भारतकोश
संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished893 पृष्ठ

पृष्ठ 262, कुल 893 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 262

२६६ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

श्रुत्वा मृगमुखात्सर्वं भार्गवस्य विचेष्टितम् ॥२
भूतं भवद्भविष्यं च नारायणकथान्वितम्।
पुनः पप्रच्छ किं नाथ तन्मे वद सविस्तरम् ॥३
वसिष्ठ उवाच-
शृणु राजन्प्रवक्ष्यामि मृगस्य चरितं महत्।
यथा पृष्टं तया सोऽस्यै वर्णयामास तत्त्ववित् ॥४
श्रुत्वा तु चरितं तस्य भार्गवस्य महात्मनः।
भूयः पप्रच्छ तं कांतं ज्ञानतत्त्वार्थमादरात् ॥५
मृग्युवाच-
साधु साधु महाभाग कृतार्थस्त्वं न संशयः।
यदस्य दर्शनात्तेऽद्य जातं ज्ञानमतीन्द्रियम् ॥६
अथातश्चात्मनः सर्वं ममापि वद कारणम्।
कर्मणा येन संप्राप्तावावां तिर्यग्जनिं प्रभो ॥७

राजा सगर ने कहा- हे मुनिवर ! आप तो परम तत्त्वों के ज्ञाता हैं और आप तत्त्वों के ध्यान तथा ज्ञान के अर्थों के महान् मनीषी हैं। आप तो भगवान् की भक्ति से संलीन मन वाले हैं और उसी मन से आपने अनुग्रह किया है। हे महाभाग ! आप तो बहुत ही अच्छी कथाओं का कथन कर रहे हैं। उस मृगी ने अपने स्वामी मृग के मुख से भार्गव परशुराम का सम्पूर्ण विचेष्टित श्रवण करके तथा भूत-वर्त्तमान और भविष्य में होने वाले रामायण की कथा से समन्वित वृत्त का श्रवण करके हे नाथ ! उसने पुनः क्या पूछा था—यह पूर्ण विस्तार के सहित हमारे सामने वर्णन करने की कृपा कीजिए ।१-३। वसिष्ठजी ने कहा—हे राजन् ! मैं आपके आगे उस मृग का जो महान चरित्र है उसे भली भाँति बतलाऊँगा। आप उसका श्रवण कीजिए। जिस प्रकार से जो भी उस मृगी ने उस मृग से पूछा था उस सबको तत्त्वों के ज्ञाता उसने उस मृगी के समक्ष में वर्णन कर दिया था ।४। उस महान आत्मा वाले भार्गव का चरित्र श्रवण करके उस मृगी ने फिर बड़े ही आदर से अपने स्वामी से ज्ञान के तत्व का अर्थ पूछा था ।५। मृगी ने कहा—हे महाभाग ! बहुत ही अच्छा और परम सुन्दर है। आप तो

संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २) · पृष्ठ 262, कुल 893 में से · BharatKosha