संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२०४ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
इत्येवं कृष्णदेवस्य नाम्नामष्टोत्तरं शतम् । कृष्णेन कृष्णभक्तेन श्रुत्वा गीतामृतं पुरा ॥४२॥
सदा सत्य वचनों वाले तथा सत्य संकल्पों वाले हैं। सत्यभामा नाम वाली अपनी पटरानी में रति रखने वाले और जयशील हैं सुभद्रा के बड़े भाई हैं—भगवान् साक्षात् विष्णु का स्वरूप हैं तथा भीष्मपितामह को मुक्ति देने वाले हैं। ३५। इस सम्पूर्ण जगत् के गुरु हैं—इस अगत् के नाथ हैं और वेणु (वंशी) के वादन करने में महापंडित हैं। वृषभासुर के विध्वंस करने वाले हैं—बकासुर के निहन्ता और बाणासुर की बाहुओं के कर्त्तन करने वाले हैं। ३७। राजा युधिष्ठिर को राज्य गद्दी पर प्रतिष्ठित करने वाले हैं और मयूर की पंख के भूषण वाले हैं। पार्थ पृथा के पुत्र अर्जुन के रथ के वहन कराने वाले सारथि हैं। इनका ऐसा स्वरूप है जो अव्यक्त है अर्थात् जिसको कोई पहिचान ही नहीं सकता है—गीता के उपदेशों से जो कि अमृत के समान हैं यह महोदधि हैं। जैसे अमृत समुद्र से उत्पन्न हुआ था वैसे ही गीता के उपदेश इनके ही हृदय से निकले हैं। ३८। कालिय नाग के मस्तक पर नृत्य करने से माणिक्य मणि से रञ्जित श्रीपद कमल वाले हैं। दाम से बद्ध उदर वाले हैं। दधिमन्थन के महाभाण्ड का भङ्ग कर देने पर यशोदा माता ने पकड़कर डोरी से बांध दिया था तभी से दामोदर नाम हुआ है। यज्ञों के भोक्ता और दानवेन्द्रों के विनाशक है। ३९। आप साक्षात् क्षीरशायी नारायण—परं ब्रह्म और पन्नगों के अशन करने वाले गरुण के वाहन वाले हैं। यमुना के जल में दिगम्बर होकर क्रीड़ा करने वाली व्रज बाला गोपियों के वस्त्रों का अपहरण करने वाले हैं। आप पुण्य अर्थात् परम पुनीत यश वाले हैं—तीर्थ के समान चरणों वाले वेदों के द्वारा जानने के योग्य और दया के निधि हैं। समस्त तीर्थों के स्वरूप वाले—सब ग्रहों से रूप वाले और पर से भी पर हैं। ४०-४१। इस प्रकार से श्रीकृष्ण देव के एक सौ आठ नामों का यह शतक है। श्रीकृष्ण के भक्त कृष्ण ने अर्थात् वेद व्यासजी ने पहिले गीतामृत का श्रवण दिया था। ४२।
स्तोत्रं कृष्णप्रियकरं कृतं तस्मान्मया श्रुतम् । कृष्णप्रेमामृतं नाम परमानन्ददायकम् ॥४३॥ अत्युपद्रवदुःखघ्नं परमायुष्यवर्द्धनम् । दानं व्रतं तपस्तीर्थं यत्कृतं त्विह जन्मनि ॥४४॥