संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपरशुराम का अगस्त्याश्रम में आगमन ] [ २६७
कृतार्थ हैं—इसमें लेशमात्र भी संशय नहीं है कि आज इन परशुराम के दर्शन करने से आपको ऐसा ज्ञान उत्पन्न हो गया है जो इन्द्रियों की पहुँच से भी दूर है ।६। इसीलिए इसके पश्चात् अपनी आत्मा का सम्पूर्ण कारण मुझे भी कृपा करके बतलाइए । हे प्रभो ! ऐसा वह क्या कर्म हमने किया था जिसके कारण से हम दोनों ने यह पशु की तिर्यग् योनि प्राप्त की है ।७।
इति वाक्यं समाकर्ण्य प्रियायाः स मृगः स्वयम् ।
वर्णयामास चरितं मृग्याश्चैवात्मनस्तदा ॥८
मृग उवाच—
शृणु प्रिये महाभागे यथाऽऽवां मृगतां गतौ ।
संसारेऽस्मिन्महाभागे भावोऽय भवकारणम् ॥९
जीवस्य सदसद्भ्यां हि कर्मभ्यामागतः स्मृतिम् ।
पुरा द्रविडदेशे तु नानाऋद्धिसमाकुले ॥१०
ब्राह्मणानां कुले वाऽहं जातः कौशिकगोत्रिणाम् ।
पिता मे शिवदत्तोऽभून्नाम्ना शास्त्रविशारदः ॥११
तस्य पुत्रा वयं जाताश्चत्वारो द्विजसत्तमाः ।
ज्येष्ठो रामोऽनुजस्तस्य धर्मस्तस्यानुजः पृथुः ॥१२
चतुर्थोऽहं प्रिये जातो सूरिरित्यभिविश्रुतः ।
उपनीय क्रमात्सर्वाञ्छिवदत्तो महायशाः ॥१३
वेदान ध्यापयामास सांगांश्च सरहस्यकान् ।
चत्वारोऽपि वयं तत्र वेदाध्ययनतत्पराः ॥१४
उस मृग ने इस अपनी प्रिया के वाक्य का श्रवण करके स्वयं ही उस समय में अपना और अपनी प्रिया मृगी का चरित वर्णन किया था ।८। मृग ने कहा—हे महाभाग वाली प्रिये ! अब आप सुनिए कि जिस प्रकार से हम तुम दोनों उस मृग की जाति में देह धारण करने वाले हुए हैं । हे महाभागे ! इस संसार में इस भव अर्थात् जन्म के ग्रहण करने का कारण एक मात्र भाव ही हुआ करता है। तात्पर्य यह है कि जैसी भावना जिसकी होगी वह वैसा ही उसके अनुरूप जन्म धारण किया करता है ।९। जो भी जीव के सद् और असत् कर्म होते हैं उनसे ही यह स्मृति को प्राप्त होता है ।