भारतकोश
संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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परशुराम का अगस्त्याश्रम में आगमन ] [ २६६

करते थे। एक बार ऐसा हुआ था कि हम सब वन में पर्वत पर पहुँच गये ।१६। हे चञ्चल नेत्रों वाली ! कृतमाला नदी के तट पर औदुभि नाम वाला वहाँ स्थित था। हम सबने प्रातःकाल की वेला में उसी नदी में स्नान किया था और बहुत ही प्रसन्न मन वाले हो गये थे ।१७। हम सबने सूर्य देव को अर्घ्य दिया था और जाप करके हम सब उस उत्तम पर्वत पर सकारूढ़ हो गये थे। अब वहाँ की वृक्षावली की प्राकृतिक छटा का वर्णन किया जाता है—वह स्थल ऐसा अत्यधिक रमणीय था कि वहाँ पर शाल-तमाल-प्रियक-पनस-कोविदार-सरल-अर्जुन-पूग-खजूर-नारिकेल-जम्बू-सहकार-कटु फल और बृहती के वृक्ष लगे थे ।१८-१९। इनके अतिरिक्त अन्य भी वहाँ पर अनेक प्रकार के तरुवर थे जो दूसरों के अर्थ का प्रतिपादन करने वाले थे। अर्थात् पुष्प-फलादि से द्वारा दूसरे जीवों का उपकार करने वाले थे। उन वृक्षों की छाया बहुत ही घनी थी और उन पर दूर-दूर से पक्षी गण उन पर समावृष्ट होकर अपना कलख कर रहे थे ।२०। उस पर्वतीय महारण्य में विविध प्रकार के वन्य हिंस्र जीव भी भ्रमण कर रहे थे। शार्दूल-भल्ल-हरि-गण्डक-मृगनाभि-गजेन्द्र और शरभ आदि बहुत हिंसक अपनी-अपनी कन्दरा में निवास करते हुए उसका सेवन कर रहे थे ।२१।

मल्लिकापाटलाकुन्दकर्णिकारकदंबकैः । सुगंधिभिर्वृतं चान्यैर्वातोद्धूतपरागिभिः ॥२२

नानामणिगणाकीर्णैर्नीलपीतसितारुणैः । शृंगै समुल्लिखंतं च व्योम कौतुकसंयुतम् ॥२३

अत्युच्चपातध्वनिभिर्निर्झरैः कंदरोद्गतैः । गर्जंतमिव संसक्तं व्यालाद्यैर्मृगपक्षिभिः ॥२४

तत्रातिकौतुकाहृष्टदृष्टयो भ्रातरो वयम् । नास्माष्मं चात्मनाऽत्मानं वियुक्ताश्च परस्परम् ॥२५

एतस्मिन्नंतरे चैका मृगी ह्यागात्पिपासिता । निर्झरापात शिरसि पातुकामा जलं प्रिये ॥२६

तस्याः पिबंत्यास्तु जलं शार्दूलोऽतिभयंकरः । तत्र प्राप्तो यदृच्छातो जगृहे तां भयार्दिताम् ॥२७