भारतकोश
संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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२८६ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

वेदान्त के वेद्य नाथ श्री कृष्ण के लिए नमस्कार है--हे महादेवि ! यह मन्त्र है इसका अहर्निश जाप करते रहना चाहिए ।४८-४९।

सर्वग्रहानुग्रहभावसर्वप्रियतमो भवेत् । पुत्रपौत्रैः परिवृतः सर्वसिद्धिसमृद्धिमान् ॥५० निषेव्य भोगानंतेऽपि कृष्णसायुज्यमाप्नुयात् ।

अगस्त्य उवाच- एतावदुक्तो भगवाननंतो मूर्त्तिस्तु संकर्षणसंज्ञिता विभो ॥५१ धराधरोऽलं जगतां धरायै निर्दिश्य भूयो विरराम मानदः । ततस्तु सर्वे सनकादयो ये समास्थितास्तत्परितः कथाहताः । आनंदपूर्णा बुनिधौ निमग्नाः सभाजयामासुरहीश्वरं तम् ॥५२

ऋषय ऊचुः- नमो नमस्तेऽखिलविश्वभावन प्रपन्नभक्ता- र्तिहराव्ययात्मन् । धराधरायापि कृपार्णवाय शेषाय विश्वप्रभवे नमस्ते ॥५३ कृष्णामृतं नः परिपायितं विभो विधूतपापा भवता कृता वयम् । भवादृशा दीनदयालवो विभो समुद्धरंत्येव निजान्हि संततान् ॥५४ एवं नमस्कृत्य फणीश पादयोर्मनो विधायाखिलकामपूरयोः । प्रदक्षिणीकृत्य धराधराधरं सर्वे वयं स्वावसथानुपागताः ॥५५

इस परमोत्तम एवं दिव्य स्तोत्र का सेवन करने वाला पुरुष समस्त ग्रहों के अनुग्रह को प्राप्त करने वाला हो जाता है और वह सभी का परम प्रिय बन जाया करता है । इस अष्टोत्तर शतक कृष्ण स्तोत्र के श्रवण तथा पठन करने से भजन पुत्र-पौत्रादि से परिवृत होता है और उसके सभी प्रकार की सिद्धियों को समृद्धि हो जाया करती है ।५०। वह मनुष्य इस लोक में सब प्रकार के सुखों का उपभोग करके भी अन्त समय में भगवान् श्री