भारतकोश
संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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२६२ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

प्रदान कर दिया था तथा अपना पाशुपत अस्त्र और अन्यान्य बहुत से अस्त्रों का समुदाय इसको प्रदान किये थे ।३४। बड़े आदर के साथ प्रीति से इन सब शस्त्रास्त्रों को प्रदान करके भगवान् शिव ने वहाँ से विदा किया था। हे भद्रे ! वही राम इस समय में मन्त्रों की साधना में तत्पर होता हुआ यहाँ पर समागत हुआ है ।३५।

नित्यं जपति धर्मात्मा कृष्णस्य कवचं सुधीः ।
शतवर्षाणि चाप्यस्य गतानि सुमहात्मनः ॥३६॥
मंत्रं साधयतो भद्रे न च तत्सिद्धिरेति हि ।
अत्रास्ति कारणं भक्तिः सा च वै त्रिविधा मता ॥३७॥
उत्तमा मध्यमा चैव कनिष्ठा तरलेक्षणे ।
शिवस्य नारदस्यापि शुकस्य च महात्मनः ॥३८॥
अम्बरीषस्य राजर्षे रंतिदेवस्य मारुतेः ।
बलेर्विभीषणास्यापि प्रह्लादस्य महात्मनः ॥३९॥
उत्तमा भक्तिरेवास्ति गोपीनामुद्धवस्य च ।
वसिष्ठादिमुनीशानां मन्वादीनां शुभेक्षणे ॥४०॥
मध्या च भक्तिरेवास्ति प्राकृतान्यजनेषु सा ।
मध्यभक्तिरयं रामो नित्यं यमपरायणः ॥४१॥
सेवते गोपिकाधीशं तेन सिद्धि न चागतः ।

वरिष्ठ उवाच-
इत्युक्ता त्वरितं कांतं सां मृगी हृष्टमानसा ॥४२॥
पुनः पप्रच्छ भक्तेस्तु लक्षणं प्रेमदायकम् ।

मृग्युवाच-
साधु कांत महाभाग वचस्तेऽलौकिकं प्रिय ।
ईदृग् ज्ञानं तव कथं संजातं तद्वदाधुना ॥४३॥

सुधी यह धर्मात्मा परशुराम नित्य ही भगवान् श्रीकृष्ण के कवच का यहाँ पर जप कर रहा है। इस महात्मा को जाप करते हुए एक सौ वर्ष तो व्यतीत हो गये हैं ।३६। हे भद्रे ! यह मन्त्र की साधना तो कर रहा है किन्तु