संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपरशुराम का अगस्त्याश्रम में आगमन ] [ २७१
योऽयं वा पृष्ठसंलग्नो व्याधो दूरस्थितोऽभवत् । रामस्यास्य भयात्सोऽपि भक्षितो हरिणाधुना ॥३१ प्राणांस्त्यक्त्वा विधानेन स्वर्गलोकं गमिष्यति । आवाभ्यां तु जलं पीतं मध्यमे पुष्करे त्विह ॥३२ संदृष्टो भार्गवश्चायं साक्षाद्विष्णुस्वरूपधृक् । तेनानेकभवोत्पन्नं पातकं नाशमागतम् ॥३३ अगस्त्यदर्शनं लब्ध्वा श्रुत्वा स्तोत्रं गतिपदम् । गमिष्यावः शुभांल्लोकान्येषु गत्वा न शोचति ॥३४ इत्येवमुक्त्वा सं मृगः प्रियायै प्रियदर्शनः । विरराम प्रसन्नात्मा पश्यन्नाममनातुरः ॥३५
वह जो हिरणी शार्दूल के द्वारा पकड़ी जाने पर मर गयी थी वही तू अब पुनः इस जन्म में मृगी हुई है। और मैं द्विज सुत जो मरती हुई तेरा अनुस्मरण करते प्राणों का गिरकर परित्याग करने वाला था वही अब मृग होकर जन्म लेने वाला हूँ। यह मृत्यु के समय में भावना का ही कारण है कि हम तुम दोनों इस तिर्यग् योनि से समुत्पन्न हुए हैं। मैं यह नहीं जानता हूँ कि मेरे अन्य तीन भाई जो मुझसे बड़े थे कहाँ पर गये है।२६। यह मेरा अपना और तुम्हारा चरित मेरी स्मृति में विद्यमान है। हे भद्रे ! जो व्यतीत हो गया है और जो आगे होने वाला है उसको मैं बतलाता हूँ। तुम उसका श्रवण करो।३०। जो यह व्याघ्र पीछे की ओर लगा हुआ दूर में खड़ा था और यम का उसको भय हो रहा था। उसका भी इस समय में एक सिंह ने भक्षण कर लिया है।३१। उसका ऐसा ही विधान है उससे वह अपने प्राणों का त्याग करके स्वर्गलोक में चला जायगा और यहाँ पर मध्यम पुष्कर में हम तुम दोनों ने जल पिया है।३२। यहाँ पर इन भार्गव परशुराम का भली भांति दर्शन किया गया है। इससे अनेक जन्मों में किये हुए भी पातक नाश को प्राप्त हो गये हैं क्योंकि वह भार्गव साक्षात् भगवान् विष्णु के ही स्वरूप को धारण करने वाले हैं।३३। अब महामुनीन्द्र अगस्त्य के दर्शन प्राप्त करके तथा सद्गति प्रदायक स्तोत्र का श्रवण करके हम तुम दोनों ही परम शुभ लोकों में गमन करेंगे जिनमें गमन करके प्राणी को किसी भी प्रकार की चिन्ता नहीं रहा करती है अर्थात् कोई पीड़ा होती ही नहीं है