भारतकोश
संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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२६४ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

चरितं पुण्यदं चैव पापघ्नं शृण्वतामिदम् ।
यद्यत्करिष्यते चैव तदपि ज्ञानगोचरम् ॥४८
योत्तमा भक्तिराख्याता तां विना नैव सिद्ध्यति ।
कवचं मंत्रसहितं ह्यपि वर्षायुतायुतैः ॥४९॥

अपनी परम प्रिया के द्वारा इस रीति से पूछे जाने पर उस मृग ने कहा था—हे महान् भाग वाली प्रिये ! अब आप श्रवण कीजिए कि यह ज्ञान जो होता है वह परम उत्कृष्ट पुण्य से ही हुआ करता है ।४४। वह उस प्रकार का पुण्य आज इन्हीं महापुरुष भार्गव परशुराम के दर्शन प्राप्त करने ही से समुत्पन्न हो गया है । यह भार्गव महान् पुण्यात्मा हैं और यह भगवान् श्रीकृष्ण के परम भक्त तथा अपनी इन्द्रियों को जीत लेने वाले हैं ।४५। हे भामिनि ! यह राम अपने गुरु की शुश्रूषा करने वाले हैं और प्रतिदिन नित्य कर्मों तथा नैमित्तिक कर्मों में बड़ा आदर करने वाले हैं । इसलिए आज ही इस महापुरुष के दर्शन से मेरे हृदय में यह अद्भुत ज्ञान समुत्पन्न हो गया है ।४६। यह मेरा ज्ञान ऐसा है जो इस त्रिभुवन में संस्थित जीव हैं उन सबके शुभ और अशुभ कर्मों को बता देने वाला है और आज ही मुझे महात्मा इस परशुराम का भी पूर्ण चरित विदित हो गया है ।४७। इसका चरित बहुत ही पुण्य का देने वाला है और समस्त पापों का विनाशक है । अब तुम इसका श्रवण करो । यह राम भविष्य में जो-जो भी कर्म करेंगे वह भी सब मेरे ज्ञान का गोचर हो रहा है अर्थात् मुझे सब ज्ञात हो गया है ।४८। मैंने जो आपके सामने उत्तम प्रकार की भक्ति का वर्णन किया था उस तरह भी भक्ति के बिना इस परशुराम को यह मन्त्र और कवच दश सहस्र वर्षों में भी कभी सिद्ध नहीं होगा ।४९।

यद्ययं भार्गवो भद्रे ह्यगस्त्यानुग्रहं लभेत् ।
कृष्णप्रेमामृतं नाम स्तोत्रमुत्तमभक्तिदम् ॥५०
ज्ञात्वा च लप्स्यते सिद्धिं मंत्रस्य कवचस्य च ।
स मुनिर्ज्ञाततत्त्वार्थः सानुकंपोऽभयप्रदः ॥५१
उपदेक्ष्यति चैवैनं तत्त्वज्ञानं मुदावहम् ।
श्रीकृष्णचरितं सर्वं नामभिर्ग्रथितं यतः ॥५२
कृष्णप्रेमामृतस्तोत्राज्ज्ञास्यतेऽस्य महामतिः ।