संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपरशुराम का अगस्त्याश्रम में आगमन ] [ २६५
ततः संसिद्धकवचो राजानं हैहयाधिपम् ॥ ५३ हत्वा सपुत्रामात्यं च ससुहृद्वलवाहनम् । त्रिःसप्तकृत्वो निर्भूपां करिष्यत्यवनीं प्रिये ॥ ५४ वसिष्ठ उवाच– एवमुक्त्वा मृगो राजन्विरराम मृगीं ततः । आत्मनो मृगभावस्य कारणं ज्ञातवांश्च ह ॥ ५५
यदि यह भार्गव परशुराम हे भद्रे ! अगस्त्य मुनि की कृपा को प्राप्त कर लेवे तो इसको सिद्धि हो सकती है । अगस्त्य मुनि उत्तम भक्ति के देने वाले कृष्ण प्रेमामृत नाम का स्तोत्र जानते हैं । ५०। उन महामुनि की कृपा से यदि उस स्तोत्र का ज्ञान प्राप्त कर लेवे तो उसको जानकर यह मन्त्र की और कवच की सिद्धि को प्राप्त कर लेगा । वह अगस्त्य मुनि तो तत्त्वों के अर्थ को जाने हुए हैं और वे बहुत ही दयालु तथा अभय के प्रदान करने वाले हैं । ५१। वे मुनि उस आनन्द-प्रद तत्त्व ज्ञान का इस राम के लिये उपदेश कर देंगे क्योंकि भगवान् श्रीकृष्ण का सम्पूर्ण चरित उनके सुनामों से ही ग्रथित है । ५२। श्रीकृष्ण मृत स्तोत्र से इस राम की महामति ज्ञान प्राप्त कर लेगी । फिर इसको इस कवच की संसिद्धि हो जायगी और कवच की सिद्धि वाला यह राम हैहयों के अधिप राजा का हनन पुत्र-पौत्र, मन्त्रीगण, मित्र-वर्ग-सेना और समस्त वाहनों के सहित करके हे प्रिये ! फिर वह परशुराम इस मोदिनी को निश्चित रूप से इक्कीस बार क्षत्रिय राजाओं से रहित कर देगा—इसमें कुछ भी संशय नहीं है । श्री वसिष्ठजी ने कहा—इतना यह सब अपनी प्रिया मृगी से कहकर हे राजन् ! फिर वह मृग शान्त हो गया था और उसने मृग होने के भाग के कारण को भी उस समय में जान लिया था । ५३-५४-५५।
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॥ परशुराम का अगस्त्याश्रम में आगमन ॥
सगर उवाच–
मुने परमतत्त्वज्ञ ध्यानज्ञानार्थकोविद । भगवद्भक्तिसंलीनमानसानुग्रहः कृतः ॥ १ त्वयापि हि महाभाग यतः शंससि सत्कथाः ।