भारतकोश
संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished893 पृष्ठ

पृष्ठ 283, कुल 893 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 283

अगस्त्य द्वारा श्रीकृष्ण प्रेमामृत का कथन ] [ २८७

कृष्ण के सायुज्य की प्राप्ति किया करता है। अगस्त्य मुनि ने कहा—हे विभो ! इतना कहकर भगवान् अनन्त देव चुप हो गये थे जो कि संकर्षण की संज्ञा वाली मूर्त्ति थी। यह भगवान् समस्त जगतों की इस धरा के धारण करने में पूर्णतया समर्थ थे। मान के देने वाले प्रभु ने पुनः धरा के लिए निर्देश किया था। इसके अनन्तर कथा का आदर करने वाले सनकादिक मुनिगण सब जो उनको चारों ओर से घेरकर समवस्थित थे आनन्द से परि-पूर्ण सागर में निमग्न हो गये थे और उन सबने अहीश्वर प्रभु को सभाजित किया था ।५१-५२। ऋषिगणों ने कहा—हे प्रभो ! आप तो इस सम्पूर्ण विश्व पर अनुकम्पा करते हुए इसका परिपालन किया करते हैं। हे अव्यय स्वरूप वाले ! आप तो शरण में समागत अपने भक्तों की आर्त्ति के हरण करने वाले हैं आपके लिए हमारा सबका बारम्बार प्रणाम है। आप इस धरा के धारण करने वाले होते हुए भी परम कृपा के सागर हैं और आप समग्र विश्व की समुत्पत्ति करने वाले हैं। ऐसे शेष भगवान् आपकी सेवा में हमारा प्रणिपात है ।५३। हे विभो ! आपने हम सबको श्रीकृष्ण के नामों का जो अष्टोत्तर शतक रूपी अमृत है उसका भली भाँति से पान कराया है और आपने हम सबको पापों से रहित कर दिया है। हे विभो ! आप सरीखे महापुरुष ही दीनों पर दया की वृष्टि करने वाले होते हैं जो कि अपने चरणों की शरण में समागत अपने भक्तों का भली भाँति उद्धार किया करते हैं ।५४। इस रीति से नमस्कार करके और समस्त कामनाओं को पूर्ण करने वाले भगवान् शेष के चरणों में मन लगाकर तथा धराधर को परिक्रमा करके हम सब अपने-अपने निवास स्थानों को उपागत हो गये थे ।५५।

इति तेऽभिहितं राम स्तोत्रं प्रेमामृताभिधम् ।
कृष्णस्य परिपूर्णस्य राधाकांतस्य सिद्धिदम् ॥५६

इदं राम महाभाग स्तोत्रं परमदुर्लभम् ।
श्रुतं साक्षाद्भगवतः शेषात्कथययः कथाः ॥५७

यावंति मन्त्रजालानि स्तोत्राणि कवचानि च ॥५८
त्रैलोक्ये तानि सर्वाणि सिद्धयं त्येवास्य शीलनात् ।

वसिष्ठ उवाच—
एवमुक्त्वा महाराज कृष्णप्रेमामृतं स्तवम् ।
यावद्वघरं सीत्स मुनिस्तावत्स्वर्यानमागतम् ॥५९