संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 281, कुल 893 में से
संदर्भ में पढ़ेंअगस्त्य द्वारा श्रीकृष्ण प्रेमामृत का कथन ] [ २८५
पठतां शृण्वतां चैव कोटिकोटिगुणं भवेत् । पुत्रप्रदमपुत्राणामगतीनां गतिप्रदम् ॥४५ धनवाहं दरिद्राणां जयेच्छूनां जयावहम् । शिशूनां गोकुलानां च पुष्टिदं पुण्यवर्द्धनम् ॥४६ बालरोगग्रपादीनां शमनं शांतिकारकम् । अं ते कृष्णस्मरणदं भवतापत्रयापहम् ॥४७ असिद्धसाधकं भद्रे जपादिकरमात्मनाम् । कृष्णाय यादवेंद्राय ज्ञानमुद्राय योगिने ॥४८ नाथाय रुक्मिणीशाय नमो वेदांतवेदिने । इमं मंत्रं महादेवि जपन्नेव दिवानिशम् ॥४९
कृष्ण द्वैपायन महामुनि ने यह श्रीकृष्ण के प्रिय को करने वाला स्तोत्र रचित किया था। उन्हीं से इसका श्रवण मैंने किया था। यह श्रीकृष्ण प्रेमामृत नामक स्तोत्र परमाधिक आनन्द के प्रदान करने वाला है ।४३। यह अत्यधिक उपद्रव और दुःखों का हनन करने वाला है तथा इसके श्रवण और पठन से अधिकाधिक आयु का वर्धन होता है। इस लोक में जन्म ग्रहण करके जो भी कुछ दान-व्रत-तप-तीर्थ आदि किया है वह सभी इस परम पुनीत स्तोत्र के पढ़ने वालों तथा श्रवण किया है वह सभी इस परम पुनीत स्तोत्र के पढ़ने वालों तथा श्रवण करने वालों को करोड़ों गुना फल देने वाला होती है। जो पुत्रों से रहित है उनको यह पुत्रों के प्रदान करने वाला है तथा जिनकी सद्गति का कोई भी साधन नहीं है उनको सुगति अर्थात् उद्धार के प्रदान करने वाला है ।४४-४५। जो धन से महीन महान् दरिद्र है उनको धन का वहन कराने वाला है और जो सर्वत्र युद्ध स्थल में अपनी विजय के इच्छुक हैं उनको जय देने वाला है। यह स्तोत्र शिशुओं की और गोकुलों की पुष्टि का बढ़ाने वाला है ।४६। बालरोग और ग्रहों आदि का शमन करने वाला तथा परम शान्ति के करने वाला है। यह समय में श्रीकृष्ण की स्मृति का देने वाला तथा संसार के तीनों (आध्यात्मिक-आधिभौतिक-आधिदैविक) तापों का अपहरण करने वाला है ।४७। हे भद्रे ! यह स्तोत्र अपने असिद्ध जप आदि के साधन करने वाला अर्थात् सिद्धि कारक है। पादवेन्द्र-ज्ञान की मुद्रा वाले-योगी-रुक्मिणी के स्वामी-