भारतकोश
संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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मृगमृगी कथा ] [ २६३

इसको उसकी सिद्धि नहीं हो रही है। इस साधना में मुख्य कारण भक्ति ही होता है। वह भक्ति तीन प्रकार की होती है, ऐसा माना गया है।३७। हे चञ्चल नेत्रों वाली प्रिये ! उस भक्ति के उत्तम-मध्यम और कनिष्ठ—ये तीन भेद हुआ करते हैं। अब यह बतलाता हूँ कि उत्तमा भक्ति किन-किन महापुरुषों में विद्यमान है—भगवान् शिव-देवर्षि नारद-महात्मा शुकदेव- राजर्षि अम्बरीष-राजा रन्तिदेव-पवनसुत हनुमान्-राजा बलि-दानव विभी- षण और महात्मा प्रह्लाद-इन में परमोत्तमा भक्ति होती है ।३८-३९। ब्रज की गोपियों में और उद्धव में भी उत्तम प्रकार की ही भक्ति विद्यमान है। हे शुभेक्षणे ! जो वसिष्ठ मुनिश हैं तथा मनु आदि हैं उनमें भी मध्यम श्रेणी की ही भक्ति होती है। इसके अतिरिक्त अन्य सभी जनों में कनिष्ठ श्रेणी की प्राकृत भक्ति हुआ करती है। यह जो परशुराम है इसमें मध्य श्रेणी वाली ही भक्ति है जो कि नित्य ही यम-नियमों में परायण हो रहा है ।४०- ४१। यह राम गोपिकाओं के अधीश्वर भगवान् का सेवन तो कर रहा है किन्तु यह सिद्धि को अभी तक प्राप्त नहीं हुआ है। महामुनीन्द्र वसिष्ठ जी ने कहा—जब उस मृग के द्वारा अपनी प्रिया मृगी से कहा गया था तो उस मृगी ने परम प्रसन्न मन वाली होकर शीघ्र ही अपने स्वामी से प्रश्न किया था ।४२। उस मृगी ने फिर उस भक्ति का प्रेम प्रदान करने वाला लक्षण अपने स्वामी से पूछा था। मृगी ने कहा—हे कान्त ! आप तो महान् भाग वाले हैं। हे प्रिय ! आपके ये वचन तो बहुत ही अच्छे और अलौकिक हैं। अब आप कृपा करके मुझे यह बतलाइए कि इस प्रकार का विशद ज्ञान आपके हृदय में कैसे समुद्भूत हो गया है ।४३।

मृग उवाच— शृणु प्रिये महाभागे ज्ञानं पुण्येन जायते ॥४४ तत्पुण्यमद्य संजातं भार्गवस्यास्य दर्शनात् । पुण्यात्मा भार्गवश्चायं कृष्णभक्तो जितेंद्रियः ॥४५ गुरुशुश्रूषको नित्यं नित्यनैमित्तिकादरः । अतोऽस्य दर्शनाज्जातं ज्ञानं मेऽद्यैव भामिनि ॥४६ त्रैलोक्यस्थितसत्त्वानां शुभाशुभनिदर्शकम् । अद्यैव विदितं मेऽभूद्रामस्यास्य महात्मनः ॥४७