भारतकोश
संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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२६८ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

बहुत पहिले अनेक प्रकार की ऋद्धियों से पूर्ण द्रविड़ देश में कौशिक गोत्र वाले ब्राह्मणों के कुल में मैंने जन्म ग्रहण किया था । मेरे पिता नाम से शिवदत्त हुए थे जो कि शास्त्रों के अच्छे विद्वान् थे ।१०-११। उन शिवदत्त नामधारी विप्र के परम श्रेष्ठ द्विज हम चार पुत्र समुत्पन्न हुए थे । सबमें बड़ा राम था, उससे छोटा भाई धर्म था और उससे भी छोटा भाई पृथु नाम वाला हुआ था ।१२। हे प्रिये ! चौथा भाई मैं उत्पन्न हुआ था जो सूरि—इस नाम से प्रसिद्ध था । महा यशस्वी उस शिवदत्त ने क्रम से सबका उपनयन संस्कार करा दिया था ।१३। और फिर उसने हम सबको रहस्य के सहित तथा समस्त वेद के अङ्ग शास्त्रों के साथ वेदों का अध्यापन किया था अर्थात् साङ्ग सम्पूर्ण वेदों को पढ़ाया था ।१४।

गुरुशुश्रूषणे युक्ता जाता ज्ञानपरायणाः ।
गत्वाऽरण्यं फलान्यंबुसमित्कुशमृदोऽन्वहम् ॥१५॥
आनीय पित्रे दत्त्वाथ कुर्मोऽध्ययनमेव हि ।
एकदा तु वयं सर्वे संप्राप्ता पर्वते वने ॥१६॥
औद्भिदं नाम लोलाक्षि कृतमालातटे स्थितम् ।
सर्वे स्नात्वा महानद्यामुषसि प्रीतमानसाः ॥१७॥
दत्तार्घाः कृतजप्याश्च समारूढा नगोत्तमम् ।
शालैस्तमालैः प्रियकैः पनसैः कोविदारकैः ॥१८॥
सरलार्जुनपूगैश्च खर्जूरैर्नालिकेलकैः ।
जंबूभिः सहकारैश्च कटुफलैर्बृहतीद्रुमैः ॥१९॥
अन्यैर्नानाविधैर्वृक्षैः परार्थप्रतिपादकैः ।
स्निग्धच्छायैः समाहृष्टनानापक्षिनिनादितैः ॥२०॥
शार्दूलहरिभिर्भल्लैर्गण्डकैर्मृगनाभिभिः ।
गजेंद्रैः शरभाद्यैश्च सेवितं कन्दरागतैः ॥२१॥

हम सभी भाई गुरु की शुश्रूषा में निरत रहा करते थे और बहुत ही ज्ञान में परायण हो गये थे । प्रतिदिन वन में जाकर फल—जल—समिधा—कुशा और मृत्तिका लाया करते थे ।१५। ये सब वस्तुएँ वन से लाकर अपने पिता को दिया करते थे और फिर इसके अनन्तर अपना अध्ययन ही किया