक्षच्छायासमाश्रितौ ।
रामं दृष्ट्वा महात्मानं कथां तौ चक्रतुर्मुदा ॥२४
मृग्युवाच-कांत चात्रैव तिष्ठावो यावद्रामोऽत्र संस्थितः ।
अस्य वीरस्य सांनिध्ये भयं नैवावयोर्भवेत् ॥२५
अत्राप्यागत्य चेद्व्याधो ह्यावयोः प्रहरिष्यति ।
दृष्टमात्रो हि मुनिना भस्मीभूतो भविष्यति ॥२६
इत्युक्तं वचने मृग्या रामदर्शनतुष्टया ।
मृगश्चोवाच हर्षेण समाविष्टः प्रियां स्वकाम् ॥२७
एवमेव महाभागे यद्वै वदसि भामिनि ।
जानेऽहमपि रामस्य प्रभावं सुमहात्मनः ॥२८
यहाँ पर इतना ही कारण नहीं है किन्तु ये दोनों तो बड़े खेद और भय से आतुर हो रहे हैं—ऐसे ही दिखलाई दे रहे हैं। क्योंकि इनके सभी अङ्ग खिन्नता से संयुत हैं और ये दोनों ही कम्प से प्रकम्पित हो रहे हैं ।२२। इस तरह से चिन्तन करके मतिमान् वह परशुराम मध्य पुष्कर में संस्थित हो गया था और उसके साथ में शिष्य भी था। वह राम जब तक वहाँ खड़ा रहा था तब तक वे दोनों मृग भी वहाँ पर संस्थित रहे थे ।२३। जल-पान करके वे दोनों मृग एक वृक्ष की छाया का आश्रय ग्रहण करके बैठ गये थे। उस महान् आत्मा वाले परशुराम का दर्शन करके उन दोनों ने बड़े ही आनन्द के साथ आपस में बातचीत की थी ।२४। मृगी ने मृग से कहा—हे कान्त ! हम दोनों यहाँ पर स्थित रहेंगे जब तक यह परशुराम यहाँ पर संस्थित रहते हैं। इस वीर के समीप में हम दोनों को कोई भय नहीं होगा ।२५। यदि यहाँ पर भी व्याध आकर हम दोनों पर प्रहार करेगा तो इस मुनि के द्वारा केवल देखने ही से वह भस्मीभूत हो जायगा ।२६। परशुराम के दर्शन करने से परम सन्तुष्ट मृगी के द्वारा इस प्रकार से यह वचन कहने पर वह मृग भी बड़े ही हर्ष से समाविष्ट होकर अपनी प्रिया से बोला था ।२७। हे महाभागे ! यह बात तो इसी प्रकार की है। हे भामिनि ! आप यह बात निश्चित ही कह रही है। मैं भी परम महान् आत्मा वाले राम के प्रभाव को अच्छी तरह से जानता हूँ ।२८।