संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
परशुराम का अगस्त्याश्रम में आगमन ] [ २६६
करते थे। एक बार ऐसा हुआ था कि हम सब वन में पर्वत पर पहुँच गये ।१६। हे चञ्चल नेत्रों वाली ! कृतमाला नदी के तट पर औदुभि नाम वाला वहाँ स्थित था। हम सबने प्रातःकाल की वेला में उसी नदी में स्नान किया था और बहुत ही प्रसन्न मन वाले हो गये थे ।१७। हम सबने सूर्य देव को अर्घ्य दिया था और जाप करके हम सब उस उत्तम पर्वत पर सकारूढ़ हो गये थे। अब वहाँ की वृक्षावली की प्राकृतिक छटा का वर्णन किया जाता है—वह स्थल ऐसा अत्यधिक रमणीय था कि वहाँ पर शाल-तमाल-प्रियक-पनस-कोविदार-सरल-अर्जुन-पूग-खजूर-नारिकेल-जम्बू-सहकार-कटु फल और बृहती के वृक्ष लगे थे ।१८-१९। इनके अतिरिक्त अन्य भी वहाँ पर अनेक प्रकार के तरुवर थे जो दूसरों के अर्थ का प्रतिपादन करने वाले थे। अर्थात् पुष्प-फलादि से द्वारा दूसरे जीवों का उपकार करने वाले थे। उन वृक्षों की छाया बहुत ही घनी थी और उन पर दूर-दूर से पक्षी गण उन पर समावृष्ट होकर अपना कलख कर रहे थे ।२०। उस पर्वतीय महारण्य में विविध प्रकार के वन्य हिंस्र जीव भी भ्रमण कर रहे थे। शार्दूल-भल्ल-हरि-गण्डक-मृगनाभि-गजेन्द्र और शरभ आदि बहुत हिंसक अपनी-अपनी कन्दरा में निवास करते हुए उसका सेवन कर रहे थे ।२१।
मल्लिकापाटलाकुन्दकर्णिकारकदंबकैः । सुगंधिभिर्वृतं चान्यैर्वातोद्धूतपरागिभिः ॥२२
नानामणिगणाकीर्णैर्नीलपीतसितारुणैः । शृंगै समुल्लिखंतं च व्योम कौतुकसंयुतम् ॥२३
अत्युच्चपातध्वनिभिर्निर्झरैः कंदरोद्गतैः । गर्जंतमिव संसक्तं व्यालाद्यैर्मृगपक्षिभिः ॥२४
तत्रातिकौतुकाहृष्टदृष्टयो भ्रातरो वयम् । नास्माष्मं चात्मनाऽत्मानं वियुक्ताश्च परस्परम् ॥२५
एतस्मिन्नंतरे चैका मृगी ह्यागात्पिपासिता । निर्झरापात शिरसि पातुकामा जलं प्रिये ॥२६
तस्याः पिबंत्यास्तु जलं शार्दूलोऽतिभयंकरः । तत्र प्राप्तो यदृच्छातो जगृहे तां भयार्दिताम् ॥२७
२७० ] | ब्रह्माण्ड पुराण
अहं तद्ग्रहणं पश्यन्भयेन प्रपलायितः । अत्युच्चवत्त्वात्पतितो मृतश्चैणीमनुस्मरन् ॥२८
वहाँ वन में अनेक सुन्दर एवं सुरभित सुमनों वाले द्रुम और लताएं भी समुत्पन्न हुए थे जिनमें कदम्ब-मल्लिका-पाटल-कुन्द-कर्णिकार आदि थे। इनके अतिरिक्त अन्य भी ऐसे वृक्ष थे जिनके पराग वायु से उड़ रहा था और वह वन सुगन्धित उन गुल्मलता और द्रुमों से समाकीर्ण था ।२२। उस पर्वत में अनेक नील-सित-पीत अरुण वर्ण वाली मणियाँ थीं । उसकी शिखरें इतनी अधिक उच्च थीं कि वे मानों व्योम में पहुँच कुछ उल्लेख कर रही हों । इस तरह से वह पर्वत बहुत से कौतुकों से समन्वित था ।२३। वहाँ बहुत ही ऊँचाई से गिरने के कारण घोर गम्भीर ध्वनि वाले अनेक झरने थे । ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो कन्दराओं में स्थित व्यालादि मृगों और पक्षियों की गर्जना से वह संसक्त है ।२४। वहाँ पर अत्यधिक कौतुकों से युक्त वह स्थल था । मैंने अपनी आत्मा से अपने आपको स्मरण नहीं किया था अर्थात् मैं अपने आपको भूल गया था तथा हम सब परस्पर में एक दूसरे से विमुक्त हो गये थे क्योंकि हम सब भाई वहाँ अत्यधिक कौतुकों से हृष्ट दृष्टि वाले हो गये थे ।२५। इसी बीच में वहाँ पर एक मृगी बहुत ही प्यासी आ गयी थी । हे प्रिये ! वह मृगी जहाँ पर एक झरना गिर रहा था उसके ही शिर में वह जलपान करने की इच्छा वाली थी ।२६। वह विचारी जब जल पी रही थी तो वहाँ पर एक महान भयङ्कर शार्दूल आ पहुँचा था जो अपनी ही इच्छा से घूमता हुआ आ निकला था और उसने भय से पीड़ित उस हिरनी को पकड लिया था ।२७। मैंने जब यह देखा कि शार्दूल ने उसका ग्रहण कर लिया है तो मुझे भी बड़ा भय उत्पन्न हो गया था और मैं वहाँ से भाग दिया था । उस तरह से भयभीत होकर जब मैं बेतहाशा भागा था तो एक बहुत ही उच्च स्थल से नीचे गिर गया था और उस शार्दूल के द्वारा पकड़ी हुई हिरणी का अनुस्मरण करते हुए गिरते-गिरते मृत हो गया था ।२८।
सा मृता त्वं मृगी जाता मृगस्त्वाहमनुस्मरन् । जातो भद्रे न जाने वै क्व गता भ्रातरोऽग्रजाः ॥२९
एतन्मे स्मृतिमापन्नं चरितं तव चात्मनः । भूतं भविष्यं च तथा शृणु भद्रे वदाम्यहम् ॥३०
परशुराम का अगस्त्याश्रम में आगमन ] [ २७१
योऽयं वा पृष्ठसंलग्नो व्याधो दूरस्थितोऽभवत् । रामस्यास्य भयात्सोऽपि भक्षितो हरिणाधुना ॥३१ प्राणांस्त्यक्त्वा विधानेन स्वर्गलोकं गमिष्यति । आवाभ्यां तु जलं पीतं मध्यमे पुष्करे त्विह ॥३२ संदृष्टो भार्गवश्चायं साक्षाद्विष्णुस्वरूपधृक् । तेनानेकभवोत्पन्नं पातकं नाशमागतम् ॥३३ अगस्त्यदर्शनं लब्ध्वा श्रुत्वा स्तोत्रं गतिपदम् । गमिष्यावः शुभांल्लोकान्येषु गत्वा न शोचति ॥३४ इत्येवमुक्त्वा सं मृगः प्रियायै प्रियदर्शनः । विरराम प्रसन्नात्मा पश्यन्नाममनातुरः ॥३५
वह जो हिरणी शार्दूल के द्वारा पकड़ी जाने पर मर गयी थी वही तू अब पुनः इस जन्म में मृगी हुई है। और मैं द्विज सुत जो मरती हुई तेरा अनुस्मरण करते प्राणों का गिरकर परित्याग करने वाला था वही अब मृग होकर जन्म लेने वाला हूँ। यह मृत्यु के समय में भावना का ही कारण है कि हम तुम दोनों इस तिर्यग् योनि से समुत्पन्न हुए हैं। मैं यह नहीं जानता हूँ कि मेरे अन्य तीन भाई जो मुझसे बड़े थे कहाँ पर गये है।२६। यह मेरा अपना और तुम्हारा चरित मेरी स्मृति में विद्यमान है। हे भद्रे ! जो व्यतीत हो गया है और जो आगे होने वाला है उसको मैं बतलाता हूँ। तुम उसका श्रवण करो।३०। जो यह व्याघ्र पीछे की ओर लगा हुआ दूर में खड़ा था और यम का उसको भय हो रहा था। उसका भी इस समय में एक सिंह ने भक्षण कर लिया है।३१। उसका ऐसा ही विधान है उससे वह अपने प्राणों का त्याग करके स्वर्गलोक में चला जायगा और यहाँ पर मध्यम पुष्कर में हम तुम दोनों ने जल पिया है।३२। यहाँ पर इन भार्गव परशुराम का भली भांति दर्शन किया गया है। इससे अनेक जन्मों में किये हुए भी पातक नाश को प्राप्त हो गये हैं क्योंकि वह भार्गव साक्षात् भगवान् विष्णु के ही स्वरूप को धारण करने वाले हैं।३३। अब महामुनीन्द्र अगस्त्य के दर्शन प्राप्त करके तथा सद्गति प्रदायक स्तोत्र का श्रवण करके हम तुम दोनों ही परम शुभ लोकों में गमन करेंगे जिनमें गमन करके प्राणी को किसी भी प्रकार की चिन्ता नहीं रहा करती है अर्थात् कोई पीड़ा होती ही नहीं है
२७२ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
।३४। इस तरह से यह इतना अपनी प्रिया से कहकर वह प्रिय दर्शन मृग चुप हो गया था ओर अनातुर होकर राम का दर्शन करते हुए वह बहुत ही प्रसन्न आत्मा वाला हो गया था ।३५।
भार्गवः श्रुत्वांश्र्चैव मृगोक्तं शिष्यसंयुतः ।
विस्मितोऽभूच्च राजेन्द्र गन्तुं कृतमतिस्तथा ।।३६
अकृतव्रणसंयुक्तो ह्यगस्त्यस्याश्रमं प्रति ।
स्नात्वा नित्यक्रियां कृत्वा प्रतस्थे हर्षितो भृशम् ।।३७
रामेण गच्छता मार्गे दृष्टो व्याधो मृतस्तथा ।
सिंहस्य संप्रहारेण विस्मितेन महात्मना ।।३८
अध्यर्द्धं योजनं गत्वा कनिष्ठं पुष्करं प्रति ।
स्नात्वा माध्याह्निकीं सन्ध्यां चकारातिमुदान्वितः ।।३९
हितं तदात्मनः प्रोक्तं मृगेण स विचारयन् ।
तावत्तत्पृष्ठसंलग्नं मृगयुग्ममुपागतम् ।।४०
पुष्करे तु जलं पीत्वाभिषिच्यात्मतनुं जलैः ।
पश्यतो भार्गवस्यागादगस्त्याश्रमसंमुखम् ।।४१
रामोऽपि सन्ध्यां निर्वर्त्त्य कुम्भजस्याश्रमं ययौ ।
विपद्गतं पुष्करं तु पश्यमानो महामनाः ।।४२
भार्गव परशुराम ने अपने शिष्य के सहित इस तरह से उस मृग के द्वारा कही हुई बातों को सुना था और इसको सुनकर उसको बड़ा भारी विस्मय हो गया था । हे राजेन्द्र ! फिर उस परशुराम ने उसी भाँति से गमन करने के लिये अपनी बुद्धि बना ली थी ।३६। उस भार्गव ने सर्वप्रथम स्नान किया था और फिर अपनी जो नित्य क्रिया थी उसको समाप्त किया था । इसके पश्चात् मन में अत्यधिक हर्षित होकर अकृत व्रण नामधारी के साथ संयुत होकर अगस्त्य मुनि के आश्रम की ओर उसने प्रस्थान कर दिया था ।३७। जिस समय में राम गमन कर रहे थे तब मार्ग में मरे हुए व्याध को देखा था जो कि सिंह के द्वारा किये हुए सम्प्रहार से ही मर गया था । उसको देखकर उस महान् आत्मा वाले को बड़ा विस्मय हो गया था ।३८। फिर आगे आधे योजन तक चलकर कनिष्ठ पुष्कर था । वहाँ पहुँचकर राम
परशुराम का अगस्त्याश्रम में आगमन ] [ २७३
ने स्नान किया था और परम हर्ष से संयुक्त होकर वहाँ पर मध्याह्न काल में होने वाली सन्ध्या की उपासना की थी ।३६। उस समय में वह यही विचार कर रहा था उस मृग ने मेरा अपना हित कहा था । तब तक वह यह देखता है कि पीछे लगा उस मृग और मृगी का जोड़ा वहाँ पर उपागत हो गया था ।४०। उस मृग और मृगी के जोड़े ने पुष्कर में जल का पान किया था और उसके जल से अपने शरीरों का अभिषिञ्चन किया था । भार्गव परशुराम यह देख ही रहे थे कि उनके देखते-देखते वह मृग-मृगी का जोड़ा अगस्त्य मुनि आश्रम के सम्मुख चला गया था ।४१। राम ने भी अपनी सन्ध्योपासना को पूर्ण करके नैत्यिक कर्म से निवृत्ति की थी और वह भी अगस्त्य मुनि के आश्रम को चला गया था । यह परमोदार मन वाला विपद्गत पुष्कर का दर्शन करते ही चला जा रहा था ।४२।
विष्णोः पदानि नागानां कुण्डं सप्तर्षिसंस्थितम् । गत्वोपस्पृश्य शुच्यंभो जगामागस्त्यसंश्रयम् ।।३३
यच्च ब्रह्मसुता राजन्समामाता सरस्वती । त्रीन्संपूरयितुं कुण्डानग्निहोत्रस्य वै विधेः ।।४३
तत्र तीरे शुभं पुण्यं नानामुनिनिषेवितम् । ददर्श महदाश्चर्यं भार्गवः कुम्भजाश्रमम् ।।४५
मृगैः सिंहैः सहगतैः सेवितं शांतमानसैः । कुटरैरर्जुनैः पारिभद्रधवेगुदैः ।।४६
खदिरासनखर्जूरैः संकुलं बदरीद्रुमैः । तत्र प्रविश्य वै रामो ह्यकृतव्रणसंयुतः ।।४७
ददर्श मुनिमासीनं कुम्भजं शांतमानसम् । स्तिमितोदरसरः प्रख्यं ध्यायन्तं ब्रह्म शाश्वतम् ।।४८
कौश्यां वृष्यां मार्गकृतिं वसानं पल्लवोटजे । ननाम च महाराज स्वाभिधानं समुच्चरन् ।।४९
भगवान् विष्णु के पदों को-नागों के कुण्ड को जहाँ पर सप्तर्षिगण संस्थित थे जाकर, उस परम शुचि जल का उपस्पर्शन करके फिर वह अगस्त्य मुनि के संश्रय स्थल को चला गया था ।४३। हे राजन् ! वहाँ पर
२७४ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
ब्रह्माजी की पुत्री सरस्वती विधि के अग्निहोत्र के तीनों कुण्डों को पूरित करने के लिए समायात हुई थी ।४४। वहां पर उसी सरस्वती के तत्पर परम पुनीत और शुभ तथा महाश्चर्य से युक्त कुम्भज ऋषि के आश्रम को भार्गव ने देखा था जो अनेक मुनिगणों के द्वारा निषेवित था ।४५। वह आश्रम परम शान्त था और उसमें मृग और सिंह अपना स्वाभाविक वैर त्याग कर परम शान्त मन वाले एक ही साथ रहा करते थे । ऐसे सभी पशुओं का वहाँ पर निवास था । उस आश्रम में अनेक प्रकार के परम सुन्दर तरुवर लगे हुए थे जिनमें कुटर-अर्जुन-विम्ब-पारिभद्र-धव-इङ्गुद-खदिरासन-खर्जूर और बदरी आदि के अकृत व्रण से संयुत होकर प्रवेश किया था ।४५-४६-४७। प्रवेश करके राम ने विराजमान और परमशान्त मन वाले मुनिवर अगस्त्यजी का दर्शन प्राप्त किया था जो सर्वथा एकदम रुके हुए शान्त जल से भरे हुए सरोवर के ही समान थे तथा शाश्वत ब्रह्म का ध्यान कर रहे थे ।४८। वहाँ पर लताओं और द्रुमों के पत्तों से एक उटज (झोंपड़ी) बनी हुई थी उस उटज में अगस्त्य मुनि कौश्य—वृष्य तथा मृग चर्म को परिधान किये हुए विराजमान थे । हे महाराज ! वहाँ पर भार्गव राम ने अपने नाम का उच्चारण करते हुए अगस्त्य मुनि के चरणों में प्रणि-पात किया था ।४६।
रामोऽस्मि जामदग्न्योऽहं भवतं द्रष्टुमागतः । तद्विद्धि प्रणिपातेन नमस्ते लोकभावन ॥५० इत्युक्तवन्तं रामं तु उन्मील्य नयने शनैः । दृष्ट्वा स्वागतमुच्चार्य तस्मायासनमादिशत् ॥५१ मधुपर्कं समानीय शिष्येण मुनिपुंगवः । ददौ पप्रच्छ कुशलं तपसश्च कुलस्य च ॥५२ स पृष्टस्तेन वै रामो घटोद्भवमुवाच ह । भवत्सन्दर्शनादीश कुशलं मम सर्वतः ॥५३ किं त्वेकं संशयं जातं छिन्धि स्ववचनामृतैः । मृगश्चैको मया दृष्टो मध्यमे पुष्करे विभो ॥५४ तेनोक्तमखिलं वृत्तं मम भूतमनार्गतम् । तच्छ्रुत्वा विस्मयाविष्टो भवच्छरणमागतः ॥५५
परशुराम का अगस्त्याश्रम में आगमन ] [ २७५
पाहि मां कृपया नाथ साधयंतं महामनुम् ।
शिवेन दत्तं कवचं मम साधयतो गुरो ॥५६॥
राम ने अगस्त्य मुनि के चरणों की सन्निधि में समुपस्थित होकर उनसे निवेदन किया था कि मैं जमदग्नि का आत्मज राम हूँ और यहाँ पर आपके दर्शन करने के लिए समागत हुआ हूँ। हे लोकों पर कृपा करने वाले मुनिवर ! मैं आपकी सेवा में प्रणिपात कर रहा हूँ उसे आप स्वीकार कीजिए ।५०। जब राम ने इस रीति से प्रार्थना की थी तो ऐसे कहने वाले राम को उन्होंने धीरे से ध्यानावस्था में मुँदे हुए नेत्रों को खोलकर देखा था और फिर आपका स्वागत है-- ऐसा उच्चारण करके उनको आसन पर उपविष्ट हो जाने की आज्ञा प्रदान की थी ।५१। उन मुनियों में परम श्रेष्ठ अगस्त्य जी ने शिष्य के द्वारा मधुपर्क मँगाकर राम को प्रदान किया था। फिर तपश्चर्या और कुल की क्षेम-कुशल उससे पूछी थी ।५२। उन मुनिवर के द्वारा जब राम से इस रीति से पूछा गया था तो उस समय में राम ने अगस्त्य मुनि से कहा था । हे ईश ! अब आपके चरणों के दर्शन से मेरा सभी प्रकार का क्षेम-कुशल है ।५३। हे विभो ! मुझे एक संशय हो गया है। उसका छेदन आप कृपा कर अपने अमृत रूपी वचनों के द्वारा कर दीजिए। मैंने एक मृग को मध्यम पुष्कर में देखा था ।५४। उस मृग ने मेरा अतीत और अनागत सम्पूर्ण वृत्त बतला दिया था । इसका श्रवण करके मैं अधिक विस्मय से आविष्ट हो गया हूँ और अब आपके चरण कमलों की शरण में समागत हुआ हूँ ।५५। अपनी स्वाभाविक अनुकम्पा से मेरा परित्राण कीजिए । और हे नाथ ! महामन्त्र की सिद्धि कराइये । हे गुरो ! भगवान् शिव ने जो कवच मुझे प्रदान किया है उसको सिद्ध कराइये । इसमें आपकी परमानुकम्पा मेरे दास के ऊपर होगी ।५६।
कृष्णस्य समतीतं तु साधिकं हि शरच्छतम् ।
न च सिद्धिमवाप्तोऽहं तन्मे त्वं कृपया वद ॥५७
वसिष्ठ उवाच-
एवं प्रश्नं समाकर्ण्य रामस्य सुमहात्मनः ।
क्षणं ध्वात्वा महाराज मृगोक्तं ज्ञातवान् हृदा ॥५८॥
मृगं चापि समायातं मृग्या सह निजाश्रमे ।
२७६ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
श्रोतुं कृष्णामृतं स्तोत्रं सर्वं तत्कारणं मुनिः ।
विचार्यश्वासयामास भार्गवः स्ववचोऽमृतैः ॥५६
इस श्रीकृष्ण के मन्त्र की साधना करते हुए मुझे एक सौ वर्ष से भी अधिक काल व्यतीत हो गया है तो भी मुझे इसकी सिद्धि प्राप्त नहीं हुई है । इसका क्या कारण है । यह आप मुझे अपनी परमाधिक कृपा करके बतलाइए ।५७। श्री वसिष्ठ मुनि ने कहा—इस प्रकार का जो प्रश्न महात्मा राम ने किया था उसका श्रवण करके हे महाराज ! उस महामुनि ने एक क्षण भर कुछ ध्यान किया था और फिर जो कुछ भी उस मृग ने कहा था उसको उस समय में उन्होंने अपने ध्यान से जान लिया था ।५८। अपनी मृगी के साथ अपने आश्रम में आये हुए उस मृग को भी उन्होंने जान लिया था जो कि श्रीकृष्णमृत स्तोत्र का श्रवण करने के लिए ही वहाँ पर समागत हुआ था । मुनि ने उस सबका कारण भी समझ लिया था । इस सबका विचार करके उन महामुनि अगस्त्य जी ने उस भार्गव राम को अपने अमृत रूपी वचनों के द्वारा आश्वासन दिया था ।५६।
अगस्त्य द्वारा श्रीकृष्ण प्रेमामृत स्तोत्र का कथन
वसिष्ठ उवाच—
अवगत्य स वै सर्वं कारणं प्रीतमानसः ।
उवाच भार्गवं राममगस्त्यः कुम्भसंभवः ॥१
अगस्त्य उवाच—
शृणु राम महाभाग कथयामि हितं तव ।
मन्त्रस्य सिद्धिं येन त्वं शीघ्रमेव समाप्नुयाः ॥२
भक्तेस्तु लक्षणं ज्ञात्वा त्रिविधाया महामते ।
यो यतेत नरस्तस्य सिद्धिर्भवति सत्वरम् ॥३
एकदाऽहमनुप्राप्तोऽनन्तदर्शनकांक्षया ।
पातालं नागराजैन्द्रैः शोभितं परया मुदा ॥४
तत्र दृष्टा महाभाग मया सिद्धाः समन्ततः ।
सनकाद्या नारदश्च गौतमो जाजलिः क्रतुः ॥५
अगस्त्य द्वारा श्रीकृष्ण प्रेमामृत स्तोत्र का कथन ] [ २७७
ऋभुर्हंसोऽरुणिश्चैव वाल्मीकिः शक्तिरासुरिः ।
एतेऽन्ये च महासिद्धा वात्स्यायनमुखा द्विज ॥६
उपासत ह्युपासीना ज्ञानार्थं फणिनायकम् ।
तं नमस्कृत्य नागेन्द्रैः सह सिद्धैर्महात्मभिः ॥७
महामुनि वसिष्ठ जी ने कहा—उस सम्पूर्ण कारण को भली भाँति समझ कर कुम्भ से समुत्पन्न अगस्त्य मुनि ने अपने मन परम प्रीति करके भार्गव राम से कहा था ।१। अगस्त्य मुनि ने कहा—हे परशुराम ! आप तो महान् भाग वाले हैं । मैं अब आपके हित की बात कहता हूँ उसका आप श्रवण कीजिए । जिनके द्वारा आप बहुत ही शीघ्र इस महामन्त्र की सिद्धि की प्राप्ति कर लेंगे ।२। हे महती मति वाले ! यह भक्ति तीन प्रकार की होती है । उस भक्ति के तीनों प्रकारों के लक्षणों का ज्ञान प्राप्त करके जो मनुष्य फिर यत्न किया करता है वह बहुत ही शीघ्र पूर्ण सिद्धि प्राप्त कर लिया करता है ।३। एक बार मैं स्वयं भगवान् अनन्त देव के दर्शन प्राप्त करने की आकांक्षा से पाताल लोक में गया था जो कि परमानन्द के साथ बड़े-बड़े नाग राजों से सुशोभित था ।४। हे महाभाग ! यहाँ पर मैंने देखा था कि चारों ओर बड़े-बड़े सिद्ध महापुरुष विराजमान थे । वहाँ सनकादिक चारों महासिद्ध-देवर्षि नारद-गौतम-जाजलि-क्रतु-ऋभु-हंस-अरुणि-वाल्मीकि-शक्ति-आसुरि प्रभृति सभी मुनीन्द्रगण और ऋषियों के समुदाय विद्यमान थे । हे द्विज ! ये सब और अन्य भी वात्स्यायन जिनमें प्रमुख थे महान् सिद्धगण वहाँ पर बैठे हुए थे ।५-६। ये सभी वहाँ पर बैठे हुए ज्ञान की पूर्ण प्राप्ति के लिये फणि नायक शेषराज की उपासना कर रहे थे । वहाँ पर बड़े-बड़े नागेन्द्र और महान् आत्मा वाले सिद्ध सभी विराजमान थे उन सबके साथ फणीन्द्र नायक शेष महाराज की सेवा में मैंने बड़े आदर के साथ प्रणिपात किया था ।७।
उपविष्टः कथास्तत्र शृण्वानो वैष्णवीर्मुदा ।
येयं भूमिर्महाभाग भूतधात्रीस्वरूपिणी ॥८
निविष्टा पुरतस्तस्य शृण्वती ताः कथाः सदा ।
यद्यत्पृच्छति सा भूमिः शेषं साक्षान्महीधरम् ॥९
शृण्वन्ति ऋषयः सर्वे तत्रस्थाः तदनुग्रहात् ।
मया तत्र श्रुतं वत्स कृष्णप्रेमामृतं शुभम् ॥१०
अगस्त्य द्वारा श्रीकृष्ण प्रेमामृत स्तोत्र का कथन ] [ २७८
स्तोत्रं तत्ते प्रवक्ष्यामि यस्यार्थं त्वमिहागतः । वाराहाद्यवताराणां चरितं पापनाशनम् ॥११ सुखदं मोक्षदं चैव ज्ञानविज्ञानकारणम् । श्रुत्वा सर्वं धरा वत्स प्रहृष्टा तं धराधरम् ॥१२ उवाच प्रणता भूयो ज्ञातुं कृष्णविचेष्टितम् ।
धरण्युवाच- अलंकृतं जन्म पुंसामपि नंदव्रजौकसाम् ॥१३ तस्य देवस्य कृष्णस्य लीलावियहधारिणः । जयोपाधिनियुक्तानि संति नामान्यनेकशः ॥१४
मैं वहाँ पर बड़े ही आनन्द से भगवान् विष्णु देव की कथाओं का श्रवण करता हुआ बैठ गया था। हे महाभाग ! यह भूमि भी जो समस्त भूतों की धात्री स्वरूप वाली है वहीं पर उन शेष भगवान् के आगे बैठी हुई थी और बहुत ही प्रीति के साथ सदा कथाओं का श्रवण किया करती थी। वह भूमि साक्षात् इस मही के धारण करने वाले शेष भगवान् से जो-जो भी पूछा करती है उसको समस्त ऋषिगण वहीं पर संस्थित होकर उनके ही अनुग्रह के होने से श्रवण किया करते हैं। हे वत्स ! मैंने भी वहां परम शुभ कृष्ण प्रेमामृत का श्रवण किया था ।८-१०। उस स्तोत्र को मैं अब आपको बतलाऊंगा जिसको प्राप्त करने के लिये तुम यहाँ पर आये हो। इस स्तोत्र में वाराह आदि भगवान् के अवतारों का चरित है जो समस्त प्रकार के पापों का विनाश कर देने वाला होता है ।११। यह चरित परमाधिक सुख-सौभाग्य के प्रदान करने वाला है—परलोक में जाकर इस भौतिक शरीर के त्याग करने के पश्चात् मोक्ष का भी देने वाला है जिससे इस संसार में बारम्बार जन्म-मरण के महान् कष्टों से छुटकारा मिल जाया करता है। और यह चरित ऐसा अद्भुत है कि जो पूर्ण ज्ञान और विशेष ज्ञान का भी कारण होता है। इस वसुन्धरा देवी ने इन सब का श्रवण किया था और यह बहुत ही अधिक प्रसन्न हुई थी, हे वत्स ! फिर धराके धारण करने वाले अनन्त भगवान् से बोली थी ।१२। परम प्रणत होकर इस भूमि ने फिर भगवान् कृष्ण की लीला को जानने के लिए प्रार्थना की थी। धरणी ने कहा—भगवान् श्री कृष्ण चन्द्र जी ने नन्द गोपराज के ब्रज में निवास करने वाले ब्रजवासी मनुष्यों का भी जन्म अपना अवतार धारण कर अनेक अद्भुत लीला-
अगस्त्य द्वारा श्रीकृष्ण प्रेमामृत स्तोत्र का कथन ] [ २७६
विहारों से अलंकृत कर दिया था।१३। अपनी लीला से ही विग्रह (मानवीय शरीर) धारण करने वाले उन श्री कृष्ण देव के जय की अनेक उपाधियों से नियुक्त अनेक शुभ नाम है ।१४।
तेषु नामानि मुख्यानि श्रोतुकामा चिरादहम् ।
तत्तानि ब्रूहि नामानि वासुदेवस्य वासुके ।।१५
नातः परतरं पुण्यं त्रिषु लोकेषु विद्यते ।
शेष उवाच-
वसुंधरे वरारोहे जनानामस्ति मुक्तिदम् ।।१६
सर्वमंगलमूर्द्धन्यमणिमाद्यष्टसिद्धिदम् ।
महापातककोटिघ्नं सर्वतीर्थफलप्रदम् ।।१७
समस्तजपयज्ञानां फलदं पापनाशनम् ।
शृणु देवि प्रवक्ष्यामि नाम्नामष्टोत्तरं शतम् ।।१८
सहस्रनाम्नां पुण्यानां त्रिरावृत्या तु यत्फलम् ।
एकावृत्या तु कृष्णस्य नामैकं तत्प्रयच्छति ।।१९
तस्मात्पुण्यतरं चैतत्स्तोत्रं पातकनाशनम् ।
नाम्नामष्टोत्तरशतस्याहमेव ऋषिः प्रिये ।।२०
छन्दोऽनुष्टुब्देवता तु योगः कृष्णप्रियावहः ।
श्रीकृष्णः कमलानाथो वासुदेवः सनातनः ।।२१
उन श्रीकृष्ण के नामों में जो बहुत ही प्रमुख उनके नाम हैं उनके श्रवण करने की कामना वाली मैं बहुत अधिक समय से हो रही हूँ। हे भगवन्वासुके ! भगवान् वासुदेव के उन परम शुभ नामों को अब कृपा करके मेरे आगे बतलाइए ।१५। क्योंकि इस संसार में इससे परतर अर्थात् बड़ा अन्य कोई भी पुण्य नहीं है। तात्पर्य यह है कि भगवान् श्रीकृष्ण के परम शुभ नामों का स्मरण और श्रवण लोक में सबसे अधिक पुण्य कार्य है। भगवान् शेष ने कहा- हे परम श्रेष्ठ आरोह वाली वसुन्धरे ! भगवान् श्री कृष्ण के एक सौ आठ नामों का एक शतक स्तोत्र है और वह मानवों के लिए मुक्ति के प्रदान करने वाला है ।१६। यह शतक सभी प्रकार के मङ्गल कार्यों में शिरोमणि है तथा लौकिक साधारण वैभवों की प्राप्ति की तो बात
२८० ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
ही क्या है यह तो अणिमा-महिमा आदि जो आठ सिद्धियां हैं उनको भी देने वाला है। बड़े-बड़े महान् जो करोड़ों प्रकार के पातक हैं उनका भी विनाश कर देने वाला और समस्त तीर्थों के स्नान-ध्यान तथा अटन का जो पुण्यफल हुआ करता है उनके प्रदान कर देने वाला होता है।१७। सभी तरह के अश्वमेधादि यज्ञों एवं जपों का जो भी फल होता है उसके देने वाला है और सभी पापों के नाश करने वाला है। हे देवि ! अब आप उस नामों के शतक को सुनिए, मैं आपको बतलाता हूँ जो एक सौ आठ भगवान् के नामों वाला है ।१८। परम पुण्यमय अन्य सहस्र नामों की तीन बार आवृत्ति के करने से जो फल प्राप्त होता है वह पुण्य-फल भगवान् श्रीकृष्ण के नाम की एक ही आवृत्ति के द्वारा एक ही नाम दिया करता है ।१९। इस कारण से यह स्तोत्र विशेष पुण्य वाला है और पातकों का विनाशक है। हे प्रिये ! इस परम शुभ नामों के अष्टोत्तर शत का मैं ही ऋषि हूँ ।२०। इसका छन्द अनुष्टुप् है और इसका देवता श्री कृष्ण के प्रिय का आवहन करने वाला योग है। अब यहाँ से आगे वह अष्टोत्तर शतक का आरम्भ होता है—श्रीकृष्ण-कमला (महालक्ष्मी) के नाथ-वसुदेव के पुत्र वासुदेव-और सनातन अर्थात् सदा सर्वदा से चले आने वाले हैं ।२१।
वसुदेवात्मजः पुण्यो लीलामानुषविग्रहः ।
श्रीवत्सकौस्तुभधरो यशोदावत्सलो हरिः ॥२२
चतुर्भुं जात्तचक्रासिगदाशं खायुधायुधः ।
देवकीनन्दनः श्रीशो नन्दगोपप्रियात्मजः ॥२३
यमुनावेगसंहारी बलभद्रप्रियानुजः ।
पूतनाजीवितहरः शकटासुरभंजनः ॥२४
नन्दव्रजनानन्दी सच्चिदानंदविग्रहः ।
नवनीतविलिप्तांगो नवनीतनटोऽनघः ॥२५
नवनीतलवाहारी मुचुकुं दप्रसादकृत् ।
षोडशस्त्रीसहस्रेशस्त्रिभंगी मधुराकृतिः ॥२६
शुकवागमृताब्धींदुर्गोविदो गोविदांपतिः ।
वत्सपालनसंचारी धेनुकासुरमर्दनः ॥२७
अगस्त्य द्वारा श्रीकृष्ण प्रेमामृत का कथन ] [ २८१
तृणीकृततृणावर्त्तो यमलार्जुनभंजनः ।
उत्तालतालभेत्ता च तमालश्यामलाकृतिः ॥२८॥
वसुदेव को पुत्र—परम पुण्यमय—लीला ही से मानुष शरीर के धारण करने वाले हैं। श्रीवत्स का चिह्न और कौस्तुभ मणि धारण के करने वाले-यशोदा के वत्सल और हरि हैं। हरि का अर्थ होता है पापों के हरण करने वाले हैं। २२। चार भुजाओं में सुदर्शन चक्र, कौमोदकी गदा, शङ्ख और असि आदि आयुधों के धारण करने वाले हैं। देवकी के नन्दन—श्रीदेवी के स्वामी और नन्दगोप की प्रिया यशोदा के आत्मज अर्थात् पुत्र हैं। २३। यमुना के वेग का संहार करने वाले। बलभद्रजी परम प्रिय अनुज अर्थात् छोटे भाई हैं। पूतना के जीवन का हरण करने वाले तथा शकटासुर का हनन करने वाले हैं। २४। नन्दगोप ब्रह्मजन अर्थात् ब्रजवासी मनुष्यों को आनन्द देने वाले और सत्-चित् (ज्ञान) तथा आनन्द के शरीर वाले हैं अर्थात् सत्-चित् और आनन्द ये तीनों ही वस्तुएँ उनके शरीर में विद्यमान हैं। नवनीत (मक्खन) से विलिप्त अङ्गों वाले हैं जिस समय में यशोदाजी दधि मन्थन कर रही थी उस समय में दधिभाण्ड का भयंकर नवनीत अपने समस्त अङ्गों में लपेट लिया था। नवनीत के लिए नट हैं अर्थात् थोड़ा सा नवनीत पाने के लिए गोपाङ्गनाओं के यहाँ अनेक नृत्य आदि की लीलायें करने वाले हैं। अनघ अर्थात् निष्पाप स्वरूप वाले हैं। २५। नवनीत के थोड़े से भाग का आहार करने वाले हैं अर्थात् दधि और मक्खन के विक्रय करने वाली ब्रजाङ्गनाओं को मार्ग में रोककर नवनीत का आहार किया करते हैं। राजा मुचुकुन्द के ऊपर कृपा करने वाले हैं। जिस समय जरासन्ध से युद्ध हो रहा था तब स्वयं भाग कर वहाँ पर पहुँच गये थे जहाँ पर निद्रित मुचुकुन्द गुफा में यह वरदान लेकर सो रहा था कि उसे जो भी जगायेगा वह भस्म हो जायगा। उस पर अपनी पीताम्बर डालकर आप छिप गये थे जरासन्ध ने उसे श्रीकृष्ण समझ कर जगाया और भस्म हो गया था फिर भगवान् ने दर्शन देकर उसको प्रसन्न किया था। सोलह सहस्र स्त्रियों के स्वामी हैं-त्रिभङ्गी हैं अर्थात् चरण-कटि और ग्रीवा तीनों को तिरछा करके बंशी वादन करने वाले हैं तथा परमाधिक मधुर आकृति से समन्वित हैं। २६। अमृत के समान जो शुकदेव की वाणी रूपी सागर है उसके आप चन्द्र हैं अर्थात् शुकदेव जी के द्वारा श्रीमद्भागवत की रचना हुई उसके प्रकाशन चन्द्र हैं। गोविन्दों के पति हैं। जब आप बालक थे तब ब्रज में गोवत्सों का पालन करने के लिए वन में सञ्चरण करने वाले हैं तथा धेनुक नामक कंस
२८२ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
के द्वारा प्रेषित असुर का मर्दन करने वाले हैं।२७। तृणावर्त्त असुर को तृण के समान हनन करके डाल दिया है और जो दो अर्जुन वृक्षों का जोड़ा शाप वश वृक्ष हो गये थे उनका भंजन कर वृक्षों की योनि छुड़ा देने वाले हैं। बहुत ही ऊँचे तालों के भेदन करने वाले हैं तथा तमाल वृक्षों के सदृश श्यामल आकृति वाले हैं ।२८।
गोपगोपीश्वरो योगी सूर्यकोटिसमप्रभः ।
इलापतिः परंज्योतिर्यादवेंद्रो यदूद्वहः ॥२६
वनमाली पीतवासाः पारिजातापहारकः ।
गोवर्द्धनाचलोद्धर्त्ता गोपालः सर्वपायकः ॥३०
अजो निरंजनः कामजनकः कंजलोचनः ।
मधुहा मथुरानाथो द्वारकानाथको बली ॥३१
वृंदावनांतसंचारी तुलसीदामभूषणः ।
स्यमंतकमणेर्हर्त्ता नरनारायणात्मकः ॥३२
कुब्जाकृष्टांबरधरो मायी परमपूरुषः ।
मुष्टिकासुरचाणूरमल्लयुद्धविशारदः ॥३३
संसारवैरी कंसारिर्मुरारिर्नरकांतकः ।
अनादि ब्रह्मचारी च कृष्णाव्यसनकर्षकः ॥३४
शिशुपालशिरश्छेत्ता दुर्योधनकुलांतकृत् ।
विदुराक्रूरवरदो विश्वरूपप्रदर्शकः ॥३५
ब्रज में समस्त गोप और जो गोपियां थीं उन सबके ईश हैं—महा योगी और करोड़ों सूर्यों की प्रभा के समान प्रदीप्त प्रभा से समन्वित हैं। इला के पति—परम ज्योति स्वरूप यादवों में प्रमुख और यदु कुल के उद्-हन करने वाले हैं ।२६। वनमाला के धारण करने वाले-पीत वर्ण के वस्त्रों के पहिनने वाले तथा पारिजात का महेन्द्रपुरी से आहरण करने वाले हैं—गोवर्द्धन गिरि के उद्धर्त्ता अर्थात् अपनी अंगुलि पर उठाने वाले—गौओं के पालन-पोषण करने वाले और समस्त चरअचरों के पालक हैं ।३०। अजन्मा-निरंजन-कामदेव के जन्म दाता तथा कमलों के सदृश लोचनों वाले हैं। मधु नामक दैत्य के हनन कर्त्ता—मथुरापुरी के नाथ-द्वारका के स्वामी और
अगस्त्य द्वारा श्रीकृष्ण प्रेमामृत का कथन ] [ २८३
बलशाली हैं ।३१। वृन्दावन के मध्य में सञ्चरण करने वाले-तुलसी की माला से सुशोभित अर्थात् तुलसी की माला के भूषण वाले हैं। स्यमन्तक नाम वाली मणि को जाम्बवान् से हरण करने वाले तथा नर और नारायण के स्वरूपधारी हैं।३२। कुब्जा जो कंस नृप की चन्दन सेविका थी वह थी तो परम सुन्दरी किन्तु टेड़े-मेड़े शरीर वाली थी। उसके द्वारा समाकृष्ट वस्त्रों के धारण करने वाले हैं। कुब्जा श्रीकृष्ण पर मोहित हो गयी थी-यह तात्पर्य है। मायी और परम पुरुष हैं। कंस के मल्ल चाणूर और मुष्टिक असुर थे उनके साथ यन्त्र युद्ध में परम कोविद हैं ।३३। इस संसार के वैरी हैं अर्थात् संसार में होने वाले दुःखों के विनाशक हैं—कंस के निपात करने वाले—मुर दैत्य के नाशक और नरक नामक असुर के अन्त कर देने वाले हैं। अनादि ब्रह्मचारी हैं अर्थात् ऐसे ब्रह्मचारी हैं जिनका कभी कोई आदि नहीं है तथा कृष्ण-द्रौपदी के व्यसन के अपकर्षण करने वाले हैं अर्थात् दुःशासन के द्वारा चीर खींचकर दुर्योधन की सभा में उसको लज्जित किया जा रहा था उस समय चीर का वर्धन करके उसकी लज्जा की रक्षा करने वाले हैं ।३४। राजा शिशुपाल के शिर के छेदन करने वाले हैं और राजा कौरवेश्वर दुर्योधन के कुल का अन्त कर देने वाले हैं। विदुर और अक्रूर को वरदानों के प्रदाता हैं और विश्वरूप अर्थात् विराट् स्वरूप के प्रदर्शक हैं ।३५।
सत्यवाक्सत्यसंकल्पः सत्यभामारतो जयी ।
सुभद्रापूर्वजो विष्णुर्भीष्ममुक्तिप्रदायकः ॥३६॥
जगद्गुरुर्जगन्नाथो वेणुवाद्यविशारदः ।
वृषभासुरविध्वंसी वकारिर्बाणबाहुकृत् ॥३७॥
युधिष्ठिरप्रतिष्ठाता बर्हिबर्हावतंसकः ।
पार्थसारथिख्यक्तो गीतामृतमहोदधिः ॥३८॥
कालीयफणिमाणिक्यरंजितः श्रीपदांबुजः ।
दामोदरो यज्ञभोक्ता दानवेन्द्रविनाशनः ॥३९॥
नारायणः परं ब्रह्म पन्नगाशनवाहनः ।
जलक्रीडासमासक्तगोपीवस्त्रापहारकः ॥४०॥
पुण्यश्लोकस्तीर्थपादो वेदवेद्यो दयानिधिः ।
सर्वतीर्थात्मकः सर्वग्रहरूपी परात्परः ॥४१॥
२०४ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
इत्येवं कृष्णदेवस्य नाम्नामष्टोत्तरं शतम् । कृष्णेन कृष्णभक्तेन श्रुत्वा गीतामृतं पुरा ॥४२॥
सदा सत्य वचनों वाले तथा सत्य संकल्पों वाले हैं। सत्यभामा नाम वाली अपनी पटरानी में रति रखने वाले और जयशील हैं सुभद्रा के बड़े भाई हैं—भगवान् साक्षात् विष्णु का स्वरूप हैं तथा भीष्मपितामह को मुक्ति देने वाले हैं। ३५। इस सम्पूर्ण जगत् के गुरु हैं—इस अगत् के नाथ हैं और वेणु (वंशी) के वादन करने में महापंडित हैं। वृषभासुर के विध्वंस करने वाले हैं—बकासुर के निहन्ता और बाणासुर की बाहुओं के कर्त्तन करने वाले हैं। ३७। राजा युधिष्ठिर को राज्य गद्दी पर प्रतिष्ठित करने वाले हैं और मयूर की पंख के भूषण वाले हैं। पार्थ पृथा के पुत्र अर्जुन के रथ के वहन कराने वाले सारथि हैं। इनका ऐसा स्वरूप है जो अव्यक्त है अर्थात् जिसको कोई पहिचान ही नहीं सकता है—गीता के उपदेशों से जो कि अमृत के समान हैं यह महोदधि हैं। जैसे अमृत समुद्र से उत्पन्न हुआ था वैसे ही गीता के उपदेश इनके ही हृदय से निकले हैं। ३८। कालिय नाग के मस्तक पर नृत्य करने से माणिक्य मणि से रञ्जित श्रीपद कमल वाले हैं। दाम से बद्ध उदर वाले हैं। दधिमन्थन के महाभाण्ड का भङ्ग कर देने पर यशोदा माता ने पकड़कर डोरी से बांध दिया था तभी से दामोदर नाम हुआ है। यज्ञों के भोक्ता और दानवेन्द्रों के विनाशक है। ३९। आप साक्षात् क्षीरशायी नारायण—परं ब्रह्म और पन्नगों के अशन करने वाले गरुण के वाहन वाले हैं। यमुना के जल में दिगम्बर होकर क्रीड़ा करने वाली व्रज बाला गोपियों के वस्त्रों का अपहरण करने वाले हैं। आप पुण्य अर्थात् परम पुनीत यश वाले हैं—तीर्थ के समान चरणों वाले वेदों के द्वारा जानने के योग्य और दया के निधि हैं। समस्त तीर्थों के स्वरूप वाले—सब ग्रहों से रूप वाले और पर से भी पर हैं। ४०-४१। इस प्रकार से श्रीकृष्ण देव के एक सौ आठ नामों का यह शतक है। श्रीकृष्ण के भक्त कृष्ण ने अर्थात् वेद व्यासजी ने पहिले गीतामृत का श्रवण दिया था। ४२।
स्तोत्रं कृष्णप्रियकरं कृतं तस्मान्मया श्रुतम् । कृष्णप्रेमामृतं नाम परमानन्ददायकम् ॥४३॥ अत्युपद्रवदुःखघ्नं परमायुष्यवर्द्धनम् । दानं व्रतं तपस्तीर्थं यत्कृतं त्विह जन्मनि ॥४४॥
अगस्त्य द्वारा श्रीकृष्ण प्रेमामृत का कथन ] [ २८५
पठतां शृण्वतां चैव कोटिकोटिगुणं भवेत् । पुत्रप्रदमपुत्राणामगतीनां गतिप्रदम् ॥४५ धनवाहं दरिद्राणां जयेच्छूनां जयावहम् । शिशूनां गोकुलानां च पुष्टिदं पुण्यवर्द्धनम् ॥४६ बालरोगग्रपादीनां शमनं शांतिकारकम् । अं ते कृष्णस्मरणदं भवतापत्रयापहम् ॥४७ असिद्धसाधकं भद्रे जपादिकरमात्मनाम् । कृष्णाय यादवेंद्राय ज्ञानमुद्राय योगिने ॥४८ नाथाय रुक्मिणीशाय नमो वेदांतवेदिने । इमं मंत्रं महादेवि जपन्नेव दिवानिशम् ॥४९
कृष्ण द्वैपायन महामुनि ने यह श्रीकृष्ण के प्रिय को करने वाला स्तोत्र रचित किया था। उन्हीं से इसका श्रवण मैंने किया था। यह श्रीकृष्ण प्रेमामृत नामक स्तोत्र परमाधिक आनन्द के प्रदान करने वाला है ।४३। यह अत्यधिक उपद्रव और दुःखों का हनन करने वाला है तथा इसके श्रवण और पठन से अधिकाधिक आयु का वर्धन होता है। इस लोक में जन्म ग्रहण करके जो भी कुछ दान-व्रत-तप-तीर्थ आदि किया है वह सभी इस परम पुनीत स्तोत्र के पढ़ने वालों तथा श्रवण किया है वह सभी इस परम पुनीत स्तोत्र के पढ़ने वालों तथा श्रवण करने वालों को करोड़ों गुना फल देने वाला होती है। जो पुत्रों से रहित है उनको यह पुत्रों के प्रदान करने वाला है तथा जिनकी सद्गति का कोई भी साधन नहीं है उनको सुगति अर्थात् उद्धार के प्रदान करने वाला है ।४४-४५। जो धन से महीन महान् दरिद्र है उनको धन का वहन कराने वाला है और जो सर्वत्र युद्ध स्थल में अपनी विजय के इच्छुक हैं उनको जय देने वाला है। यह स्तोत्र शिशुओं की और गोकुलों की पुष्टि का बढ़ाने वाला है ।४६। बालरोग और ग्रहों आदि का शमन करने वाला तथा परम शान्ति के करने वाला है। यह समय में श्रीकृष्ण की स्मृति का देने वाला तथा संसार के तीनों (आध्यात्मिक-आधिभौतिक-आधिदैविक) तापों का अपहरण करने वाला है ।४७। हे भद्रे ! यह स्तोत्र अपने असिद्ध जप आदि के साधन करने वाला अर्थात् सिद्धि कारक है। पादवेन्द्र-ज्ञान की मुद्रा वाले-योगी-रुक्मिणी के स्वामी-
२८६ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
वेदान्त के वेद्य नाथ श्री कृष्ण के लिए नमस्कार है--हे महादेवि ! यह मन्त्र है इसका अहर्निश जाप करते रहना चाहिए ।४८-४९।
सर्वग्रहानुग्रहभावसर्वप्रियतमो भवेत् । पुत्रपौत्रैः परिवृतः सर्वसिद्धिसमृद्धिमान् ॥५० निषेव्य भोगानंतेऽपि कृष्णसायुज्यमाप्नुयात् ।
अगस्त्य उवाच- एतावदुक्तो भगवाननंतो मूर्त्तिस्तु संकर्षणसंज्ञिता विभो ॥५१ धराधरोऽलं जगतां धरायै निर्दिश्य भूयो विरराम मानदः । ततस्तु सर्वे सनकादयो ये समास्थितास्तत्परितः कथाहताः । आनंदपूर्णा बुनिधौ निमग्नाः सभाजयामासुरहीश्वरं तम् ॥५२
ऋषय ऊचुः- नमो नमस्तेऽखिलविश्वभावन प्रपन्नभक्ता- र्तिहराव्ययात्मन् । धराधरायापि कृपार्णवाय शेषाय विश्वप्रभवे नमस्ते ॥५३ कृष्णामृतं नः परिपायितं विभो विधूतपापा भवता कृता वयम् । भवादृशा दीनदयालवो विभो समुद्धरंत्येव निजान्हि संततान् ॥५४ एवं नमस्कृत्य फणीश पादयोर्मनो विधायाखिलकामपूरयोः । प्रदक्षिणीकृत्य धराधराधरं सर्वे वयं स्वावसथानुपागताः ॥५५
इस परमोत्तम एवं दिव्य स्तोत्र का सेवन करने वाला पुरुष समस्त ग्रहों के अनुग्रह को प्राप्त करने वाला हो जाता है और वह सभी का परम प्रिय बन जाया करता है । इस अष्टोत्तर शतक कृष्ण स्तोत्र के श्रवण तथा पठन करने से भजन पुत्र-पौत्रादि से परिवृत होता है और उसके सभी प्रकार की सिद्धियों को समृद्धि हो जाया करती है ।५०। वह मनुष्य इस लोक में सब प्रकार के सुखों का उपभोग करके भी अन्त समय में भगवान् श्री
अगस्त्य द्वारा श्रीकृष्ण प्रेमामृत का कथन ] [ २८७
कृष्ण के सायुज्य की प्राप्ति किया करता है। अगस्त्य मुनि ने कहा—हे विभो ! इतना कहकर भगवान् अनन्त देव चुप हो गये थे जो कि संकर्षण की संज्ञा वाली मूर्त्ति थी। यह भगवान् समस्त जगतों की इस धरा के धारण करने में पूर्णतया समर्थ थे। मान के देने वाले प्रभु ने पुनः धरा के लिए निर्देश किया था। इसके अनन्तर कथा का आदर करने वाले सनकादिक मुनिगण सब जो उनको चारों ओर से घेरकर समवस्थित थे आनन्द से परि-पूर्ण सागर में निमग्न हो गये थे और उन सबने अहीश्वर प्रभु को सभाजित किया था ।५१-५२। ऋषिगणों ने कहा—हे प्रभो ! आप तो इस सम्पूर्ण विश्व पर अनुकम्पा करते हुए इसका परिपालन किया करते हैं। हे अव्यय स्वरूप वाले ! आप तो शरण में समागत अपने भक्तों की आर्त्ति के हरण करने वाले हैं आपके लिए हमारा सबका बारम्बार प्रणाम है। आप इस धरा के धारण करने वाले होते हुए भी परम कृपा के सागर हैं और आप समग्र विश्व की समुत्पत्ति करने वाले हैं। ऐसे शेष भगवान् आपकी सेवा में हमारा प्रणिपात है ।५३। हे विभो ! आपने हम सबको श्रीकृष्ण के नामों का जो अष्टोत्तर शतक रूपी अमृत है उसका भली भाँति से पान कराया है और आपने हम सबको पापों से रहित कर दिया है। हे विभो ! आप सरीखे महापुरुष ही दीनों पर दया की वृष्टि करने वाले होते हैं जो कि अपने चरणों की शरण में समागत अपने भक्तों का भली भाँति उद्धार किया करते हैं ।५४। इस रीति से नमस्कार करके और समस्त कामनाओं को पूर्ण करने वाले भगवान् शेष के चरणों में मन लगाकर तथा धराधर को परिक्रमा करके हम सब अपने-अपने निवास स्थानों को उपागत हो गये थे ।५५।
इति तेऽभिहितं राम स्तोत्रं प्रेमामृताभिधम् ।
कृष्णस्य परिपूर्णस्य राधाकांतस्य सिद्धिदम् ॥५६
इदं राम महाभाग स्तोत्रं परमदुर्लभम् ।
श्रुतं साक्षाद्भगवतः शेषात्कथययः कथाः ॥५७
यावंति मन्त्रजालानि स्तोत्राणि कवचानि च ॥५८
त्रैलोक्ये तानि सर्वाणि सिद्धयं त्येवास्य शीलनात् ।
वसिष्ठ उवाच—
एवमुक्त्वा महाराज कृष्णप्रेमामृतं स्तवम् ।
यावद्वघरं सीत्स मुनिस्तावत्स्वर्यानमागतम् ॥५९
२८८ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
चतुर्भिरद्भुतैः सिद्धैः कामरूपैर्मनोजवैः । अनुयातमथोत्प्लुत्य स्त्रीपुंसौ हरिणौ तदा । अगस्त्यचरणौ नत्वा समारुरुहतुर्मुदा ॥ ६० ॥ दिव्यदेहधरौ भूत्वा शंखचक्रादिचिह्नितौ । गतौ च वैष्णवं लोकं सर्वदेवनमस्कृतम् । पश्यतां सर्वभूतानां भार्गवागस्त्ययोस्तथा ॥ ६१ ॥
अगस्त्य महामुनि ने कहा कि हे राम ! श्री राधा के कान्त-परिपूर्ण भगवान् श्रीकृष्ण का यह समस्त सिद्धियों का प्रदान कर देने वाला प्रेमामृत नाम वाला स्तोत्र मैंने आपको बता दिया है ।५६। हे महाभाग राम ! यह स्तोत्र अत्यन्त दुर्लभ है । मैंने कथाओं का वर्णन करते हुए साक्षात् भगवान् शेष के ही मुख से इसका श्रवण किया है ।५७। इस लोक में जितने भी मन्त्रों के समूह हैं तथा स्तोत्र और कवच आदि हैं इस त्रिभुवन में वे सभी इस स्तोत्र के ही परिशीलन करने से सिद्ध हो जाया करते हैं । वसिष्ठजी ने कहा—हे महाराज ! इस रीति से श्रीकृष्ण प्रेमामृत स्तव को बतलाकर जब तक अगस्त्य मुनि विरत हुए थे तभी तक वहाँ स्वर्ग से एक यान आ गया था ।५८-५९। उस मान में चार स्वेच्छया स्वरूप धारण करने वाले—मन के ही समान वेग से समन्वित और अतीव अद्भुत सिद्धों से युक्त था । इसके अनन्तर वे दोनों हरिण और हरिणी स्त्री एवं पुरुष के स्वरूप में होकर अगस्त्य मुनि को प्रणाम करके उस समय में परम हर्ष से उछल कर उस यान में समारूढ़ हो गये ।६०। वे दोनों परम दिव्य देह के धारण करने वाले हो गये थे जो शङ्ख-चक्र आदि भगवान् के चिह्नों से संयुत थे । इसके पश्चात् वे समस्त देवगणों के द्वारा वन्दित भगवान् विष्णु के लोक में चले गये थे । उस समय इस विलक्षण घटना को वहाँ पर संस्थित सभी प्राणी तथा भार्गव राम और अगस्त्य मुनि भी देख रहे थे उन सबकी आँखों के ही सामने ऐसा हुआ था ।६१।
भार्गव चरित्र (१)
वसिष्ठ उवाच— दृष्ट्वा परशुरामस्तु तदाश्चर्यं महाद्भुतम् । जगाद सर्ववृत्तान्तं मृगयोस्तु यथाश्रुतम् ॥ १॥