भारतकोश
संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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२७० ] | ब्रह्माण्ड पुराण

अहं तद्ग्रहणं पश्यन्भयेन प्रपलायितः । अत्युच्चवत्त्वात्पतितो मृतश्चैणीमनुस्मरन् ॥२८

वहाँ वन में अनेक सुन्दर एवं सुरभित सुमनों वाले द्रुम और लताएं भी समुत्पन्न हुए थे जिनमें कदम्ब-मल्लिका-पाटल-कुन्द-कर्णिकार आदि थे। इनके अतिरिक्त अन्य भी ऐसे वृक्ष थे जिनके पराग वायु से उड़ रहा था और वह वन सुगन्धित उन गुल्मलता और द्रुमों से समाकीर्ण था ।२२। उस पर्वत में अनेक नील-सित-पीत अरुण वर्ण वाली मणियाँ थीं । उसकी शिखरें इतनी अधिक उच्च थीं कि वे मानों व्योम में पहुँच कुछ उल्लेख कर रही हों । इस तरह से वह पर्वत बहुत से कौतुकों से समन्वित था ।२३। वहाँ बहुत ही ऊँचाई से गिरने के कारण घोर गम्भीर ध्वनि वाले अनेक झरने थे । ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो कन्दराओं में स्थित व्यालादि मृगों और पक्षियों की गर्जना से वह संसक्त है ।२४। वहाँ पर अत्यधिक कौतुकों से युक्त वह स्थल था । मैंने अपनी आत्मा से अपने आपको स्मरण नहीं किया था अर्थात् मैं अपने आपको भूल गया था तथा हम सब परस्पर में एक दूसरे से विमुक्त हो गये थे क्योंकि हम सब भाई वहाँ अत्यधिक कौतुकों से हृष्ट दृष्टि वाले हो गये थे ।२५। इसी बीच में वहाँ पर एक मृगी बहुत ही प्यासी आ गयी थी । हे प्रिये ! वह मृगी जहाँ पर एक झरना गिर रहा था उसके ही शिर में वह जलपान करने की इच्छा वाली थी ।२६। वह विचारी जब जल पी रही थी तो वहाँ पर एक महान भयङ्कर शार्दूल आ पहुँचा था जो अपनी ही इच्छा से घूमता हुआ आ निकला था और उसने भय से पीड़ित उस हिरनी को पकड लिया था ।२७। मैंने जब यह देखा कि शार्दूल ने उसका ग्रहण कर लिया है तो मुझे भी बड़ा भय उत्पन्न हो गया था और मैं वहाँ से भाग दिया था । उस तरह से भयभीत होकर जब मैं बेतहाशा भागा था तो एक बहुत ही उच्च स्थल से नीचे गिर गया था और उस शार्दूल के द्वारा पकड़ी हुई हिरणी का अनुस्मरण करते हुए गिरते-गिरते मृत हो गया था ।२८।

सा मृता त्वं मृगी जाता मृगस्त्वाहमनुस्मरन् । जातो भद्रे न जाने वै क्व गता भ्रातरोऽग्रजाः ॥२९

एतन्मे स्मृतिमापन्नं चरितं तव चात्मनः । भूतं भविष्यं च तथा शृणु भद्रे वदाम्यहम् ॥३०